Monday, May 21, 2018

अगर राज्यपाल को संविधान की सही समझ होती तो कर्नाटक में विवाद न होता



शेष नारायण सिंह


कर्नाटक चुनाव के नतीजे आने के बाद से नई राजनीति शुरू हो गयी है . किसी को साफ़ बहुमत नहीं मिला राज्यपाल की  भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी . ऐसे में राज्यपाल की नैतिकता और उसकी बुलंदी का इम्तिहान हुआ . राज्यपाल की संस्था की यह परीक्षा की घड़ी थी.  कई बार ऐसा हुआ है कि राज्यपाल दिल्ली दरबार के अपने नियुक्ति कर्ताओं की वफादारी के चक्कर में ऐसी ऐसी गलतियाँ कर जाते हैं जिससे उनका नाम इतिहास में दर्ज हो जाता  है . जब इन गलतियों पर  सुप्रीम कोर्ट की नज़र पड़ जाती है तो वह नज़ीर बन जाती है और आने वाले वक़्त में उसका बार बार हवाला दिया जाता है . जब भी राज्यपाल की  भूमिका का ज़िक्र होता है तो अपने देश में रामेश्वर प्रसाद और बोम्मई का ज़िक्र ज़रूर होता है . बिहार और कर्नाटक के राज्यपालों की भूमिका को लेकर इन दोनों की मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले देश के संवैधानिक इतिहास में संगमील हैं . कर्नाटक के मौजूदा संकट में भी इन  दोनों मुक़दमों का बार बार  ज़िक्र हुआ. राज्यपाल की भूमिका एक बार फिर सवालों के घेरे में आई और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के कारण ही  कर्नाटक के मौजूदा गवर्नर का नाम ऐतिहासिक गलतियों की लिस्ट  में दर्ज होने से बच गया .
कर्नाटक के विधान सभा चुनाव के बाद जनादेश ऐसा  आया कि तीनों प्रमुख पार्टियों में किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. ऐसे में गवर्नर की भूमिका  महत्वपूर्ण हो जाती है . कर्नाटक में भी वही हुआ  . राज्यपाल के सामने मामला आया और उन्होंने अपने विवेक से फैसला लिया .  संविधान के आर्टिकिल १६३(२)  में ऐसी व्यवस्था है कि उनके विवेक को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.  लेकिन विवेक का यह अधिकार निरंकुश नहीं हो सकता . उनके हर फैसले  पर प्राकृतिक न्याय को बुनियाद बनाया जाना चाहिए . संविधान में आर्टिकिल १६३ तब भी मौजूद था जब सुप्रीम कोर्ट ने बोम्मई केस और रामेश्वर प्रसाद केस पर फैसला दिया . उन फैसलों में भी राज्यपाल के विवेक के  आधार पर लिए गए फैसलों को चुनौती दी गयी थी.  सुप्रीम कोर्ट में दाखिल मौजूदा केस जी परमेश्वर और एच डी कुमारस्वामी बनाम कर्नाटक सरकार केस में भी  गवर्नर के विवेक पर ही चर्चा हुयी . कोर्ट ने बिना स्पष्ट बहुमत वाली येदुरप्पा की पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाने के गवर्नर के विवेक वाले फैसले को तो खारिज नहीं किया और न ही उसपर कोई पाबंदी लगाई लेकिन उस फैसले से संभावित राजनीतिक लाभ को बिलकुल ख़त्म कर दिया . मसलन राज्यपाल ने येदुरप्पा को अपना बहुमत साबित करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया था ,उसको  एक दिन का कर दिया . विधायकों की सुरक्षा का ज़िम्मा  राज्य के पुलिस महानिदेशक  को दे दिया , फ्लोर टेस्ट की कार्यवाही को टेलिविज़न पर दिखाने का आदेश दे दिया और इस तरह से किसी तरह की गड़बड़ी की संभावना को ख़त्म  कर दिया . अदालत ने बीजेपी के वकील मुकुल रोहतगी से पूछा कि जब १०४ विधायक पूरी तरह से येदुरप्पा के साथ हैं और ११६ विधायकों ने  एच डी कुमारस्वामी को समर्थन देने के बारे में राज्यपाल को सूचित कर दिया है तो १०४  को १११ बनाने के लिए विधायक कहाँ से आयेंगें .  वकील मुकुल रोहतगी ने बताया कि कांग्रेस और जे डी एस से आयेंगें . हालांकि कोर्ट ने यह बात   कही नहीं लेकिन सबको मालूम पड़ गया कि दल बदल कानून का उन्ल्लंघन करने की तैयारी पूरी की जा चुकी है . कुल मिलाकर सारे मामले में राज्यपाल की भूमिका सवालों के घेरे में आती रही .   ऐसा बार बार हो रहा  है. जब से  इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व के दौर में अपनी पार्टी के  नेताओं को राज्यपाल बनाने की  प्रथा शुरू हुई थी . उनके बाद के सभी  प्रधानमंत्रियों ने इस परम्परा को जारी रखा है .पहले ऐसा नहीं था . उसके पहले राज्यपाल के पद पर ऐसे लोग नियुक्त किये जाते थे जो राज्य के मुख्यमंत्रियों या केंद्र सरकार के गैर कानूनी मंसूबों को नज़रंदाज़ कर देते थे.
संविधान के निर्माताओं ने जब राज्यपाल की संस्था की संरचना की तो उन्होंने यह नहीं सोचा रहा होगा कि बाद के राजनीतिक नेता और केंद्र सरकार के जिम्मेवार लोग  ऐसे हो जायेंगें जो अपने किसी भी वफादार को राज्यपाल बना देंगें . शायद इसलिए ही संविधान में राज्यपाल की नियुक्ति को लेकर बहुत ज्यादा  नियम नहीं  लिखे गए . डॉ आंबेडकर सहित  संविधान सभा के ज्यादातर लोगों ने यह सपने में नहीं सोचा होगा कि बूटा सिंह , हंसराज भारद्वाज और वजूभाई वाला जैसे लोग राज्यपाल बना दिए जायेंगें . इसीलिये उन्होंने राज्यपालों के विवेक पर  भरोसा किया और  अदालतों को उनके विवेक पर सवाल न उठाने का निर्देश दिया . लेकिन अदालतों को बाद में दखल देना पड़ा . राज्य सरकारों की जगह केंद्र का राज कायम करने वाले  संविधान के अनुच्छेद  ३५६ के बारे में बार बार अदालती हस्तक्षेप इसीलिये हुआ . जब सुप्रीम कोर्ट की नज़र में यह बात आ गयी कि कोई रामेश्वर ठाकुर ,बोम्मई को  गलत तरीके से हटा देगा या कोई बूटा सिंह रामेश्वर प्रसाद को सुप्रीम कोर्ट की शरण आने को मजबूर कर देगा . लेकिन ऐसा हुआ और सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा. संविधान की जो व्याख्या सुप्रीम कोर्ट कर देता है वह नजीर बन जाता है . इसी सन्दर्भ में मौजूदा  जी परमेश्वर और एच डी कुमारस्वामी बनाम  कर्नाटक सरकार केस को देखा जाएगा . यह केस भी देश की राजनीति में राज्यपाल की मनमानी के खिलाफ एक संगमील फैसला बन चुका है .अभी दस हफ्ते बाद जब  राज्यपाल के आदेश की संवैधानिकता पर बहस होगी तो उम्मीद की जानी चाहिए कि मामला और साफ हो जाएगा .

राज्यपाल पद की  गरिमा को संविधान में बहुत ही महत्व दिया  गया है . संविधान में अनुच्छेद १५३ से १६३ तक राज्यपाल की नियुक्ति ,उसकी शपथ, उसके अधिकार और उसके कर्तव्यों का ज़िक्र है . बाद के अनुच्छेदों में भी राज्यपाल  का ज़िक्र  आता है .वहीं अनुच्छेद १६३(२) में उसके विवेक पर अदालती नज़र के बारे में लिखा गया  है लेकिन जिस तरह के राज्यपाल की कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी अब वैसे राज्यपाल  नहीं होते. डॉ बी आर आंबेडकर ने संविधान सभा के अपने कई भाषणों में राज्यपाल पद की गरिमा का उल्लेख किया है . रामेश्वर  प्रसाद बनाम केंद्र सरकार वाले फैसले में राज्यपाल पद के बारे में डॉ आंबेडकर के हवाले से एक पैराग्राफ है जो संविधान निर्माताओं की मंशा को ज़ाहिर  करता है . लिखा है कि, " अगर राज्यपाल पर इस तरह के आरोप लगते हैं कि वह अपना काम संविधान के अनुसार  नहीं कर रहा है तो यह बहुत ही दुःख की बात है कि इस तरह का आदमी राज्यपाल बना दिया गया है जो अपना संविधानिक कर्तव्य नहीं निभा रहा है ." लगता है इसी सोच की बुनियाद पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान बेंच ने रामेश्वर प्रसाद केस में फैसला लिया कि राज्यपाल ने बहुमत वाले गठबंधन को न बुलाकर अपने पूर्वाग्रहों के वश में होकर काम किया है .फैसले के पैराग्राफ नंबर १६५ में लिखा है ,"अगर  कोई राजनीतिक दल, अन्य दलों और विधायकों के सहयोग से सरकार बनाने  का दावा करता  है और  अपने बहुमत के बारे में राज्यपाल को संतुष्ट कर देता है कि वह गठ्बंधन एक स्थिर सरकार बना सकता  है तो राज्यपाल अपने निजी आकलन के आधार पर उस दावे को खारिज नहीं कर सकता ,चाहे  वह गठबंधन  अनैतिक तरीकों से ही जुटाया गया हो . राज्यपाल के पास इस तरह के अधिकार   नहीं हैं . .अगर ऐसी  राज्यपाल / राष्ट्रपति को दे दी गयी तो  उसके नतीजे भयावह हो सकते हैं ."
इसी  फैसले में कोर्ट की ताक़त की सीमाएं भी साफ़  कर दी गयी हैं . ," कोर्ट संविधान की व्याख्या कर सकते हैं , उसको बदल नहीं सकते . ...कोर्ट विभिन्न संस्थाओं के अधिकारों की व्याख्या कर सकते हैं लेकिन  किसी एक संस्था या अधिकारी के अधिकार किसी और को नहीं दे सकते "
ऐसा लगता है कि कर्नाटक के मौजूदा राज्यपाल को संविधान और उसकी व्याख्याओं की सही जानकारी  नहीं थी इसलिए उन्होंने अपने आपको ऐसी हालत में डाल दिया जिसके बाद उनकी छीछलेदार होनी तय थी जिसका नतीजा यह होगा कि बाद की पीढियां उनको बूटा सिंह जैसे राज्यपालों के साथ मिलाकर ही देखेंगी 

राजीव गांधी




जब तक राजीव गांधी जीवित रहे ,मैंने उनकी इज्ज़त कभी नहीं की. यही कहता रहा कि वंशवाद के कारण वे वहां थे . एक बार स्व.राम सेवक, विधायक ने कहा कि बाबू, राजीव जी बहुत भलमनई हैं, यह तो अच्छा हुआ कि वे हैं . तनी सोचा कि अगर संजय या मेनका होतीं तो कितना मुश्किल होता . लेकिन मैंने उनकी इज्जत एक राजनेता के रूप में कभी नहीं की .
उनकी मृत्यु के बाद जब उनके विरोधियों ने उनके संस्मरण लिखना शुरू किया तो मुझे लगा कि चूक हो गयी. स्व राम सेवक विधायक ,मुझे बीसों बार राजीव जी के पास ले गए थे . राजीव गांधी का स्व राम सेवक से बहुत अच्छा सम्बन्ध था . अमेठी के सभी विधायकों में वे राजीव गांधी के सबसे ज्यादा प्रिय थे. राजीव गांधी उनकी बातों को महत्व देते थे लेकिन राम सेवक कई बार आपनी अवधी में उनको कोई गंभीर बात समझा नहीं पाते थे . राजीव गांधी ने उनको सुझाव दिया कि कोई अनुवादक लेकर आ जाया करो .लेकिन राम स्वक को डर था कि कहीं अनुवादक जी पारिस्थिति का फायदा न लेने लगें. बहुत सोच विचार के बाद उन्होंने मुझसे कहा तो अनुवादक के रूप में मैं उनके साथ जाता था. राम सेवक मेरे पिता की उम्र के रहे होंगे .मुझे बहुत सम्मान देते थे . मैं भी निस्पृह भाव से अनुवाद करके चला आता था .
मई १९९१ में जब लोगों ने इंसान के रूप में राजीव गांधी के बारे में बताना शुरू किया तो मुझे लगा कि एक नेता के रूप में तो नहीं लेकिन एक इंसान के रूप में वे आला दर्जे के शख्स थे. अटल बिहारी वाजपेयी ने जिस तरह राजीव गांधी को याद किया वह मुझे कभी नहीं भूलेगा. पत्रकार करन थापर ने ४ फरवरी २०१२ के दिन हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा है ," It was admittedly a casual comment but it stayed with me all week and made me think deeply. Last Saturday, Sanjaya Baru said there is one man who, more than any other, deserves the Bharat Ratna but, he fears, might never get it: Atal Bihari Vajpayee.
In fact, Sanjaya went further. When he was the PM’s media advisor he suggested both Vajpayee and Jyoti Basu should be conferred the Bharat Ratna together. As India’s longest serving chief minister and the man who democratised communism, Basu richly deserved it. Giving it to him alongside Vajpayee would, he hoped, overcome reservations about honouring an opponent and one from the BJP at that.
I’m astonished Dr Manmohan Singh didn’t agree. It’s a gesture that would have found nationwide applause. Only the curmudgeonly could have disagreed. I fear the Dear Doctor made a foolish mistake. But it’s not too late to rectify.
Let me give you two reasons why this should happen. First, of the 41 recipients of the Bharat Ratna, I’ve calculated that 23 were, at least for a brief period, members of the Congress. Even MG Ramachandran was briefly a Congressman and BR Ambedkar served in a Congress government. But no one from the BJP or the communist parties has ever got it.
There is, however, a further reason why Vajpayee should get the Bharat Ratna and it’s one that’s as yet unknown to Singh. But it’s a story I can vouchsafe for.
In 1991, after Rajiv Gandhi’s assassination, I contacted Vajpayee to ask if he would speak about the departed leader. I’ll never forget what followed.
Vajpayee invited me to his home for a chat. Sitting in his garden he said he wanted to explain something before he answered my request. “When Rajiv Gandhi was prime minister,” he began, “he somehow found out I had a kidney problem and needed treatment abroad. One day he called me to his office and said he was going to include me in India’s delegation to the UN and hoped I would use the opportunity to get the treatment I needed. I went to New York and that’s one reason I’m alive today.”
This wasn’t what I expected to hear. Vajpyaee was well aware of that. “So do you see my problem, Karan?” he asked. “Today I’m in the Opposition and people expect me to speak like an opponent. But I can’t. I only want to talk about what he did for me. If that’s okay with you, I’ll do it. If not, I have nothing to say.”
Vajpayee’s comments were the high point of the anecdotal obituary of Rajiv Gandhi I helped put together. It’s part of the records of Eyewitness (June 1991), the video magazine for which it was recorded.
If you recall that five years earlier Vajpayee had lost his own seat in the wave that swept Rajiv Gandhi to power and was among his strongest critics after Bofors, this desire to praise him was remarkable. In fact, as remarkable as Rajiv’s own thoughtfulness and generosity.
I can’t believe the good Doctor Singh won’t display the same warmth and recognition to his opponents. I know him to be a large-hearted and fair man. Perhaps someone or something is holding him back?
After seven years at the top it’s time to break free. And remember, if Rajiv Gandhi deserved the Bharat Ratna then, undoubtedly, so too do Atal Bihari Vajpayee and Jyoti Basu."
मुंबई प्रेस क्लब में २००४ के चुनाव के ठीक पहले सैम पित्रोडा ने जिस तरह उनके बारे में बताया,वह उनको एक बड़ा आदमी साबित करता है .
बहुत सीधे आदमी थे, ज़ियाउर्रहमान अंसारी के चक्कर में आकर उन्होंने शाह बानो केस में पलटी मारी ,वरना बहुत दिनों तक याद किये जाते . एम जे अकबर ने ठीक लिखा था कि वह उनका वही मोमेंट था जो जवाहरलाल नेहरू की ज़िंदगी में हिन्दू कोड बिल का था. बाबरी मस्जिद के मामले में बूटा सिंह जैसों की बात मानकर कहीं के नहीं रह गए . काश उन्होंने बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में सरदार पटेल की वह चिट्ठी पढ़ ली होती जो भारत के गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री , गोविन्द वल्लभ पन्त को लिखी थी. बहर हाल इतिहास में " यदि" का कोई महत्व नहीं है . जो होना था वह हो गया.
आज उनकी मृत्यु के २७ साल बाद मैं उनकी याद को श्रद्धांजलि देता हूँ . संचार क्रान्ति के प्रणेता राजीव गांधी ने देश की राजनीति में सभ्यता का वह तड़का दिया था जो नेहरू और शास्त्री की विरासत है और जिसको उनकी मां इंदिरा गांधी ने ख़त्म कर दिया था. आज के सन्दर्भ में राजीव गांधी को याद करना बहुत ही महत्वपूर्ण है .

Sunday, May 13, 2018

शरद यादव और शरद पवार विपक्ष को एकजुट करने में अहम भूमिका निभायेंगे



शेष  नारायण  सिंह

नई दिल्ली, १३ मई ..तीसरे मोर्चे की बात रह रह कर हवा में उछलती रहती  है . ममता बनर्जी को बीजेपी और कांग्रेस से बराबर की दिक्क़त है इसलिए वह विपक्ष की एकता तो चाहती  हैं लेकिन ऐसी उनको एकता चाहिए जिसमें कांग्रेस न हो . टी आर एस के नेता और  तेलंगाना के मुख्यमंत्री के  चन्द्रशेखर राव भी कांग्रेस के बिना ही  विपक्षी एकता चाहते हैं . दिलचस्प बात यह  है कि बीजेपी  के शीर्ष नेता भी कुछ ऐसा ही चाहते हैं . उनकी सोच है कि अगर विपक्ष कांग्रेस और गैर कांग्रेस के खेमे में बंटा रहा तो बीजेपी के लिए २०१९ में आसानी होगी लेकिन अगर सारा विपक्ष एक हो गया तो बीजेपी के लिए ख़तरा है.  विपक्ष को तितर बितर होने से बचाने के लिए शरद पवार ने सबसे पहले अपनी पोजीशन साफ़ की . उन्होंने कह दिया  कि कांग्रेस के बिना विपक्ष की एकता का कोई मतलब  नहीं है .अब समाजवादी नेता शरद यादव ने भी कह दिया है कि तीसरे मोर्चे की राजनीति का अब समय  नहीं है . बीजेपी से परेशान सभी राजनीतिक नेताओं और जमातों को एक  ऐसी रणनीति बनानी पड़ेगी जिसके तहत बीजेपी के उम्मीदवार को हर क्षेत्र में चुनौती देने वाला उम्मीदवार एक ही व्यक्ति हो और मोटे तौर पर उसको पूरे विपक्ष का समर्थन मिल रहा हो .
 एक समाचार एजेंसी के साथ बातचीत में शरद यादव ने कहा कि २०१९ के पहले किसी तीसरे मोर्चे की संभावना बिलकुल नहीं है. उन्होंने कहा कि विपक्ष की पार्टियों को ऐसी रणनीति बनानी चाहिए  जिससे बीजेपी को कारगर तरीके से चुनौती दी जा सके . ममता बनर्जी और के चंद्र्शेखर राव अभी तो तीसरे मोर्चे की बात कर रहे हैं लेकिन कुछ समय बाद वे भी विपक्षी एकता की बात करने लगेंगे. उन्होंने दावा किया कि २०१९ के इस चुनाव में संविधान की रक्षा करना सबसे बड़ी   प्राथमिकता है . उनको भरोसा है कि देश को जिस खतरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कथित रूप से धकेल दिया है उससे राजनीतिक पार्टियां देश को बचाने में सफल होंगी.  शरद  यादव कहते हैं कि वे  सभी विपक्षी नेताओं से  संपर्क में हैं और जब सही अवसर आएगा तो सब एक होने  के लिए तैयार हो जायेंगे. हालांकि यह काम कठिन है लेकिन असंभव नहीं है .
 शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता भी खतरे में  है लेकिन वे कहते हैं कि उसकी चिंता नहीं है . उनके समर्थकों ने  एक नयी राजनीतिक पार्टी का गठन कर लिया है . लोकतांत्रिक जनता दल नाम के इस दल में शरद यादव के ज़्यादातर समर्थक  हैं लेकिन शरद यादव पार्टी में शामिल  नहीं हुए हैं . उन्होंने बताया कि इस पार्टी को उनका आशीर्वाद मिलता रहेगा .पार्टी का राष्ट्रीय सम्मलेन १८ मई २०१८ को  नई दिल्ली में आयोजित किया गया है  जिसमें विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ,समाजवादी आन्दोलन के प्रतिनिधियों सामाजिक संगठनों  और जनांदोलन के नेताओं को बुलाया गया है .
 शरद यादव इस पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हो रहे हैं लेकिन पार्टी की कोशिश है  कि लोकतंत्र के चारों खम्बों विधायिका,कार्यपालिका,न्यायपालिका और पत्रकारिता पर आये  संकट के बादल को हटाने की बात की जा  रही है .पार्टी की बुनियाद में भारत के समाजवादी आन्दोलन के मूल तत्व हैं . अज समाजवादी आन्दोलन   बिखराव के दौर से गुज़र रहा है. इसी बिखराव को रोकने के लिए लोकतांत्रिक जनता दल का गठन किया गया है .


विपक्ष के नेताओं को एकजुट करने के सन्दर्भ में शरद यादव की बात में दम इसलिए भी लगता है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी कांग्रेस समेत सभी पार्टियों के साथ मिलकर साम्प्रदायिक ताक़तों को पराजित करने की राजनीतिक लाइन ले ली है . उत्तर प्रदेश में बीजेपी के  खिलाफ आंशिक एकता फूलपुर और गोरखपुर के उपचुनावों में दिखी थी और बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था.  अब कैराना और नूरपुर के उपचुनावों में उस एकता को मुकम्मल कर लिया गया है . अब अजीत सिंह की पार्टी और कांग्रेस भी बीजेपी विरोधी वोटों को मज़बूत करने में जुट गए हैं .अखिलेश यादव और मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी एकता २०१९ तक तो पक्की है , आगे की बाद में देखी जायेगी . बिहार में  भी नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ जाने के बाद  बीजेपी विरोधी ताकतें  एकजुट हो रही हैं . खबर आ  रही है कि मध्यप्रदेश में  भी कांग्रेस की अगुवाई में मायावती और अखिलेश कुछ एडजस्टमेंट की बात कर रहे हैं .  कर्नाटक के   विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू के दौर की इलाकाई क्षत्रपों को महत्व देने की बात का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है. अब वही प्रयोग  मध्य  प्रदेश और राजस्थान में भी दोहराया जा सकता है और अगर इन  दोनों राज्यों में  कांग्रेस को बहुजन समाज पार्टी का सहयोग मिल गया तो बीजेपी के लिए २०१९ में मुश्किल पेश आ सकती है . उड़ीसा , बंगाल, तमिलनाडु आदि राज्यों में भी एक ही विपक्षी  उमीदवार की योजना पर काम चल रहा है. और तीसरे मोर्चे की बातों को नेता लोग  सिरे से खारिज कर रहे हैं . ऐसी हालत में लगता है कि विपक्ष को कई  टुकड़ों में  विभाजित करके २०१९  का चुनाव बीजेपी के भाग्य में नहीं है . उसको विपक्ष की साझा ताकत का मुकाबला करना पड़ेगा और इस  मुहिम में शरद यादव और शरद पवार अहम भूमिका निभायेंगे .

कौन जवाहरलाल ?



आजकल बड़ा शोर है कि जवाहरलाल नाम के एक सज्जन को सरकार अपमानित कर रही है. यह सरासर गलत है . ऐसा नहीं है . किसी सज्जन को अपमानित नहीं किया जा रहा है . जिनका अपमान किया जा रहा है वे इलाहाबाद के मोतीलाल के बेटे थे . ठीक आदमी नहीं थे .कहीं भी कोई वारदात होती थी ,दरोगा जी उनको पकड़कर जेल में डाल देते थे. उनको बार बार जेल जाना पड़ा था . उनकी हिस्ट्रीशीट भी अंगेजों के ज़माने में बनी थी . अब आप ही बताइये इस जेल याफ्ता , और रिपीट आफेंडर को क्यों सम्मान दिया जाए. बताते हैं कि इस इलाहाबाद वाले जवाहरलाल ने दिल्ली की सत्ता भी हथिया ली थी.
अब हम देशवासियों ने तय किया है कि जो लोग भी अंग्रेजों की जेल में बंद रहे होंगे , उनको और उनके वंशजों को कभी भी सत्ता पर काबिज़ नहीं होने देंगे. अब सत्ता ऐसे लोगों को ही दी जायेगी जिनके बारे में अंग्रेजों ने अच्छे चाल-चलन का सर्टिफिकेट दे दिया होगा या उन सच्चरित्र लोगों के राजनीतिक उत्तराधिकारियों को मौक़ा देंगें .अगर आप को इन बातों से कोई परेशानी है तो आप आराम से पाकिस्तान जा सकते हैं

शैल चतुर्वेदी

शैल चतुर्वेदी बड़े खूबसूरत चौबे थे . सिनेमा में काम के चक्कर में बंबई गए . पढ़े लिखे थे तो लिखना पढ़ना भी चलता रहा . हीरो लायक चेहरा और अभिनय था . उन्होंने अपने एक संस्मरण में धर्मयुग में लिखा था कि जब उन्होंने स्व मोतीलाल की फिल्म ढोलक पांचवीं बार देखी थी तो उनके बाबू जी ने उनकी पीठ पर ढोलक और सर पर पखावज बजाने का अभ्यास किया था . गोया वे इंसान फ़िल्मी थे. लेकिन बंबई में अभिनय का काम नहीं मिला . लिख पढ़कर रोटी कमाते रहे. जब उम्र चढ़ने लगी और सर के बाल अलविदा करने लगे तो उन्होंने सोचा कि ' तजहु आस निज निज गृह जाहू ' वाली स्थिति आ गयी है . वापस चलें लेकिन तब तक धर्मवीर भारती उनसे खूब लिखवाने लगे थे . लोगों ने दिलासा दिया कि जमे रहो ,बाद में बाप या चाचा के रोल में काम आओगे. जमे रहे और 'कक्काजी कहिन' और ' चमेली की शादी ' में अविस्मरणीय भूमिका निभाई .
अगर किसी मित्र के पास उनके बारे में ज्यादा जानकारी हो शेयर किया जाये ,एक बहुत ही महत्वपूर्ण कलाकार के बारे में बातें सार्वजनिक डोमेन में आ जायेंगी.

चुनाव के समय धार्मिक भावनाओं को मुद्दा बनाने की राजनीति को बेनकाब करने की ज़रूरत

  

शेष नारायण सिंह

 देश में एक सवाल अब आम आदमी पूछने लगा है और कुछ इलाकों में तो बहुत ऊंची आवाज़ में यह सवाल पूछा जा रहा है .देश में नागरिकों का एक बड़ा वर्ग आहिस्ता आहिस्ता तैयार हो रहा  है जो पूछ रहा है कि चुनाव के मौसम में ही राम मंदिर ,पाकिस्तान, हिंदुत्व और  जिहाद की बातें क्यों  मीडिया के रास्ते हवा में उछाल दी जाती हैं . चुनाव ख़त्म होने के बाद इन बातों को दरकिनार क्यों कर दिया जाता  है . टीवी की बहसों में राजनीतिक पार्टियों द्वारा किये गए अधूरे वायदों  का ज़िक्र क्यों नहीं होता. कर्नाटक विधानसभा के चुनाव को करीब से देखने के चक्कर में वहां के ग्रामीण इलाकों में एक अजीब किस्म की चौपाल  देखने को मिली . कन्नड़ और तमिल फिल्मों के अभिनेता, प्रकाश राज वहां गाँव गाँव  में घूम रहे थे.  किसी भी गाँव में उनकी बैठक लग जाती थी और वहां वे जाति ,धर्म और अस्मिता के सवालों के बाहर जाकर राजनीतिक पार्टियों से सवाल पूछने के  लिए प्रेरित कर रहे हैं . उनका कहना है कि रोज़गार की ज़रूरत पर  सवाल पूछे जाने चाहिए . धार्मिक विवाद फैलाने के कारणों के बारे में भी सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए और ग्रामीण इलाकों की तबाही के कारणों  को बहस के दायरे में लाने के लिए भी नेताओं को मजबूर किया जाना चाहिए . उनकी यह मुहिम अब एक आन्दोलन  का रूप ले चुकी है . उन्होंने " जस्टआस्किंग फाउंडेशन " नाम का एक संगठन बना दिया है और केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को शक है कि उनका यह आन्दोलन बीजेपी को कमज़ोर करने के लिए चलाया जा रहा है . कर्नाटक चुनाव के दौरान बीजेपी के कुछ नेताओं ने चुनाव आयोग से फ़रियाद की कि उनको अपना यह कार्यक्रम चलाने से रोका जाए क्योंकि उनके प्रचार से बीजेपी के साथ अन्याय हो रहा है और उसको चुनावी नुकसान  होने का अंदेशा है .
उत्तर प्रदेश में प्रकाश राज जैसा कोई आन्दोलन तो नहीं  है लेकिन देखा गया है कि बहुत सारे नौजवान केंद्र और  राज्य सरकार से नौकरियों के बारे में सवाल पूछने की बाबत बात करने लगे हैं . अलीगढ में पाकिस्तान और मुसलमान को ध्यान में रख कर चलाए गए अभियान पर भी कई लड़कों ने आपसी बातचीत में सवाल  उठाना शुरू कर दिया है . अगर यहाँ भी प्रकाश राज की तरह कोई कार्यक्रम चलाकर मुख्य मुद्दों पर नेताओं को  घेरने की बात की जाए तो  ऐसा लगता है कि नौजवान सही बातों को उठाने  के लिए तैयार है .  
अलीगढ मुस्लिम  विश्वविद्यालय में माहौल को राजनीतिक हितों के लिए गरमा दिया गया है . वहां छात्र यूनियन के हाल में बहुत सारी तस्वीरें लगी हैं , उसी में मुहम्मद अली  जिन्नाह की भी एक तस्वीर है . अलीगढ में रिवाज़ है कि अपने दौर के किसी ख़ास आदमी को अलीगढ बुलाया जाता है और उनको छात्र यूनियन का आजीवन सदस्य बनाकर  सम्मानित किया  जाता है . उस व्यक्ति की तस्वीर भी  यूनियन के हाल में  लगा दी जाती है . यह सिलसिला १९२० से शुरू हुआ . सबसे पहले  महात्मा गांधी को छात्र यूनियन का आजीवन सदस्य बनाया   गया था . महान वैज्ञानिक डॉ सी वी रमन को १९३१ और महान इतिहासकार जदुनाथ सरकार को १९३२ में आजीवन सदस्य बनाया गया .महात्मा गांधी के बहुत ही करीबी  आज़ादी की लड़ाई के महत्वपूर्ण  योद्धाखान अब्दुल गफ्फार खां १९३४ में अलीगढ आये और उनको भी यूनियन ने सम्मानित किया और उन्हें आजीवन सदस्य बनाया  गया .बहुत लम्बी लिस्ट है और इसी लिस्ट में इक्कीसवें नंबर पर मुहम्मद अली जिन्ना का नाम है जिनको १९३८ में आजीवन सदस्य बनाया गया . उसी साल उनकी तस्वीर भी लगा दी गयी . यह सिलसिला आज तक जारी है .
लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि अस्सी साल से जो तस्वीर वहां  लटक रही है उसको कैराना के लिए उप चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद किसी टीवी चैनल के ठेकेदार स्ट्रिंगर ने देखा और उसकी फोटो वहां के एम पी साहब के ज़रिये विवाद में ला दिया .   देश को हिन्दू-मुस्लिम लाइन पर बांटने की कोशिश कर रही सियासत को एक  माहौल बनाना था ,और वह बन गया . यह सब कैसे हुआ इसकी तफसील अब सबको मालूम है लेकिन इसको हासिल करने के पीछे जो उद्देश्य हैं  वे बहुत ही  डरावने  हैं . अलीगढ समेत बाकी  शहरों में भी माहौल को गर्म करने की कोशिश की जा  रही है .  पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना को  भारतीय मुसलमानों का  अपना आदमी साबित करने की कोशिश की जा रही है . जबकि यह बात बिलकुल गलत है . भारत में  जो भी मुसलमान रहते हैं , उन्होंने या उनके पूर्वजों ने १९४७ में ही मुहम्मद अली जिन्ना को   साफ़ बता दिया था कि वे उनके  पाकिस्तान को कुछ नहीं समझते ,  भारतीय मुसलमानों ने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया था. आज तो खैर पाकिस्तान में रहने वाले मुसलमान भी कहते हैं कि जिन्ना ने बंटवारा करके बहुत बड़ी गलती की थी. अपनी ज़िंदगी के आख़िरी  हफ़्तों में जिन्ना ने खुद अपने  प्रधानमंत्री लियाक़त अली से बता दिया था  कि पाकिस्तान बनवाना उनकी   ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती  थी . विख्यात इतिहासकार अलेक्स टुंजेलमान ने अपनी किताब"इंडिया समर- सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ द एंड ऑफ ऐन एम्पायर" में यह बात साफ़ साफ़ लिख दिया है .

बहरहाल इस सारी कवायद में मुद्दा न केवल पाकिस्तान के नाम पर आबादी को भड़काना मात्र है. यह सिद्ध हो चुका है कि अलीगढ को हर बार मुसलमानों के देशप्रेम पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है . इस विषय पर बहुत शोध हुए हैं लेकिन अमरीकी विद्वान पॉल आर ब्रास ने की किताब दुनिया भर में बहुत सम्मान से पढी जाती है . अपनी किताब " द प्रोडक्शन  आफ हिन्दू-मुस्लिम वायलेंस इन कन्टेम्परेरी इण्डिया " में उन्होंने अलीगढ को निशाने पर लेने के साम्प्रदायिक जमातों के कारणों का तफसील से ज़िक्र किया है .  लिखते हैं कि जवाहरलाल नेहरू के बाद अलीगढ में जो भी   हिंसा हुयी है उसका एक राजनीतिक दल को स्पष्ट रूप से फायदा हुआ  है  .उन्होंने इस हिंसा से राजनीतिक लाभ लेने वालों में आर एस एस के सहयोगी  संगठनों को मुख्य रूप से चिन्हित किया है .यह सभी ससंगठन हिंदुत्व की विचारधारा को मानते हैं . इस हिंदुत्व को आम तौर पर हिन्दू धर्म से मिलाकर पेश किया जाता है लेकिन सच्चाई इससे बिलकुल अलग है.हिंदुत्व का हिन्दू धर्म से कोई लेना देना नहीं है . हिंदुत्व एक किताब है जिसको वी डी सावरकर ने लिखा है   और यह केवल राजनीतिक मोबिलाइज़ेशन का एक मंच है जबकि हिन्दू धर्म  सदियों से चला आ रहा एक धर्म है .

यह अजीब बात है कि अलीगढ जैसे शिक्षा के महान केंद्र को  साम्प्रदायिक आधार पर  हिन्दुओं को एकजुट करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है .  सविनय अय्वाग्या आन्दोलन में महात्मा गांधी और कांग्रेस ने अलग होकर मुहम्मद अली जिन्ना ने अलग राग अलापना शुरू कर दिया था . रफ्ता रफ्ता वे अलग मुस्लिम राष्ट्र के पक्षधर बन गए . जब उन्होंने मुस्लिम  राष्ट्र की मुहिम चलाई तो अलीगढ उनके एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा . नतीजा यह हुआ कि बहुत सारे हिन्दुओं के दिमाग में यह बात भर दी गयी कि अलीगढ के कारण ही पाकिस्तान बना था. यह भी बार बार बताया गया कि  भारतीय समाज में जो भी गड़बड़ है वह अलीगढ से उपजे आन्दोलन की वजह से ही है . इस तरह से अलीगढ़ के नाम पर एक खास वर्ग को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने का फैशन चल पडा. बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक ध्रुवीकरण की चपेट में आ गया है और उसके बाद से पाकिस्तानजिन्ना और   तुष्टीकरण के नाम पर राजनीतिक भीड़ इकठ्ठा करना सबसे आसान तरीका है .इस भीड़ का इस्तेमाल वोट बटोरने के लिए  किया जाता  है.  देश को धार्मिक रूप से बांटने की कोशिश आज़ादी के तुरंत बाद भी की गयी और बार बार की गयी . लेकिन उस दौर में आज़ादी की लडाई में शामिल रहे लोगों की देश की राजनीति में ज़बरदस्त मौजूदगी थी इसलिए इन जमातों को हिंसक वारदातें करने में सफलता तो मिल जाती थी लेकिन उससे कोई राजनीतिक फायदा  नहीं उठा पाते थे. नेहरू के बाद देश के राजनीतिक नेताओं की दृष्टि सीमित हो गयी और उसके बाद हिंसा को राजनीति से जोड़ने का काम बहुत तेज़  हो गया .
देश की राजनीति में राजीव गांधी का आना भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है . उनके साथ  ऐसे लोग आये जो राजनीतिक मूल्यों को कंपनी प्रबंधन की तरह समझते थे . बाबरी मस्जिद  से सम्बंधित जो भी गलतियां राजीव गांधी की केंद्र सरकार ने कीं वह ऐसे ही लोगों के कारण हुईं  . बाबरी मस्जिद को राम मंदिर बनाकर पेश करने की कोशिश तो नेहरू और पटेल के समय में शुरू हो गयी  थी लेकिन उन लोगों ने इस नाजुक मसले पर भावनाओं का हमेशा ख्याल रखा . सरदार पटेल ने उस वक़्त  के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त को  बाबरी मस्जिद के बारे में जो चिट्ठी लिखी थी , वह बहुत ही अहम दस्तावेज़ है लेकिन राजीव गांधी के साथियों ने उसको नज़रंदाज़ करके काम किया .उसी का नतीजा है कि आज देश और समाज के रूप में हम इस मुकाम पर पंहुच गए . उन लोगों को अंदाज़ ही नहीं था कि वे आग से खेल रहे हैं . बाबरी मस्जिद के विवाद में भी अलीगढ  को काले रंग में पेंट करने के कोशिश हुई थी.  

आज हालात  यह हैं कि हर  चुनाव के पहले आर एस एस की  कोशिश होती है कि किसी तरह से हिन्दू मुस्लिम विवाद को एक रूप दिया जाये . उसके बाद उनकी पार्टी को ध्रुवीकरण के राजनीति लाभ मिलते हैं . अभी चुनावी मौसम है  और सत्ताधारी पार्टी कुछ कमज़ोर है . सबको मालूम है कि अलीगढ और जिन्ना को निशाने पर लेकर भावनाएं भड़काई जा सकती हैं और इसीलिये  अलीगढ को एक बार फिर केंद्र में ले लिया गया है. सामाजिक राजनीतिक चिन्तक आशीष नंदी के कहना है कि सकारात्मक राजनीति करना बहुत कठिन काम होता है .उसके लिए ठोस राजनीतिक कार्यक्रम चाहिए ,जनता की भागीदारीचाहिए  और उस कार्यक्रम को आबादी के बड़े हिस्से को स्वीकार करना चाहिए लेकिन नकारात्मक राजनीति के लिए ऐसा कुछ नहीं चाहिए . उसके लिए एक दुश्मन चाहिए और उसके खिलाफ जनता को इकठ्ठा करके उनके वोट आसानी से लिए जा सकते हैं . यह देश के दुर्भाग्य है कि अलीगढ जैसे महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय को दुश्मन की तरह प्रस्तुत करके राजनीतिक लाभ लेने की  कोशिश की जा  रही है . देश की समझदार आबादी और जमातों को चाहिए कि साम्प्रदायिक ताक़तों की इन कोशिशों को बेनकाब  करें और उसको खारिज  करें  संतोष की बात यह है कि देश के बहुसंख्यक वर्गों के नौजवान भी अब धार्मिक भावनाओं क भड़काने वालों  की नीयत पर सवाल उठाने लगे हैं .

Thursday, May 10, 2018

कर्नाटक विधानसभा चुनाव: बीजेपी और कांग्रेस ,दोनों का भविष्य इस चुनाव पर निर्भर करेगा



शेष नारायण सिंह

 ( An article written on 11 April, at the very initial stge of campaign)
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कर्नाटक विधान सभा चुनाव पर देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों का भविष्य दांव पर लगा हुआ है . नई बात यह है कि चुनाव में अब डर्टी ट्रिक्स वाले भी सक्रिय हो गए हैं . आज खबर आई है कि व्हाट्स अप ग्रुपों में  एक लिस्ट जारी की गयी जिसमें विधान सभा के चुनावों के कांग्रेसी उम्मीदवारों की जानकारी थी. बाद में पता चला कि कांग्रेस  के नेताओं को पता ही नहीं था कि ऐसी कोई लिस्ट जारी की गई है . लिस्ट आस्कर फर्नांडीज़ के नाम से जारी की गयी है ,जबकि आस्कर फर्नांडीज़ दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती हैं और कोई भी लिस्ट जारी करने की स्थिति में नहीं हैं. राज्य के मुख्यमंत्री सिद्दरमैया ने तुरंत ट्वीट करके इस लिस्ट को फर्जी बताया . इसके पहले एक अजीबोगरीब चिट्ठी इंटेलिजेंस  विभाग की तरफ से भी आई थी, कुल  मिलाकर चुनाव अब बहुत ही दिलचस्प दौर में पंहुच गया है . कांग्रेस और बीजेपी ,दोनों के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का विषय है. कांग्रेस को  एक टिकाऊ  राजनीतिक पार्टी के रूप में अपना अस्तित्व बचाने के लिए राज्य की सत्ता बचाना ज़रूरी है जबकि बीजेपी के लिए कर्नाटक जीतना इसलिए ज़रूरी है कि अगर यहाँ हार गए तो २०१९ की उनकी मंजिल खासी मुश्किल हो जायेगी .कांग्रेस के चुनाव प्रचार की कमान लगभग पूरी तरह से राज्य के मुख्यमंत्री सिद्दरमैया के हाथ में है. हालांकि राहुल गांधी भी कर्नाटक चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं . राज्य के अन्य कांग्रेसी नेता सिद्दरमैया के सहायक के रूप में ही  नज़र आ रहे  हैं. बीजेपी ने पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदुरप्पा को उनके ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को नज़रंदाज़ करके दोबारा पार्टी में शामिल किया था. उम्मीद यह थी कि बीजेपी के चुनाव का ज़िम्मा उनको दिया जाएगा लेकिन उनसे शुरुआती गलती हो गयी . बीजेपी से हटने के बाद उन्होंने जिस कर्नाटक जनता पक्ष की स्थापना की थी ,उसमें ज्यादातर उनके बीजेपी वाले साथी ही थे. सब ने बीजेपी के उम्मीदवारों को जमकर  कोसा था . जब अमित शाह ने दुबारा बी एस येदुरप्पा को बीजेपी में भर्ती किया तो वे सारे लोग उनके साथ आये और येदुरप्पा ने उन लोगों को ज्यादा महत्व देने की कोशिश की . बीजेपी के मुकामी नेताओं ने उनको स्वीकार नहीं किया . नतीजा यह हुआ कि कर्नाटक में  बीजेपी में एकता नहीं हो सकी. लिंगायतों को अल्संख्यक का दरजा देने की सिद्दारमैया की राजनीति ने येदुरप्पा की बात और बिगाड़  दी .उनको भारतीय जनता  पार्टी के लिए उतना उपयोगी नहीं रहने दिया  जितना सोचकर आमित शाह उनको  वापस लाये थे . नतीजतन विधान सभा चुनाव के प्रचार की कमान स्वयम अमित शाहको संभालनी पडी. आज कर्नाटक का चुनाव वास्तव में अमित शाह बनाम सिद्दरमैया ही हो गया है .
इस विधान सभा चुनाव को इसी सन्दर्भ में देखना पडेगा . जैसा कि आम तौर पर होता है कर्नाटक विधानसभा का चुनाव भी जातियों के जोड़तोड़ का चुनाव ही  है . दोनों ही दल नए जाति समीकरणों को शक्ल देने में लगे हैं . २००७ के चुनाव में बी एस येदुरप्पा  को लिंगायतों का धुआंधार  समर्थन मिला था जिसके बाद वे मुख्यमंत्री बने थे लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप के चलते उनको गद्दी छोडनी पडी. २०१३ में जब पुराने समाजवादी ,सिद्दरमैया कांग्रेस की तरफ से राज्य के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने पहले दिन से ही  २०१८ का चुनाव जीतने की तैयारी शुरू कर दी . दलितों के लाभ के लिए मुख्यमंत्री ने पहले बजट में  ही  बहुत सारी योजनायें लागू कर दी थीं . बाद में उसको और बढ़ा दिया गया . .आज से साल भर पहले दलितों के लिए बड़े पैमाने पर लाभ देने वाली स्कीमों की  घोषणा की गयी  . सरकारी संस्थाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे दलित छात्रों को मुफ्त में लैपटाप तो पहले से ही था , उस सुविधा को   निजी स्कूल कालेजों में पढने वाले  दलित छात्रों के लिए भी कर दिया गया .दलित छात्रों को चौथाई कीमत पर बस पास मिलते थे अब  बस पास बिलकुल मुफ्त में मिल रहा है  . दलित जाति के लोग ट्रैक्टर या टैक्सी खरीदने पर  दो लाख रूपये की सब्सिडी  पाते थे ,उसे  तीन लाख कर दिया गया. . ठेके  पर काम करने वाले गरीब मजदूरों , पौरकार्मिकों आदि  को रहने लायक घर बनाने के लिए  दो लाख रूपये का अनुदान मिलता था ,उसे चार लाख कर दिया गया दलितों के कल्याण के लिए सिद्दरमैया ने अपने शासन के  चार वर्षों में करीब पचपन हज़ार करोड़ रूपये खर्च करवा दिया था .चुनावी  साल में  करीब अट्ठाईस हज़ार करोड़ रूपये की अतिरिक्त  व्यवस्था कर दी गयी .

यह सारा कार्य योजनाबद्ध तरीके से किया गया . अब तक माना जाता था कि कर्नाटक में वोक्कालिगा और लिंगायत,संख्या के हिसाब से  प्रभावशाली जातियां हैं . . लेकिन चुनाव के नतीजों में  यह नज़र नहीं आता था.  सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्दिरमैया  ने २०१५ में जाति के आधार पर जनगणना करवाई . इस जनगणना के नतीजे सार्वजनिक नहीं किये जाने थे लेकिन कुछ पत्रकारों को जानकारी लीक कर  दी गयी . सिद्दिरामैया की जाति के लोगों की संख्या ४३ लाख यानी करीब ७ प्रतिशत बतायी गयी .यह जानकारी अब पब्लिक डोमेन में आ गयी है जिसको सही माना जा रहा है. इस नई जानकारी के  बाद कर्नाटक की चुनावी राजनीति का हिसाब किताब बिलकुल नए सिरे से शुरू हो गया है .नई जानकारी के बाद लिंगायत ९.८ प्रतिशत और वोक्कालिगा ८.१६ प्रतिशत रह गए हैं .  कुरुबा ७.१ प्रतिशत ,मुसलमान १२.५ प्रतिशत ,  दलित २५ प्रतिशत ( अनुसूचित  जाती १८ प्रतिशत और अनुसूचित जन जाति ७ प्रतिशत ) और ब्राह्मण २.१ प्रतिशत की संख्या में राज्य में रहते हैं .
अब तक कर्नाटक में माना जाता था कि लिंगायतों की संख्या १७ प्रतिशत है और वोक्कालिगा १२ प्रतिशत हैं . इन आंकड़ों को कहाँ से निकाला गया ,यह किसी को पता नहीं था. जाति आधारित जनगणना देश में १९३१ में हुई थी .शायद यह जानकारी वहीं से आई हो लेकिन तब से अब  तक हालात बदल गए हैं .यही आंकड़े चल रहे थे और सारा चुनावी विमर्श इसी पर केन्द्रित हुआ करता था  . नए आंकड़ों के आने के बाद सारे समीकरण बदल गए हैं .  इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि दलित  नेता इस बाद को बहुत पहले से कहते  रहे हैं . दावा किया जाता रहा है कि अहिन्दा ( अल्पसंख्यक,हिन्दुलिदा यानी ओबीसी  और दलित )  वर्ग एक ज़बरदस्त समूह है . जानकार मानते हैं  कि  समाजवादी सिद्दिरामैया ने चुनावी फायदे के लिए अहिन्दा का गठन गुप्त रूप से करवाया  है . मुसलमान , दलित और  सिद्दिरामैया की अपनी जाति कुरुबा मिलकर करीब ४४ प्रतिशत की आबादी बनते हैं .  जोकि मुख्यमंत्री के लिए बहुत उत्साह का कारण हो सकता है .दलितों के लिए बहुत बड़ी योजनाओं के पीछे यही नए आंकड़े काम कर रहे बताये जा रहे हैं  .

इस सारे घालमेल में  कर्नाटक का सिद्दरमैया बनाम अमित शाह चुनाव परवान चढ़ रहा है. सारा समीकरण जातियों के इर्द-गिर्द मंडरा रहा है. बीजेपी लिंगायत-वोक्कलिगा-ब्राह्मण समीकरण को अपनी बुनियाद मानती रही है लेकिन अब हालत बदल गए हैं . जातियों के अनुपात की नई जानकारी के बाद सिद्दरमैया की कोशिश  है कि बीजेपी के मज़बूत लिंगायत वोट बैंक को तोड़ दिया जाए . इसमें उनको सफलता भी मिल चुकी है .  बीजेपी के नेता भी चुपचाप नहीं  बैठे हैं . उन्होंने भी अपनी रणनीति बदल दी है .अब अमित शाहलिंगायत-दलित -ब्राह्मण समीकरण बैठाने में लगे हैं . उनको मालूम है कि सारे दलित वोट उनको नहीं मिलेंगें लेकिन वे करीब बीस प्रतिशत  दलित वोट अपनी तरफ करने का प्रयास कर रहे हैं. .इसके साथ ही वे वोक्कलिगा वोट भी साथ लेने की कोशिश  कर रहे हैं . एच डी देवेगौडा की पार्टी जनता दल सेकुलर के वोट बैंक को साथ लेना बीजेपी की इस बार की प्रमुख रणनीति का हिस्सा है . इसी सिलसिले में अमित शाह वोक्कलिगा वर्ग के प्रमुख मठ  आदिचुनचुन गिरि  भी  हो आये  हैं ..
बीजेपी की तरफ से प्रयास किया जा रहा है कि  सिद्दरमैया के शासन काल की कमियाँ गिनाकर भी उन मतदाताओं को साथ ले लिया जाय जो मौजूदा सरकार से किसी भी कारण से नाराज़  हैं . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का भी पूरा इस्तेमाल किया जाने वाला है क्योंकि पूर्वोत्तर भारत और गुजरात के चुनाव में नरेंद्र मोदी के नाम और अमित शाह की मेहनत ने चुनाव के अंतिम नतीजों  को निश्चित रूप से प्रभावित किया था.

कर्नाटक का चुनाव मुख्य रूप से बीजेपी और कांग्रेस के बीच है लेकिन जानत दल एस की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी. यदि किसी कारण से भी त्रिशंकु विधान सभा हुयी तो पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौडा की कृपा से ही सरकार बनेगी . जो भी हो ऐसा पहली बार हो रहा है कि कर्नाटक विधानसभा के चुनाव के नतीजों पर देश की भावी राजनीति दिशा तय करने का ज़िम्मा आ गया है. अगर कांग्रेस अपनी सरकार बचाने में  सफल हो जाती है तो उसकी भावी राजनीति के लिए यह संजीवनी  साबित होगा . कांग्रेस की यह संजीवनी बीजेपी और नरेंद्र मोदी के लिए बहुत बुरा समाचार होगा . इसलिए दोनों ही  बड़ी पार्टियों ने अपना सब कुछ  दांव पर लगा दिया है .