Wednesday, January 17, 2018

जाति का विनाश,सामाजिक बराबरी का लक्ष्य और जिग्नेश मेवानी की राजनीति



शेष नारायण सिंह

भारत की राजनीतिक यात्रा में शोषित पीड़ित जनता को इज्ज़त की ज़िंदगी देने की बार बार कोशिश होती रही है. देश जातियों के खांचे में  बंटा हुआ है .जाति की संस्था इस देश को हज़ारों वर्षों से अलग अलग सांचों में बांधे हुए है . शुरू में तो वर्ण व्यवस्था थी और उसमें जन्म से जाति को तय करने की बात कहीं नहीं कही गयी थी लेकिन बाद  की सदियों में जन्म से ही जाति का निर्धरण होने लगा .उसके बाद से जाति इंसानी तरक्की के  रास्ते में बाधा बनती रही . करीब आठ सौ साल पहले जब एक आधुनिक धर्म, इस्लाम का भारत में प्रचार प्रसार हुआ तो भी यहाँ जाति का बंधन टूटा नहीं बल्कि इस्लाम अपनाने वाले भी अपनी जातियां साथ लेकर गए . मुसलमानों में भी बहुत सारी  जातियां बन गईं. दुनिया के विद्वानों का मानना  है कि इस्लाम और सिख मजहब  अपेक्षाकृत  नए धर्म हैं इसलिए इनको आधुनिक मान्यताओं को जगह देनी चाहिए थी लेकिन जाति के मसले पर यह नए धर्म  भी  भारतीय समाज की कमजोरियों को साथ लेकर ही चले  , जाति का शिकंजा  हमारे समाज के  विकास और एकजुटता में सबसे बड़ी बाधा बना रहा . जाति की सबसे बड़ी बुराइयों में छुआछूत को माना जाता है . महात्मा  गांधी ने छुआछूत को अपने आन्दोलन के प्रमुख आधारों में एक बनाया . उनके अस्सी साल पहले शुरू हुए प्रयासों को अब आंशिक सफलता मिलने लगी है . उनके समकालीन डॉ बी आर आम्बेडकर ने भी जाति के मुद्दे पर गंभीर चिंतन किया और जाति संस्था के विनाश को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक  विकास की पहली शर्त माना .  लेकिन राजनीतिक धरातल पर कहीं कुछ हुआ नहीं . डॉ  आंबेडकर के नाम पर राजनीति का धंधा करने वालों ने जाति के  विनाश की बात तो दूर उसको संभालकर बनाये रखने में ही सारा ध्यान दिया .  डॉ आंबेडकर के नाम पर वोट मांगने वाले नेताओं ने उनकी राजनीति के सबसे बुनियादी पक्ष का हमेशा विरोध किया. सवर्ण जातियों के विरोध की राजनीति से शुरुआत करके नेता लोग दलित जातियों को एकजुट करके वोट बैंक बना लेते हैं और उसके बाद उसी वोट बैंक की संख्या के आधार पर राजनीतिक सौदेबाजी करने लगते हैं . रिपब्लिकन पार्टी के विभिन्न गुटों, कांशी राम और मायावती की राजनीतिक यात्रा को देखने से तस्वीर साफ़ हो जाती है . 
आधुनिक राजनीतिक धरातल पर  दलित जाति में जन्मा एक नया राजनीतिक नेता उभर रहा  है . जिग्नेश मेवानी ने गुजरात के ऊना में दलितों पर हुए अत्याचार के बाद राजनीतिक शक्तियों को एकजुट करने का अभियान शुरू किया था. आज देश के राजनीतिक क्षितिज पर जिग्नेश मेवानी को शोषित पीड़ित जातियों की एकजुटता का केंद्र माना जाने  लगा  है . अभी  उत्तराखंड से खबर आई है कि जिग्नेश मेवानी के हल्द्वानी जाने की खबर उड़ गयी थी. जिले की पूरी पुलिस फ़ोर्स उनको तलाशने में जुट गयी . उधर जाने वाली हर गाडी की तलाश होने लगी .   दिल्ली के जन्तर मन्तर पर जिग्नेश की सभा  को तोड़ने के लिये सारी ताक़त लगा दी गयी .  ऐसा लगता है कि जाति की राजनीति को ज़बरदस्त झटका देने की किसी योजना पर काम चल  रहा है. जिस तरह से दलितों के उत्पीडन के केन्द्रों से जिग्नेश मेवानी की लोकप्रियता की ख़बरें आ रही हैं उससे लगता  है कि जाति के विनाश की राजनीति एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आने वाली  है . दलितों के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने वाले अन्य नेता तो  जाति को बनाए रखने की ही बात करते हैं   लेकिन जिग्नेश की बातचीत में दूसरी बात निकलकर आ रही है . नैशनल दस्तक  पत्रिका को दिए गए एक इंटरव्यू में जिग्नेश मेवानी ने कहा कि," जाति के विनाश के बिनावर्ग संघर्ष एक वास्तविक वास्तविकता नहीं बन जाएगा और वर्ग संघर्ष के बिना जाति का विनाश नहीं किया जा सकता है। "  इसका मतलब यह हुआ कि जाति और वर्ण आधारित शोषण का विरोध करने वाली सभी सियासी जमातों को एकजुट करने की कोशिश इस नौजवान नेता की तरफ से की जा रही है . जिससे  जाति के विनाश की संभावना एक बार फिर बनना शुरू हो गयी है .
दुनिया भर के आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक विचारक  मानते हैं कि जाति भारतीय समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा है . पिछली सदी के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन के जानकारों में डा. बी आर आंबेडकर का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। महात्मा गांधी के समकालीन रहे डॉ आंबेडकर  ने अपने दर्शन की बुनियादी सोच का आधार जाति प्रथा के विनाश  को माना था उनको विश्वास था कि जाति के विनाश होने तक न तो राजनीतिक सुधार लाया जा सकता है और न ही आर्थिक सुधार लाया जा सकता है। The Annihilation of caste में डा.अंबेडकर ने बहुत ही साफ शब्दों में कह दिया है कि जब तक जाति प्रथा का विनाश नहीं हो जाता समतान्याय और भाईचारे की शासन व्यवस्था नहीं कायम हो सकती। जाहिर है कि जाति व्यवस्था का विनाश हर उस आदमी का लक्ष्य होना चाहिए जो अंबेडकर के दर्शन में विश्वास रखता हो। अंबेडकर के जीवन काल में किसी ने नहीं सोचा होगा कि उनके दर्शन को आधार बनाकर राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है। लेकिन कांशीराम ने अपनी राजनीति के विकास के लिए अंबेडकर का सहारा लिया और अपनी पार्टी को  उत्तर प्रदेश की सत्ता तक पंहुचाया .लेकिन डॉ अंबेडकर के नाम पर सत्ता का सुख भोगने वाली उनकी पार्टी की सरकार ने बाबासाहेब के सबसे प्रिय सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया .

कांशी राम और मायावती की  पिछले पचीस वर्षों की राजनीति पर नज़र डालने से समझ में आ जाता है कि उन्होंने जाति प्रथा के विनाश के लिए कोई काम नहीं किया . बल्कि इसके उलट वे जातियों के आधार पर पहचान बनाए रखने की पक्षधर बने रहे . दलित जाति की अस्मिता को तो बनाये ही रखा अन्य जातियों को भी उनकी जाति सीमाओं में बांधे रखने के लिए बड़े पैमाने पर काम किया .जब उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार थी तो हर जाति का भाईचारा कमेटियाँ बना दी गई थीं .डाक्टर आंबेडकर ने साफ कहा था कि जब तक जातियों के बाहर शादी ब्याह की स्थितियां नहीं पैदा होती तब तक जाति का इस्पाती सांचा तोड़ा नहीं जा सकता। चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजने वाली मायावती जी ने एक बार भी सरकारी स्तर पर ऐसी कोई पहल नहीं की जिसकी वजह से जाति प्रथा पर कोई मामूली सी भी चोट लग सके.मायावती के मुख्यमंत्री रहते कई मंत्रियों से बात करने का  मौक़ा मिलता था .एक अजीब बात देखने को मिलती थी  कि मायावती सरकार के कई मंत्रियों को यह भी नहीं मालूम है कि अंबेडकर के मुख्य राजनीतिक विचार क्या हैं उनकी सबसे महत्वपूर्ण किताब का नाम क्या है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कम्युनिस्ट पार्टी का कोई नेता मार्क्स के सिद्धांतों को न जानता होया दास कैपिटल नाम की किताब के बारे में जानकारी न रखता हो। या बीजेपी का कोई नेता सावरकर की किताब," हिंदुत्व" का नाम न जानता हो .

डॉ बी आर आंबेडकर की सबसे महत्वपूर्ण किताब The Annihilation of caste के बारे में यह जानना दिलचस्प होगा कि वह एक ऐसा भाषण है जिसको पढ़ने का मौका उन्हें नहीं मिला . लाहौर के जात पात तोड़क मंडल की और से उनको मुख्य भाषण करने के लिए न्यौता मिला। जब डाक्टर साहब ने अपने प्रस्तावित भाषण को लिखकर भेजा तो ब्राहमणों के प्रभुत्व वाले जात-पात तोड़क मंडल के कर्ताधर्ताकाफी बहस मुबाहसे के बाद भी इतना क्रांतिकारी भाषण सुनने कौ तैयार नहीं हुए। शर्त लगा दी कि अगर भाषण में आयोजकों की मर्जी के हिसाब से बदलाव न किया गया तो भाषण हो नहीं पायेगा। अंबेडकर ने भाषण बदलने से मना कर दिया। और उस सामग्री को पुस्तक के रूप में छपवा दिया जो आज हमारी ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा है। इस पुस्तक में अंबेडकर ने अपने आदर्शों का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि जातिवाद के विनाश के बाद जो स्थिति पैदा होगी उसमें स्वतंत्रताबराबरी और भाईचारा होगा। एक आदर्श समाज के लिए अंबेडकर का यही सपना था। एक आदर्श समाज को गतिशील रहना चाहिए और बेहतरी के लिए होने वाले किसी भी परिवर्तन का हमेशा स्वागत करना चाहिए। एक आदर्श समाज में विचारों का आदान-प्रदान होता रहना चाहिए।
जिग्नेश मेवानी की राजनीतिक यात्रा पर नज़र रखने की  ज़रूरत है . यह मुकम्मल तरीके से नहीं कहा जा सकता कि वे राजनीतिक विमर्श को वह दिशा दे सकेंगे जो जाति के विनाश और सामाजिक बराबरी की बुनियादी शर्त है  लेकिन उम्मीद तो फिलहाल बन  रही  है .

Thursday, January 4, 2018

अगर औद्योगिक विकास और रोज़गार नहीं बढे तो बेरोज़गार नौजवानों का असंतोष बढेगा


शेष नारायण सिंह

प्रधानमंत्री ने देश में औद्योगिकीकरण के ज़रिये रोज़गार बढ़ाने और सम्पन्नता की बात अपने २०१३-१४ के चुनावी अभियान में की थी . सरकार में आने के बाद उन्होने इस काम को पूरा करने के लिए कई तरह की पहल भी की . मेक इन इण्डियास्टार्ट अप इण्डिया ,कौशल विकासमुद्रा ,सौ स्मार्ट शहर आदि योजनायें  इसी लक्ष्य को हासिल  करने के लिए घोषित की गईं थीं .  लेकिन संबंधित विभागों विभागों के मंत्री ऐसे मिले कि कहीं कुछ  शुरू ही नहीं हो सका  . कौशल विकास के मंत्री को हटाया भी लेकिन उसके बाद भी कहीं कुछ नज़र नहीं आया. वास्तव में औद्योगिक विकास में केंद्र सरकार की भूमिका नीतियों तक ही  होती है. ज़मीन पर उनको लागू करने का काम राज्य सरकारों का होता है . ऐसा लगता  है कि या तो राज्य  सरकारों ने प्रधानमंत्री की घोषणाओं को ज़रूरी अहमियत नहीं दी या उनको पता ही नहीं था कि उद्योगों को ही विकास का इंजन बनाने से सम्पन्नता आती है और उसके लिए करना क्या है . दिल्ली से लगे हुए फरीदाबादगुरुग्रामसोनीपतगाज़ियाबादगौतमबुद्ध नगर जिलों में जो गतिविधियाँ चल रही थींवे भी लगभग ठप्प ही पड़ी हैं . नए उद्योग न लगने से माहौल में निराशा बढ़ रही  है और देश के अलग अलग क्षेत्रों से नौजवानों के असंतोष की ख़बरें आ रही हैं . गुजरात का आन्दोलन सबने देखा और अब महाराष्ट्र से भी युवकों में बड़े पैमाने पर असंतोष की ख़बरें आ रही हैं . इन घटनाओं का तात्कालिक कारण जो भी हो सबके मूल में मुख्य कारण एक ही है. बहुत बड़े पैमाने पर बेरोजगार नौजवान किसी भी विरोध प्रदर्शन के आवाहन पर मैदान ले रहे हैं . एक बार चिंगारी लग जाने के बाद आन्दोलन तरह तरह के रूप लेने लगते हैं. इनका हल समस्या की जड़ में जाकर ही पाया जा सकता है .इस संतोष को कानून और व्यवस्था की बात मानना बिलकुल गलत होता है . नौजवानों को किसी काम से लगाया जाना चाहिये  . इसके लिए राज्यों में औद्योगिक  विकास को बढ़ावा देना ज़रूरी  है .
संतोष की बात यह है कि राज्य सरकारों को यह बात समझ में आना शुरू हो गयी है .पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल ग्लोबल समिट  २०१८ का आयोजन किया है . जनवरी के तीसरे हफ्ते में कोलकता में पूरी दुनिया के  उद्योगपतियों को आमंत्रित किया गया है . जहां उनको बंगाल में उद्योग लगाने के लिए प्रेरित किया जाएगा और स्थिर विकास और रोज़गार के अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध करवाने के लिए प्रयास किया जाएगा . बंगाल के बाद असम में भी पहली बार ग्लोबल इन्वेस्टर समिट  का आयोजन किया जा रहा है .३ फरवरी को होने वाले इस शिखर सम्मलेन का उदघाटन ,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे .असम में हर १६० किलोमीटर पर एक  बड़ा आद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने की योजना है . राज्य सरकार ने निवेश बढाने के लिए उद्योग नीति में भी ज़रूरी बदलाव कर दिया है . राज्य की चीनी नीति में भी बदलाव कर दिया गया है और उम्मीद की जा रही है कि शिखर सम्मलेन के बाद राज्य में चीनी मिलें लगेंगी और गन्ना की खेती को भी प्रोत्साहन मिलेगा .
बंगाल कभी देश की औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र  हुआ करता था. राज्य सरकार अपनी पुरानी विरासत को फिर से  पाने की कोशिश कर रही है लेकिन असम में चाय  बागानों के अलावा और कोई ख़ास गतिविधि थी ही नहींवह नए सिरे से देश के औद्योगिक विकास के नक्शे पर नज़र आने की कोशिश कर रहा है . उत्तर प्रदेश में भी २१-२२ फरवरी को लखनऊ में इन्वेस्टर समिट होने जा रही है . दिल्ली से सटे हुए उत्तर प्रदेश सरकार के गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर जिले हैं . यहाँ बहुत बड़े पैमाने पर औद्यगिक विकास के लिए बुनियादी ढांचे लगाए गए हैं .लेकिन कानून व्यवस्था और सरकारों के अल्गर्ज़ रुख के कारण कुछ ख़ास  हो नहीं पा रहा है . ज्यादातर सरकारें यही सोचती रहीं कि उद्योग लगाने वाले अपने आप दौड़े चले  आयेगें . लेकिन यह गलत सोच थी . गुजरात जैसे राज्य दुनिया भर के उद्योगपतियों को अपनी तरफ खींचने के लिए तरह तरह की सुविधाएं देते थे . लोग उन्हीं राज्यों में  जाते रहे . अपने कार्यकाल के अंतिम दो वर्षों में अखिलेश यादव ने राज्य में उद्योग लगवाने और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए गंभीर प्रयास किया था . करीब पचास हज़ार करोड़ के औद्योगिक निवेश के समझौते भी हुए थे लेकिन असली निवेश पांच सौ करोड़ से कम ही हुआ . उनके पास समय कम था और  उनके परिवार के लोग भी उनकी टांग पूरी तरह से खींचते रहे . अपने कार्यकाल के अंतिम  दो वर्षों में उन्होंने खुद फैसले लेने का फैसला किया . नतीजा या हुआ कि बुनियादी ढाँचे और निवेश की दिशा में कुछ अहम क़दम उठाये गए लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.आगरा-लखनऊ सडक एक प्रमुख उदाहरण है . विधान सभा चुनाव आये और निजाम बदल गया .
उतर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री ने राज्य में औद्योगिक विकास के लिए कुछ  क़दम उठाया है .. इसी सिलसिले में वे हैदराबादबंगलूरू और मुंबई गए थे . मुंबई में उन्होंने बाकायदा रोड शो किया . देश के बहुत बड़े उद्यमियों से मुलाक़ात की . रतन टाटामुकेश अंबानीएचडीएफसी के दीपक पारेख के अलावा कुमारमंगलम बिड़ला ग्रुपमहिंद्राएलएंडटीटोरंट ग्रुप,बजाज ग्रुप के प्रतिनिधियों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और प्रदेश में निवेश में रूचि दिखाई .सभी उद्यमियों ने कानून व्यवस्था की बात को गंभीरता से उठाया क्योंकि जैसी कानून व्यवस्था गाज़ियाबाद,नोयडा और ग्रेटर नोयडा में हैं उसके सहारे तो कोई भी उद्योगपति यहाँ उद्योग नहीं लगाना चाहेगा .मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया कि कानून व्यवस्था की स्थति सुधर रही है. उसको और भी मज़बूत किया जायेगा .
.
आम तौर पर इस तरह के रोड शो के बाद मान लिया जाता  है कि सब ठीक   हो गया है लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश में ऐसा नहीं हो रहा है.जो भी बातें योगी की मुंबई यात्रा के दौरान हुयी हैं उनके फालो अप के लिए एक कोर कमेटी बनाई गयी  है. इस कमेटी में उद्योग मंत्री सतीश महाना के अलावा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट के कमिश्नर अनूप पाण्डेय औद्योगिक विकास के प्रमुख सचिव आलोक सिन्हा और  खादी एवं  हैंडलूम के प्रमुख सचिव नवनीत सहगल को शामिल किया गया है .मुख्यमंत्री के सूचना सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने बताया कि हर बड़े औद्योगिक केंद्र के लिए बिलकुल अलग नीतियाँ रहेंगी. उसमें किसी तरह की दुविधा नहीं है .  मुख्यमंत्री फरवरी में होने वाली इन्वेस्टर सम्मिट के लिए निजी तौर पर हर काम की निगरानी कर रहे हैं . अधिकारियों को ज़िम्मा दिया गया है कि मुख्यमंत्री से बातचीत में उद्योगपतियों ने जो वायदे किये हैं उनका सही फालो अप किया जाए .

यह सारी बातें तो पिछली सरकारों में भी होती रही हैं लेकिन ज़रूरी है कि बुंदेलखंड और पूर्वांचल के पिछड़े जिलों में बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश की हालात पैदा किये जाएँ .अगर बुन्देलखंड और पूर्वांचल को प्राथमिकता दी गयी तो फर्क पडेगा और यही योगी सरकार की परीक्षा भी है . यह दोनों ही इलाके राज्य में सबसे पिछड़े और पीड़ित हैं . ग्रामीण नौजवानों की बहुत बड़ी संख्या इन्हीं इलाकों से बड़े शहरों के लिए पलायन करती है . सरकार को प्रयास करना चाहिए  कि इन क्षेत्रों में उद्योग लगाये और उसके  साथ साथ ऐसे नए शहरों की स्थापना की जाए जहां उद्योगों में काम करने वाले लोगों को शिक्षा,इलाज और यातायात की सुविधा मिल सके. खेती से सम्बंधित उद्योगों की भी बड़े पैमाने पर स्थापना होनी चाहिए जिससे किसान को खेती छोड़ कर  मजदूरी करने के लिए मजबूर  न होना पड़े. इन कार्यों के  लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति सबसे ज़रूरी शर्त है लेकिन उनको लागू करने के लिए सक्षम नौकरशाही भी बहुत ज़रूरी है . यह देखना दिलचस्प होगा कि योगी सरकार पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर क्या राज्य के विकास के लिए ज़रूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति जुटाकर राज्य के हित में मज़बूत फैसले ले सकती है कि नहीं . हालांकि सरकार की तरफ से यह दावा किया गया कि सब को मिलाजुला कर काम किया जा रहा है .
उत्तर प्रदेश में पिछले पचीस वर्षों में विकास की सारी योजनायें मुकामी विधायकों और सांसदों की लालच की भेंट चढ़ जाती रही हैं . गौतमबुद्ध नगर जिले में देखा गया है कि हर विकास कार्य  राजनीतिक नेताओं और दलालों की स्वार्थ की भेंट चढ़ जाता है . तर्क यह भी दिया जाता रहा है कि मायावती और अखिलेश यादव के अलावा सभी सरकारें गठबंधन सरकारें थीं इसलिए सहयोगी पार्टियों और नेताओं की मनमानी को रोकना संभव नहीं था .वर्तमान सरकार में भी पुरानी सरकारों के बहुत सारे कार्यकर्ता हिन्दू युवा वाहिनी के सदस्य के रूप में अपना धंधा शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं . योगी सरकार को इन तत्वों पर लगाम लगाना होगा . कुछ  मंत्री और नेता अभी भी वसूली के काम में पहले की तरह की लग गए हैं .इन लोगों को भी काबू में करना पडेगा .अगर सही औद्योगिक विकास का इंजन मुख्यमंत्री की निजी निगरानी में चल पडेगा तो राज्य में आर्थिक विकास  की संभावना बढ़ेगी और छोटे मोटे दलाल और नेता खुद ही शांत हो जायेगें . राज्य सरकार को यह समझना पडेगा कि तेज़ औद्योगिक विकास के बिना न तो बेरोजगारी की समस्या ख़त्म होगी और न ही आम नागरिक का जीवन सुगम होगा .और अगर  नौजवानों में बेरोजगारी की समस्या ख़त्म न हुयी तो असंतोष की जो ज्वाला महाराष्ट्र में देखने को मिली है वह उत्तर प्रदेश में भी देखी जायेगी . शिक्षा माफिया , नक़ल माफिया आदि से भी राज्य को मुक्त कराना पडेगा . इस तरह के ज़्यादातर अपराधी देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं . इनको हर हाल में नेस्तनाबूद करना पड़ेगा . यह  आसान नहीं है क्योंकि शिक्षा माफिया तो ज्यादातर सत्ताधारी पार्टी और विपक्षी पार्टी के नेता ही हैं . इनकी गतिविधियों के कारण जो बच्चे यहाँ से शिक्षा लेकर काम की तलाश में निकलते हैं , उनको कहीं काम नहीं मिलता. इसलिए औद्योगिक विकास से रोज़गार पैदा करने के साथ साथ समाज में शिक्षा के नाम पर हो रही ठगी को भी रोकना होगा .

उत्तर कर्नाटक में किसानों का आन्दोलन ९०० दिन से लगातार जारी


शेष नारायण सिंह

बंगलूरू ,२ जनवरी . उत्तर कर्नाटक के गदग जिले के नारगुंड में चल रहे किसानों का संघर्ष ९०० दिन से अधिक से लगातार जारी है. महादायी नदी के पानी में  कर्नाटक के अधिकार को लेकर चल रहा आन्दोलन राज्य के इतिहास में सबसे अधिक समय तक चलने वाला किसान आन्दोलन है .किसानों ने नए साल पर संकल्प लिया है कि जब तक मामले का संतोषजनक हल नहीं हो जाता ,संघर्ष जारी रहेगा .
कर्नाटक रैयत सेना के अध्यक्ष वीरेश सोबरदमथ का कहना है कि किसानों की एक ही मांग है कि गोवा और महाराष्ट्र की ओर से कलसा-बन्दूरी नहर प्रोजेक्ट में पड़ रहे अड़ंगे का हल निकाल लिया जाए . जिससे ७.५ टी एम सी पानी  मलप्रभा नदी में डाला जा सके .कई दशक से सूखा पड़ रहा है और सरकार से किसी तरह की मदद नहीं मिल रही है  . कर्नाटक रैयत सेना इस आन्दोलन की अगुवाई कार रही  है . वीरेश सोबरदमथ का कहना है कि २००९ की बाढ़ के बाद उत्तर कर्नाटक में जो सूखा  पड़ा उसने किसानों को तबाह कर दिया . पानी के बंटवारे को लेकर नेताओं की बेरुखी ने  किसानों को कहीं का नहीं छोड़ा है .उनका दावा है कि उनको संघर्ष का रास्ता  मजबूरी में अपनाना पड़ा है .  किसानों का दावा है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की मांग पर सकारात्मक रुख अपनाया होता और गोवा ,महारष्ट्र और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों के बीच एक सर्वमान्य हल निकलवाया होता तो समस्या कभी की हल हो चुकी होती .

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में नदी जल बंटवारा भी एक मुद्दा


शेष नारायण सिंह 

बंगलूरू, ३० दिसंबर. कर्णाटक में चुनाव में जातियां प्रमुख भूमिका निभाती हैं ,लेकिन इस बार  गोवा और कर्नाटक के बीच में महादायी नदी के पानी के बंटवारे को मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया ने बड़ा मुद्दा बना दिया है . राज्य के पांच उत्तरी  जिलों में यह विवाद राजनीति का मुख्य मुद्दा है . गदग,धारवाड़ बेलगावी ,हावेरी,और बागलकोट जिलों की पानी की ज़रूरत को पूरा करने में महादायी नदी का बड़ा योगदान है .इन राज्यों में बाक़ायदा बंद का नारा दिया गया ज बहुत ही सफल रहा . गोवा सरकार और उसके मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर के खिलाफ हुए इस बंद में किसान संगठनों की मुख्य भूमिका थी लेकिन फिल्म उद्योग सहित और भी कई संगठनों ने बंद का समर्थन किया .

महादायी नदी को  गोवा में मंडोवी नदी कहते हैं . दोनों राज्यों के बीच तीस साल से पानी के बंटवारे के बारे में विवाद चल रहा है . बात बहुत बढ़ गयी जब २००२ में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा ने महादायी की दो सहायक  नदियों पर बाँध बना कर सूखा प्रभावित उत्तर कर्नाटक के जिलों के लिए पानी का इंतज़ाम करने के लिए बाँध बनाने का फैसला किया . केंद्र की अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने मंजूरी भी दे दी लेकिन गोवा के मुख्यमंत्री ने अडंगा लगा दिया . मनोहर पर्रीकर ही तब भी मुख्यमंत्री थे.

कर्णाटक के मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया ने आरोप लगाया है कि गोवा के भाजपाई मुख्यमंत्री पानी नहीं दे रहे हैं और राज्य के बीजेपी नेता कुछ भी नहीं कर रहे हैं . उनका आरोप  है कि पानी की कमी के लिए बीजेपी ही ज़िम्मेदार है. उत्तर कर्णाटक में चल  रहे आन्दोलन के नेता भी मुख्यमंत्री की बात को सही मान रहे  हैं .वे भी बीजेपी के कर्णाटक अध्यक्ष बी एस येदुरप्पा को ही सारी मुसीबत के लिए ज़िम्मेदार साबित करने की कोशिश का रहे हैं .येदुरप्पा के नाम गोवा के मुख्यमंत्री ने एक चिट्ठी भी लिख दी है लेकिन आन्दोलन कारी कहते हैं कि किसी पार्टी नहीं राज्य सरकार के पास चिट्ठी आनी चाहिए थी. चुनाव नतीजों पर महादायी नदी का पानी एक अहम भूमिका निभाने वाला है . आज बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह बेंगलूरू पंहुच रहे हैं उनका राज्य के नेताओं से बेंगलूरू में मिलकर चुनाव की तैयारी की समीक्षा की योजना है. दस जनवरी से वे यहाँ सघन अभियान चलाने वाले हैं.  अमित शाह चुनाव जीतने की कला  के ज्ञाता हैं . चर्चा यह भी है कि क्या वे गुजरात की तरह वे कर्णाटक में भी जीत दर्ज कर  पाते हैं कि नहीं .

कर्नाटक विधानसभा चुनाव येदुरप्पा और सिद्दिरमैया की हैसियत का पैमाना होगा



शेष नारायण सिंह  


गुजरात के बाद अगला बड़ा चुनाव कर्णाटक विधान सभा का होगा . चुनाव की तैयारी
  पूरी शिद्दत से शुरू ही गयी है . बीजेपी ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद  तत्कालीन मुख्यमंत्री येदुरप्पा को हटा दिया था  लेकिन अब उनके पास ही राज्य में पार्टी की कमान थमा है . पार्टी में भारी मतभेद हैं  लेकिन  पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उम्मीद का दिया जला दिया है . अमित शाह मूल रूप से आशावादी हैं . उन्होंने आशा की किरण तो  त्रिपुरा और केरल में भी दिखाना शुरू कर दिया है कर्नाटक में तो खैर उनकी अपनी सरकार रह चुकी है .अब  बीजेपी को राजनीतिक जीवन में शुचिता भी बहुत ज़्यादा नहीं चाहिए क्योंकि हाल के यू पी और उत्तराखंड के  विधानसभा चुनावों में पार्टी ने कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों के उन नेताओं को टिकट दिया और मंत्री बनाया जिनके खिलाफ बीजेपी के ही प्रवक्ता  गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहते तह. गोवा और मणिपुर में भी जिस स्टाइल में सरकारें बनायी  गयींवह भी बीजेपी की पुरानी वाली शुचिता की राजनीति से बहुत दूर माना जा रहा है . इस पृष्ठभूमि में जब दोबारा येदुरप्पा को कर्नाटक की पार्टी सौंपने का  फैसला आया तो कोई ख़ास चर्चा नहीं हुयी.कर्नाटक की प्रभावशाली जाति लिंगायत से आने वाले  येदुरप्पा का प्रभाव राज्य में है .पार्टी को उम्मीद है कि लिंगायत समूह का साथ तो मिल ही जाएगा और अगर पार्टी के अन्य बड़े नेता ईश्वरप्पा का जातिगत असर चल गया तो अच्छी संख्या में समर्थन मिल जाएगा  . यह देखना दिलचस्प कि कुरुबा जाति के ईश्वरप्पा  की ही बिरादरी के मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया भी हैं . उनकी जाति की संख्या खासी है .जाति के दोनों नेता आमने सामने हैं ,नतीजों पर इस का भी असर पडेगा .

विधान सभा चुनावों की तैयारी सिद्दिरमैया ने बहुत पहले से शुरू कर दी थी  . उन्होंने दलितों को अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही साधना शुरू कर दिया था. दलितों के लाभ के लिए मुख्यमंत्री ने २०१७ के बजट में  ही  बहुत सारी योजनायें लागू कर दी थीं .बजट के बाद भी ऐसी योजनाओं की घोषणा की जिसके तहत जून २०१७ में ही दलितों के लिए बहुत सारी योजनायें तुरंत प्रभाव से लागू की कर दी गईं . सरकारी संस्थाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे दलित छात्रों को मुफ्त में लैपटाप तो पहले से ही था अब  निजी स्कूल कालेजों में पढने वाले  दलित छात्रों को भी यह सुविधा दी जा रही है .दलित छात्रों को   बस पास बिलकुल मुफ्त में मिलता है.  . दलित जाति के लोगों को ट्रैक्टर या टैक्सी खरीदने पर  दो लाख रूपये की सब्सिडी  मिलती थी ,उसको अब  तीन लाख कर दिया गया है . ठेके  पर काम करने वाले गरीब मजदूरों पौरकार्मिकोंको अब तक रहने लायक घर बनाने के लिए  दो लाख रूपये का अनुदान मिलता था,अब उसे चार लाख कर दिया गया है .  यह सब काम डेढ़ साल पहले से ही योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है .

कर्णाटक में  माना जाता था कि वोक्कालिगा और लिंगायतसंख्या के हिसाब से  प्रभावशाली जातियां हैं . सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया  ने जाति के आधार पर जनगणना करवाई . इस जनगणना के नतीजे सार्वजनिक नहीं किये जाने थे लेकिन करीब दो साल पहले  कुछ पत्रकारों के मार्फ़त यह जानकारी सार्वजनिक कर दी गयी  . सिद्दिरामैया की जाति के लोगों की संख्या ४३ लाख यानी करीब ७ प्रतिशत बतायी गयी . यह जानकारी अब पब्लिक डोमेन में आ गयी है जिसको सही माना जा रहा है. इस नई जानकारी के  बाद कर्णाटक की चुनावी राजनीति का हिसाब किताब बिलकुल नए सिरे से शुरू हो गया है .नई जानकारी के बाद लिंगायत ९.८ प्रतिशत और वोक्कालिगा ८.१६ प्रतिशत रह गए हैं .  कुरुबा ७.१ प्रतिशत मुसलमान १२.५ प्रतिशत ,  दलित २५ प्रतिशत ( अनुसूचित  जाती १८ प्रतिशत और अनुसूचित जन जाति ७ प्रतिशत ) और ब्राह्मण २.१ प्रतिशत की संख्या में राज्य में रहते हैं .
अब तक कर्नाटक में माना जाता था कि लिंगायतों की संख्या १७ प्रतिशत है और वोक्कालिगा १२ प्रतिशत हैं . इन आंकड़ों को कहाँ से निकाला गया ,यह किसी को पता नहीं था लेकिन यही आंकड़े चल रहे थे और सारा चुनावी विमर्श इसी पर केन्द्रित हुआ करता था  . नए आंकड़ों के आने के बाद सारे समीकरण बदल गए हैं .  इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल राज्य की प्रभावशाली जातियों ने सवाल उठाये हैं लेकिन यह भी सच है कि दलित  नेता इस बाद को बहुत पहले से कहते  हैं . दावा किया जाता रहा है कि अहिन्दा ( अल्पसंख्यक,हिन्दुलिदा यानी ओबीसी  और दलित )  वर्ग एक ज़बरदस्त समूह है . जानकार मानते हैं  कि  समाजवादी सिद्दिरामैया ने चुनावी फायदे के लिए अहिन्दा का गठन गुप्त रूप से करवाया  है . मुसलमान दलित और सिद्दिरामैया की अपनी जाति कुरुबा मिलकर करीब ४४ प्रतिशत की आबादी बनते हैं .  जोकि मुख्यमंत्री के लिए बहुत उत्साह का कारण हो सकता है .इसीलिये दलितों को साथ लेने के लिए मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल के शुरू से ही कई योजनाओं को लागू किया था .

जातियों के आधार पर चुनाव के गणित को उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए हुए चुनावों में बुरी तरह से चुनौती मिल चुकी है .वहां नरेंद्र मोदी की लहर में सभी जातियों के कुछ लोगों ने बीजेपी को  वोट दिया लेकिन  कर्नाटक में ऐसी कोई लहर नहीं दिख रही है . ज़ाहिर है यहाँ विकास और राज्य स्तर के मुद्दे चुनाव को प्रभावित करेंगे .

जातियों के इस भ्रम जाल में एक और मुद्दा पूरी गंभीरता से चुनाव में शामिल हो गया है . गोवा और कर्नाटक के बीच में महादायी नदी के पानी के बंटवारे पर आजकल राज्य में ज़बरदस्त राजनीति चल रही है . राज्य के पांच उत्तरी  जिलों में यह विवाद राजनीति का मुख्य मुद्दा है . गदग,धारवाड़ बेलगावी ,हावेरी,और बागलकोट जिलों की पानी की ज़रूरत को पूरा करने में महादायी नदी का बड़ा योगदान है .इन राज्यों में बाक़ायदा बंद का नारा दिया गया ज बहुत ही सफल रहा . गोवा सरकार और उसके मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर के खिलाफ हुए इस बंद में किसान संगठनों की मुख्य भूमिका थी लेकिन फिल्म उद्योग सहित और भी कई संगठनों ने बंद का समर्थन किया .

महादायी नदी को  गोवा में मंडोवी नदी कहते हैं . दोनों राज्यों के बीच तीस साल से पानी के बंटवारे के बारे में विवाद चल रहा है . बात बहुत बढ़ गयी जब २००२ में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा ने महादायी की दो सहायक  नदियों पर बाँध बना कर सूखा प्रभावित उत्तर कर्नाटक के जिलों के लिए पानी का इंतज़ाम करने के लिए बाँध बनाने का फैसला किया . केंद्र की अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने मंजूरी भी दे दी लेकिन गोवा के मुख्यमंत्री ने अडंगा लगा दिया . मनोहर पर्रीकर ही तब भी मुख्यमंत्री थे.

कर्णाटक के मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया ने आरोप लगाया है कि गोवा के भाजपाई मुख्यमंत्री पानी नहीं दे रहे हैं और राज्य के बीजेपी नेता कुछ भी नहीं कर रहे हैं . उनका आरोप  है कि पानी की कमी के लिए बीजेपी ही ज़िम्मेदार है. उत्तर कर्णाटक में चल  रहे आन्दोलन के नेता भी मुख्यमंत्री की बात को सही मान रहे  हैं .वे भी बीजेपी के कर्णाटक अध्यक्ष बी एस येदुरप्पा को ही सारी मुसीबत के लिए ज़िम्मेदार साबित करने की कोशिश का रहे हैं .येदुरप्पा के नाम गोवा के मुख्यमंत्री ने एक चिट्ठी भी लिख दी है लेकिन आन्दोलन कारी कहते हैं कि किसी पार्टी नहीं राज्य सरकार के पास चिट्ठी आनी चाहिए थी. चुनाव नतीजों पर महादायी नदी का पानी एक अहम भूमिका निभाने वाला है . दिसम्बर के अंतिम दिन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का राज्य के नेताओं से बेंगलूरू में मिलकर चुनाव की तैयारी की समीक्षा की योजना है. दस जनवरी से वे यहाँ सघन अभियान चलाने वाले हैं.  अमित शाह चुनाव जीतने की कला  के ज्ञाता हैं . देखना होगा कि गुजरात की तरह वे कर्णाटक में भी जीत दर्ज कर  पाते हैं कि नहीं .

चुनाव अभियान शुरू हो गया है लेकिन अभी चर्चा में पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौडा की पार्टी का ज़िक्र बहुत कम आ रहा है . उनके बेटे एच डी कुमारस्वामी मज़बूत नेता रहे हैं मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं लेकिन अब लगता है कि अमित शाह के पूरे समर्थन से मैदान में आये येदुरप्पा और कांग्रेस की अकेली उम्मीद सिद्दिरमैया के बीच होने जा रहे चुनाव में वे या तो वोटकटवा साबित होंगें या किसी के साथ मिल जायेगें .

Friday, December 29, 2017

गुजरात विधानसभा चुनाव:२०१७,राहुल गांधी को रोकने में आदित्यनाथ योगी की बड़ी भूमिका


 शेष नारायण सिंह
गुजरात चुनाव के नतीजे आ गए . राज्य सरकार बीजेपी के हाथ रही लेकिन विपक्षी राजनीति का एक नया व्याकरण भी रचा गया . अभी बहुत ही  शुरुआती मामला है लेकिन राहुल गांधी ने कांग्रेस के नेता  के रूपमें राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश की और कुछ हद तक सफल रहे . राजनीतिक प्रक्रिया कोई  एक दिन का काम नहीं है उसको पकने में वक़्त लगता है लेकिन संकेत नज़र आने लगे हैं . बीजेपी ने  राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन के लिए हिन्दू धर्म का प्रयोग करने की जो  योजना बनाई उसकी बहुत ही दिलचस्प कहानी है . १९७७ में जनता पार्टी में शामिल पुरानी जनसंघ के लोग अपने मूल संगठन ,आर एस एस के प्रति हमेशा वफादार रहे हैं . १९७८ में जब मधु लिमये ने ऐलान किया कि जनता पार्टी में शामिल लोग आर एस एस से नाता तोड़ लें तो बहुत विवाद हुआ. आर एस एस वालों ने कहा कि उनका संगठन राजनीतिक पार्टी नहीं है  लेकिन मधु लिमये  ने बात को  बहुत आगे बढ़ा दिया और बात इतनी बढ़ गयी कि आर एस एस ने अपने लोगों को जनता पार्टी से अलग कर लिया और भारतीय जनता पार्टी का गठन कर दिया .शुरू में इस नई पार्टी ने उदारतावादी राजनीतिक सोच को अपनाने की कोशिश की . दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद और गांधीवादी समाजवाद जैसे राजनीतिक दर्शन को अपनी बुनियादी सोच का आधार बनाने की बात की गयी . लेकिन जब १९८४ के लोकसभा चुनाव में ५४२ सीटों वाली लोकसभा में बीजेपी को केवल दो सीटें मिलीं तो उदार राजनीतिक संगठन के रूप में राजनीति करने  का विचार हमेशा के लिए दफन कर दिया गया . जनवरी १९८५ में कलकत्ता में आर एस एस के टाप नेताओं की बैठक हुई जिसमें तत्कालीन बीजेपी के कर्ता धर्ता ,अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी को भी बुलाया गया और साफ़ बता दिया गया कि अब हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को चलाया जाएगा . वहीं तय कर लिया गया कि अयोध्या के बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद को केंद्र में रख कर राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन किया जाएगा . आर एस एस के दो संगठनोंविश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल को इस प्रोजेक्ट को चलाने का जिम्मा दिया गया. अयोध्या के  पड़ोसी जिले गोरखपुर में स्थित गोरक्षनाथ पीठ के महंत अवैद्यनाथ ने अपने कारणों से इसमें शामिल होने का फैसला किया .उनका कारण भावनात्मक ज्यादा था क्योंकि उनके गुरु महंत  दिग्विजय नाथ ने ही १९४९ में अयोध्या में राम मंदिर के आन्दोलन की अगुवाई की थी  और बाबरी मस्जिद में रामलला की मूर्तियाँ रखवाई थी .  विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना १९६६ में हो चुकी थी लेकिन वह सक्रिय नहीं था. १९८५ के बाद उसे सक्रिय किया गया . बीजेपी की राजनीति में शुद्ध हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति का युग आ गया . १९८५ से अब तक बीजेपी हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को ही अपना स्थायी भाव मानकर चल रही है . जब बीजेपी ने हिन्दू राष्ट्रवाद को अपने राजनीतिक दर्शन के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया तो हिन्दू धर्म को मानने वाले बड़ी संख्या में उसके साथ जुड़ते  गए  . अयोध्या के भगवान राम के इर्द गिर्द ही  बीजेपी ने जनता को एकजुट करने का फैसला किया .  राजनीतिक विचारक माज़िनी के विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित वी डी सावरकर की किताब हिंदुत्व की विचारधारा पर काम करने वाले आर एस एस ने हिंदुत्व और श्री राम को अपनी राजनीति के केंद्र में रखने का जो फैसला लिया वह आज तक चला आ रहा है .
इस रणनीति का बीजेपी को फ़ायदा भी खूब  हुआ . १९८४ में दो सीट लाने  वाली पार्टी ने  अयोध्या के आन्दोलन के बाद अपनी राजनीतिक ताकत बहुत बढ़ा ली है. कांग्रेस में दरबारी संस्कृति के चलते किसी भी विचारधारा  को चुनौती देने की स्थिति  रह ही नहीं गयी है . जब वी एच पी ने भगवान राम को केंद्र में रख कर राजनीतिक लामबंदी की राजनीति शुरू की तो राजीव गांधी उनके  चक्रव्यूह में फंस गए . उसी तरह से पी वी  नरसिम्हा राव ने भी राम की राजनीति का कोई विकल्प तलाशने की कोशिश नहीं की . वे बार बार कहते तो थे कि वे  बीजेपी से तो लड़ सकते थे लेकिन राम जी से लड़ना उनके बस की बात नहीं थी. लेकिन उन्होंने भी किसी राजनीतिक योजना पर काम नहीं किया .
भगवान राम वास्तव में विष्णु के अवतार  हैं . इसलिए वैष्णव  परम्परा के धार्मिक  अनुष्ठानों में उनका बहुत ही अधिक महत्व है . लेकिन आर एस एस की कोशिश यह है कि उनको  हिन्दू  धर्म के सभी सम्प्रदायों का आराध्य देव सिद्ध कर दिया जाए . पिछले तीस  वर्षों से इसी पर  बीजेपी का राजनीतिक  फोकस बना रहा . बीजेपी एजेंडा तय करती रही और कांग्रेस उस पर प्रतिक्रिया देती रही . बीजेपी के अभियान का ही नतीजा है कि कांग्रेस को राम विरोधी और हिन्दू विरोधी पार्टी के रूप में प्रस्तुत करने में बीजेपी को सफलता मिली . जहां पूरे देश में भगवान  राम की मान्यता है वहीं    कांग्रेस के कुछ लोग राम की ऐतिहासिकता पर बहस करते रहे . यह बीजेपी के लिए बहुत ही सुविधा जनक स्थिति  रही .  कभी दिग्विजय सिंह   को तो कभी शुशील कुमार शिंदे को हिन्दू विरोधी साबित  करने  का काम चलता रहा . कांग्रेस के मुख्यालय में  बैठे नेता लोग आपस में ही  एक दूसरे की जड़ों में  मट्ठा डालते रहे . भगवान  राम को केंद्र में रखकर एकेश्वरवादी हिन्दू समाज स्थापित करके उसका इंचार्ज बनने की आर एस एस की योजना को तीस वर्षों में एक बार भी ललकारा नहीं गया . लेकिन अब हालात बदले हैं. ऐसा लगता  है  कि राहुल  गांधी को को बहुत ही सुलझा  हुआ सलाहकार मिल गया है .
इसी राजनीतिक घटनाक्रम का  नतीजा है कि इस बार के  गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी मंदिर मंदिर घूमते रहे . उनके मंदिर जाने की राजनीति को बीजेपी और उसके मातहत लोगों ने बहुत ही ज्यादा चर्चा में लाने की कोशिश की . पूरी दुनिया को बता दिया गया कि राहुल  गांधी ने कांग्रेस को सेकुलर राजनीति से अलग कर दिया है . मुसलमानों  की मस्जिदों  या दरगाहो में नहीं जा रहे  हैं . ऐसा लगता है कि राहुल गांधी की मंदिर यात्राओं में एक नया पैटर्न था . इंदिरा गांधी के बाद वे पहले कांग्रेसी बने जिन्होंने अपना एजेंडा फिक्स करने की  कोशिश की . वे राम को एक मोनोलिथिक  देवता के रूप में स्थापित करने की कोशिशों पर सवालिया निशान लगाने की कोशिश कर रहे थे और उसमें पूरी तरह सफल हुए .  कुछ वैष्णव  ठिकानों को छोड़ दिया जाए तो तो ज़्यादातर ऐसे  मंदिरों में गए जो शैव मतावालाम्बियों के हैं या शक्ति के उपासकों के हैं . शक्ति के उपासक शैव परम्परा  के बहुत ही  करीबी होते हैं .  सोमनाथ मंदिर के अलावा वे करीब बीस मंदिरों में  गए जो गैर वैष्णव हैं .राहुल गांधी ने बाक़यदा प्रेस  के सामने घोषित किया कि वे शिव भक्त हिन्दू  हैं . ऐसा लगता  है कि वे  यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि  भगवान राम के नाम पर पूरे देश के धार्मिक लोगों को एक ही जगह पर इकठ्ठा करने की कोशिश को सफल नहीं होने देंगें . दुनिया में बहुत से राजनीतिक धर्म हैं , जहां एक ही आराध्य होता है और उसी के नाम पर समाज की एकता की कोशिश की जाती है . मसलन इसाई मजहब में बहुत सारे वर्ग ज़रूर हैं लेकिन सब का केंद्र बाइबिल में वर्णित ईश्वर ही है . पोप का असर सभी ईसाईयों पर है . इस्लाम में भी ७२  सम्प्रदाय हैं लेकिन सबके आराध्य हज़रत मुहम्मद ही हैं  और कुरआन में ही अंतिम सत्य अंकित है . आर एस एस की कोशिश भी यही रही होगी कि भगवान   राम को सब हिन्दुओं का आराध्य बना दिया जाए और उसी के ज़रिये हिन्दू मात्र की एकता का प्रयास किया जाए . प्राचीन काल में भारत में शैवों, वैष्णवों , शाक्तों, आदि के बीच बहुत सारे संघर्षों की बातों का भी इतिहास में उल्लेख है . ऐसी स्थिति में सारे हिन्दुओं को एक ही  रंग में रंग देने का प्रोजेक्ट  मुश्किल तो बहुत है लेकिन उस दिशा में भगवान राम के सहारे सफलता मिलना शुरू  हो गयी थी. राहुल गांधी का शंकर जी के विभिन्न स्वरूपों के मंदिरों में फेरी लगाना   एक राजनीतिक उदेश्य था .और बीजेपी की राम केन्द्रित राजनीति को आइना दिखाना  भी उनका मकसद लगता है .
राहुल गांधी अपने गुजरात चुनाव के अभियान के दौरान  पूरे गुजरात में वे ज्यादातर ऐसे ही मंदिरों में गए जो शैव  परंपरा के मंदिर थे .वीर मेघमाया मंदिरबहुचारजी मंदिरखोडि़यार मंदिरशामलाजी मंदिर,आदि मंदिर राजनीतिक हिंदुत्‍व की योजना पर सीध हमला करते हैं .  सावरकरवादी हिंदुत्‍व सब कुछ भगवान राम या वैष्णव मत में घेर देने की कोशिश करता है .जबकि हिन्दू धर्म की विविधता ही  यही है कि वह बहुत से देवताओं को आराध्य मानता है . मेरे गाँव में नीम के पेड़ में विराजने वाली काली माई पूरे गाँव की श्रद्धा की देवी हैं  जहां  दलित भी जाते हैं और ब्राह्मण भी . यह आदिकाल से चला  आ रहा है .इसी तरह से देश भर में  गांव का आदमी राम के अलावा भी तमाम भगवानों को पूजता है। उसके लिए उसका मुकामी देवता ज्‍यादा पूजनीय  है।
 राहुल गांधी के इस अभियान का मर्म बीजेपी को अच्छी तरह से मालूम था . इसीलिए जय श्री राम का नारा लागाने वालों के अलावा भी शिवभक्ति के राहुल  गांधी के काम  को उनसे बड़ी लाइन खींच कर छोटा करने की   कोशिश की गयी . इसी सिलसिले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गुजरात चुनाव में मुख्य स्टार प्रचारक के रूप में  प्रस्तुत किया गया . योगी आदित्य नाथ शैव  परम्परा के सबसे प्रमुख मठों में से एक , गोरक्षनाथ मंदिर एवं मठ के महंत हैं . उनकी परम्परा में मत्स्येन्द्र नाथ, गोरख नाथ , जालंधर नाथ  इत्यादि महत्वपूर्ण संत हुए हैं . नाथ परमपरा की शुरुआत स्वयं शंकर जी से होती है , वे ही उनके आदि नाथ हैं . इतिहास में सबसे ज़्यादा नाम गुरु गोरखनाथ का है.  उन्होंने चालीस ग्रंथों की रचना की थी , सभी उपलब्ध नहीं हैं लेकिन १४ आज भी मिल जाते हैं . उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया था और जगह जगह मठों की स्थापना की थी .गुजरात में भी  शैव मतावलम्बियों में  गोरखनाथ मंदिर  का बहुत सम्मान है . शायद यही कारण है कि सौराष्ट्र  ,जहां बीजेपी की हालत बहुत ही खराब थी , वहां भी बड़ी संख्या में सीटें उसके  हाथ आई हैं  सौराष्ट्र के सभी सभी जिलों की कमज़ोर सीटों पर योगी आदित्यनाथ ने प्रचार किया था ..
योगी आदित्यनाथ चुनाव  प्रचार के लिए गुजरात के ३३ में से २९ जिलों में गए , ३५ चुनाव सभाएं कीं . जहां भी गए सरकारी तामझाम से दूर आश्रमों में ही  ठहरे . शायद इसीलिये जहाँ जहां गए उन सभी सीटों पर एकाध को छोड़कर बीजेपी की जीत हुयी . जहां राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी का स्ट्राइक रेट ५० प्रतिशत बताया  जा रहा है , वहीं योगी आदित्यनाथ का स्ट्राइक रेट ९५ प्रतिशत रहा .
देश की राजनीतिक को धार्मिक बनाकर एक ही देवता को केंद्र में रखने की आर एस एस की योजना पर गुजरात  चुनाव में राहुल गांधी और योगी आदित्यनाथ  का यह एहसान रहेगा  कि उन्होंने हिन्दू धार्मिकता को उसकी विविधता का पुराना मौलिक आयाम फिर से दिया . इसके बाद यह भी तय हो गया कि कांग्रेस भी हिन्दू विरोधी टैग से बाहर आ चुकी है और यह भी कि एक ही देवता के नाम पर पूर्ण राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन संभव नहीं है . इसके अलावा  अब यह भी तय है कि आने वाले चुनावों में योगी आदित्यनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है .

Saturday, December 16, 2017

सोनिया गांधी ने कांग्रेस को दलदल से निकाला था , देखें राहुल क्या करते हैं .



शेष नारायण सिंह

राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी औपचारिक रूप से सम्भलवाकर सोनिया गांधी ने राजनीति से वानप्रस्थ की घोषणा की . वे कांग्रेस की राजनीति के शीर्ष तक पंहुची . इसके पीछे कारण यह था कि वे इंदिरा गांधी के बड़े बेटे की पत्नी थीं . सोनिया गांधी जब कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं और जिस तरह से बनीं ,वह कांग्रेस पार्टी के चापलूसी की परम्परा का एक प्रतिनिधि नमूना  है . संसद भवन के दो-तीन किलोमीटर के दायरे में देश के सर्वोच्च चापलूस हमेशा से ही विराजते रहे हैं . सत्ता चाहे जिसकी हो ये लोग उसके करीबी आटोमेटिक रूट से हो जाते हैं . सोनिया गांधी को भी इन्हीं चापलूसों ने ही कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आसीन किया था . लेकिन जिस तरह से उन्होंने खंड खंड होती कांग्रेस को फिर से केंद्रीय सत्ता के केंद्र में स्थापित करने का माहौल बनाया उससे लग गया कि वे संगठन के फन की माहिर हैं . सत्ता से पैदल कांग्रेस को अटल बिहारी वाजपेयी को हराने वाली पार्टी बना कर उन्होंने साबित कर दिया कि वे एक सक्षम नेता हैं . उन्होंने देश के गवर्नेंस माडल में बहुत सारे बदलाव किये . सूचना का अधिकार एक ऐसा हथियार है जो देश की ज़िम्मेदार राजनीति में हमेशा सम्मान से याद किया जाएगा . गड़बड़ तब शुरू हुई जब राहुल गांधी ने अपनी तरह के लोगों को कांग्रेस के केंद्र में घुसाना शुरू कर दिया .नतीजा यह हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की अथारिटी धूमिल होना शुरू हो गयी . और कांग्रेस फिर पतन के रास्ते पर चल पड़ी . राहुल गांधी उस दौर में सी पी जोशी और मधुसूदन मिस्त्री नाम के लोगों पर बहुत ज़्यादा भरोसा करने लगे . सी पी  जोशी की एक उपलब्धि यह है कि वे विधान सभा का चुनाव एक  वोट से हारे थे और मधुसूदन मिस्त्री की सबसे बड़ी उपलब्धी यह है कि वे वडोदरा से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में अपने विरोधी उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का पोस्टर फाड़ने बिजली के खम्बे पर चढ़े थे . राहुल की अगुवाई में यह उत्तर प्रदेश की राजनीति के इंतज़ाम के कर्ता  धर्ता बनाये गए थे . राहुल गांधी ने कांग्रेस को .ऐसे लोगों के हवाले कर दिया जिनकी राजनीति में समझ न के बराबर थी . नतीजा सामने है. कांग्रेस उत्तर प्रदेश में शून्य के आस पास पंहुच चुकी है .

अब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं .नई दिल्ली की राजनीति के बारे में रिपोर्ट करने वालों को मालूम है कि किस तरह से राहुल गांधी २०११ के बाद सोनिया गांधी के ज़्यादातर फैसलों को पलट दिया करते थे. नई दिल्ली के प्रेस क्लब में एक अध्यादेश के कागजों को फाड़ते हुए राहुल गांधी को जिन लोगों ने देखा है उनको मालूम है कि यू पी ए -२ के समय राहुल गांधी मनमानी पर आमादा रहते थे . प्रियंका गांधी को २०१४ में प्रचार करने से रोकने के पीछे भी यही उनकी अपनी असुरक्षा काम कर रही थी . उनको यह मुगालता भी रहता था की सभी कांग्रेसी उनके  दास हैं .लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है . गुजरात चुनाव के दौरान  उन्होंने सभ्य आचरण  किया था और अब दुनिया जानती है कि राहुल  गांधी बदल गए हैं .

उन लोगों की बात से  भी सहमत नहीं हुआ जा सकता  जो कहते रहते हैं कि कांग्रेस की राजनीति में वंशवाद की शुरुआत जवाहरलाल  नेहरू ने की थी . उन्होंने तो इंदिरा गांधी को कभी चुनाव तक नहीं लड़ने दिया था . नई दिल्ली में विराजने वाले चापलूसों ने ही उनको शास्त्रीजी के मंत्रिमंडल में शामिल करवा दिया था . इंदिरा गाधी को  संसद की राज्यसभा का सदस्य बनने का मौक़ा भी शास्त्री जी   ने दिया , नेहरू ने नहीं . हाँ इंदिरा गांधी ने बाकायदा वंशवाद की  स्थापना की . कांग्रेस की मूल मान्यताओं को इंदिरा गांधी ने ही धीरे धीरे दफ़न किया .इमरजेंसी में तानाशाही निजाम कायम करके इंदिरा गाँधी ने अपने एक बेरोजगार बेटे को सत्ता थमाने की कोशिश की थी . वह लड़का भी क्या था. दिल्ली में कुछ लफंगा टाइप लोगों से उसने दोस्ती कर रखी थी और इंदिरा गाँधी के शासन काल के में वह पूरी तरह से मनमानी कर रहा था . इमरजेंसी लागू होने के बाद तो वह और भी बेकाबू हो गया . कुछ चापलूस टाइप नेताओं और अफसरों को काबू में करके उसने पूरे देश में मनमानी का राज कायम कर रखा था. इमरजेंसी लगने के पहले तक आमतौर पर माना जाता था कि कांग्रेस पार्टी मुसलमानों और दलितों की भलाई के लिए काम करती थी .हालांकि यह सच्चाई नहीं थी क्योंकि इन वर्गों को बेवक़ूफ़ बनाकर सत्ता में बने रहने का यह एक बहाना मात्र था . इमरजेंसी में दलितों और मुसलमानों के प्रति कांग्रेस का असली रुख सामने आ गया . दोनों ही वर्गों पर खूब अत्याचार हुए . देहरादून के दून स्कूल में कुछ साल बिता चुके इंदिरा गाँधी के उसी बिगडैल बेटे ने पुराने राजा महराजाओं के बेटों को कांग्रेस की मुख्य धारा में ला दिया था जिसकी वजह से कांग्रेस का पुराना स्वरुप पूरी तरह से बदल दिया गया था . अब कांग्रेस ऐलानियाँ सामंतों और उच्च वर्गों की पार्टी बन चुकी थी. ऐसी हालत में दलितों और मुसलमानों ने उत्तर भारत में कांग्रेस से किनारा कर लिया . नतीजा दुनिया जानती है . कांग्रेस उत्तर भारत में पूरी तरह से हार गयी और केंद्र में पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार स्थापित हुई
 संजय गांधी की मृत्यु के बाद भी इंदिरा गांधी ने अपने बड़े बेटे को राजनीति में  स्थापित करना शुरू किया .वह भी वंशवाद था . उनकी अकाल मृत्य के बाद फिर कुछ ऐसे लोगों  ने जो सत्ता   का आनंद लेना चाहते  थे उन्होंने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनवा दिया . उनके भी  दून स्कूल टाइप  लोग ही दोस्त थे . मणिशंकर अय्यर उसी   वर्ग के नेता हैं . राजीव गांधी भी अपने संभ्रांत साथियों के भारी प्रभाव में रहते थे. मुख्यमंत्रियों को इस तरह से हटाते थे जैसे  बड़े लोग कोई अस्थाई नौकर को हटाते हैं .. उनके काल में भी दिल्ली की  संभ्रांत बस्तियों  में विराजने वाले लोगों  ने खूब माल काटा . लेकिन १९८९ में सत्ता से बेदखल होने के बाद वे काफी परिपक्व हो गए थे  लेकिन अकाल मृत्यु ने उनको भी काम नहीं करने दिया .
सोनिया गांधी ने विपरीत परिस्थितियों में कांग्रेस का नेतृत्व सम्भाला और सत्ता दिलवाई . इसलिए सोनिया गांधी की  इज्ज़त एक राजनेता के रूप में की जा सकती है . अब राहुल गांधी को चार्ज दिया गया है . देखना दिलचस्प होगा कि वे कैसे अपनी दादी द्वारा स्थापित की गयी कांग्रेस को आगे बढाते हैं . इस कांग्रेस को महात्मा गांधी या जवाहरलाल नेहरू या सरदार पटेल या  की कांग्रेस मानना ठीक नहीं होगा क्योंकि उस कांग्रेस को तो इंदिरा गांधी ने १९६९ में ख़त्म करके इंदिरा   कांग्रेस की स्थापना कर दी थी.  मौजूदा कांग्रेस उसी इंदिरा  कांग्रेस की वारिस है . और राहुल गांधी उसी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं .