Sunday, May 21, 2017

नरेंद्र मोदी के विकल्प की बात करना मुख्य मुद्दों से भटकाव की राजनीति है .


शेष नारायण सिंह

केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने के साथ ही यह बात बहुत ज़ोरों से चलाई जा रही है कि अब देश की राजनीति में उनका कोई विकल्प  नहीं है .बीजेपी के नेता इस बात को जोर देकर कहते हैं कि नरेंद्र मोदी अब जवाहरलाल नेहरू की तरह आजीवन प्रधानमंत्री बने  रहेंगें . टेलीविज़न चैनलों में भी यह बात कही जा रही है . नरेंद्र मोदी की सफलताओं का ज़िक्र किया जा रहा है . बीजेपी के प्रवक्ता और मंत्री इस बात का दावा बार बार कर रहे  हैं कि पिछले तीन वर्षों में को भ्रष्टाचार नहीं हुआ है . देश की जनता के पास इसका प्रतिवाद करने का कोई मंच नहीं है लिहाजा सभी इस बात को माने बैठे हैं कि जब इतने बड़े नेता कह रहे हैं तो सच ही होगा. विपक्षी पार्टियों का जिम्मा है कि वे मोदी सरकार की अगर कोई नाकामयाबी है तो उसका ज़बरदस्त तरीके से प्रचार करें लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है . सबसे बड़ा ज़िम्मा  कांग्रेस पार्टी  का है लेकिन उनके प्रवक्ता रोज़ शाम ४ बजे के आस पास २४ अकबर रोड , नई दिल्ली के अपने मुख्यालय में  विराजते  हैं और अपनी बात को बहुत प्रभावशाली तरीके  से कहते हैं . आमतौर पर यह बात बीजेपी के कुछ नेताओं या  मंत्रियों के बयानों पर उनकी प्रतिक्रिया होती है . अगले दिन सुबह बात चीत में वे ही  बताते हैं कि बीजेपी की ओर से मीडिया मैनेज हो गया है और प्रेस कांग्रेस की बात को प्राथमिकता नहीं दे रहा है . मीडिया पर हमला करना आजकल फैशन हो गया है लेकिन इन नेताओं को अपने गिरेबान में झांकना होगा कि अगर मीडिया उनकी बात नहीं उठा रहा  है तो क्या और कोई तरीका नहीं है जिस से वे अपनी बात जनता तक पंहुचा सकें .  केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की ओर से हर हफ्ते कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है जो जनविरोधी है लेकिन कहीं भी किसी भी राजनीतिक  पार्टी ने किसी तरह का विरोध किया ही नहीं .मीडिया का स्पेस हर दौर में सत्ताधारी पार्टी को ज्यादा मिलता रहा है क्योंकि उनके काम और आचरण से देश का अवाम सीधे तौर पर प्रभावित होता रहा है . कांग्रेस के दौर में भी मीडिया का स्पेस  सरकारी पार्टी को मिलता था और तब बीजेपी के नेता भी मीडिया के मैनेज होने की शिकायत करते थे. लेकिन बीजेपी वालों ने दिल्ली समेत देश की ज़्यादातर राजधानियों में जुलूस आदि निकाल कर कांग्रेस की सरकारों  को कटघरे में खडा किया था . देश की राजनीति की बदकिस्मती है कि आज ऐसा नहीं हो रहा है और चारों तरफ यह चर्चा है कि नरेंद्र मोदी का कहीं कोई विकल्प नहीं है .ज़ाहिर है बीजेपी इस अभियान की अगुवा है लेकिन इस तरह की बात को कोई मतलब नहीं है क्योंकि अगर विकल्प की ज़रुरत पडी तो लोकतंत्र अपने हित में किसी भी नेता का विकल्प तलाश लेता है .नरेंद्र मोदी की  विकल्पहीनता की बात बीजेपी की रणनीति का हिस्सा हो सकती  है लेकिन विपक्ष को उसके लपेट में आने की क्या ज़रुरत है , यह बात आम आदमी की समझ से परे है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प की बात सुझाना इस लेख का मकसद नहीं है . अगर विकल्प की ज़रुरत पडी तो वह वक़्त की  ताक़त से अपने आप तय हो जाएगा. भला कोई सोच सकता था  कि जिस व्यक्ति को बीजेपी के ही कई  तिकड़मबाज़  नेताओं  ने गुजरात से बाहर कर दिया था ,वही बीजेपी का सबसे  बड़ा नेता और प्रधानमंत्री  हो जाएगा. बीजेपी के उस समय के बड़े नेता लाल कृष्ण आडवानी और उनके गुट के नेता लोग तो १३ सितम्बर २०१३ के दिन भी नरेंद्र मोदी को विकल्प मानने को तैयार नही थे. पार्टी के  तत्कालीन अध्यक्ष , राजनाथ सिंह  ने जब गोवा में अपनी पार्टी की बैठक में आडवानी आदि की मर्जी के खिलाफ जाकर नरेंद्र मोदी  को पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था तो दिल्ली में विराजने वाले कई बड़े नेता राजनाथ सिंह के खिलाफ ही लामबंद होने लगे थे लेकिन  वक़्त ने साबित कर दिया कि राजनाथ सिंह का फैसला उनकी पार्टी के हित में सही था. आज की स्थिति यह है कि सितम्बर २०१३  में जो लोग नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे थे, नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में उनकी चर्चा  तक नहीं होती. दिलचस्प बात यह है कि उनमें से कई महानुभाव आज उनके कृपापात्र भी बन गए हैं .
कई मीडिया संगठन नेताओं के ऊपर जनहित  पर आघात करते  है तो सच्चाई के साथ खड़े मीडिया को ज्यादातर राजनेता अपनी आलोचना का विषय बनाते हैं . मीडिया का न तो यह काम है कि वह किसी का विकल्प सुझाए और नहीं उसके लिए यह न्यायसंगत  होगा .  लेकिन देश की जनता को किसी भी चिंता और ऊहापोह की स्थिति से  बचाने के लिए यह मीडिया का फ़र्ज़ है कि जितना संभव  हो देश की जनता को उसकी चिंता  से मुक्त करे. इसका तरीका यह है कि आज के पहले जब भी देश की राजनीति में किसी भी प्रधानमंत्री का विकल्प न होने की बात चली ही उस वक़्त के हालात हो याद दिला दे.
जवाहरलाल नेहरू के जीवन काल में  उनके प्रधानमंत्रित्व के अंतिम दौर में यह चर्चा शुरू हो गयी थी . इस आशय की किताबें आदि भी लिखी जाने लगी थीं . नेहरू के बाद जिस नेता को देश ने चुना ,उनका कार्यकाल बहुत कम समय का रहा लेकिन लाल बहादुर शास्त्री ने यह तय कर दिया कि उन्होंने नेहरू की नीति में जो कमियाँ रह गयी थीं उनको भी दुरुस्त करने की क्षमता उनके अन्दर थी. चीन के  साथ हुए संघर्ष में भारत को अपमान झेलना पड़ा था और उसी से मनबढ़ हुए पाकिस्तानी तानाशाह जनरल अय्यूब ने भारत को युद्ध की तरफ जाने को मजबूर कर दिया . कश्मीर घाटी  में बड़े पैमाने पर घुसपैठ करवाई और युद्ध को भारत पर थोप दिया .शास्त्री जी के राजनीतिक नेतृत्व  में पाकिस्तानी सेना को ऐसा  ज़बरदस्त जवाब दिया कि पाकिस्तानी सेना के हौसले हमेशा के लिए पश्त हो गए . शास्त्री जी ने ही देश में मौजूद अन्न की कमी से सीधे लोहा लिया और ग्रीन रिवोल्युशन की शुरुआत की . यह अलग बात है कि शास्त्री जी की मृत्यु के बाद उसकी सारी वाह वाही इंदिरा जी ने अपने खाते में दर्ज करवा दी.
प्रधानमंत्री पद को लेकर विकल्प हीनता की स्थिति तब भी आयी थी जब इमरजेंसी को खत्म करने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा  गांधी  ने चुनाव की घोषणा कर दी. ज़्यादातर विपक्षी नेता जेलों में बंद थे . इंदिरा गांधी के खुफिया तंत्र ने उनको सलाह दी थी कि विपक्ष की एकता संभव नहीं है और चुनाव करवा कर पांच साल  के लिए जनादेश ताज़ा करवा लें . लेकिन जनता के दबाव में जेल से आकर विपक्षी नेता लोग  ,सर्वोदय के कर्णधार जयप्रकाश नारायण के साथ खड़े हो गए और भारतीय लोकदल के चुनाव निशान पर चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया गया , पार्टी का नाम जनता पार्टी दिया गया जबकि सच्चाई यह है कि पार्टी का गठन सरकार बन जाने के मई महीने में हुआ. चुनाव की घोषणा होने के बाद  , इंदिरा गांधी सरकार के वरिष्ठ मंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता , बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर ,कांग्रेस फार डेमोक्रेसी  बना लिया और जनता पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ गए. चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया कि इंदिरा  गांधी का विकल्प संभव था और वह एक राजनीतिक सच्चाई था.
दूसरा इस तरह का अवसर तह आया जब बहुत भारी बहुमत से देश में राज कर रहे  राजीव गांधी का कोई विकल्प न होने की बात चल पडी  थी. लेकिन बोफर्स का राजनीतिक तूफान आया तो एक साधारण हैसियत का राजा जिसकी अपनी कोई राजनीतिक ज़मीन नहीं थी , राजीव गांधी को बेदखल करने का साधन बन गया . गौर करने की बात यह  है  कि जिस विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव  गांधी के विकल्प के रूप में अपने आप को  पेश करने में सफलता पाई थी वे हमेशा से ही  इंदिरा गांधी परिवार के कृपा पात्र रहे थे.१९७१ के बाद इंदिरा गांधी ने उनको छोटा मंत्री बनाया था, १९८० में संजय गांधी की कृपा से मुख्यमंत्री बने थे और १९८४-८५  में राजीव गांधी ने उनको वित्त मंत्री बना दिया था . जब  उनको इंदिरा जी ने राज्य मंत्री बनाया था , उस समय भी कांग्रेस में उनसे बहुत बड़े नेता थे और उनमें से एक , चन्द्रशेखर थे जो १९८९ में प्रधानमंत्री पद के ज़बरदस्त दावेदार थे लेकिन वक़्त ने वी पी सिंह को चुना और राजीव गांधी का विकल्प तैयार हो गया . इसी तरह  से अटल बिहारी वाजपेयी के बाद डॉ मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री बनना भी एक ऐसी सच्चाई  है जिसका अंदाज़ किसी को नहीं था, डॉ मनमोहन सिंह को भी नहीं .
इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प की बात करना राजनीति और लोकतंत्र की ताक़तों को न समझ पाने का लक्षण है.  अगर लोकतंत्र के लिए  ज़रूरी हुआ तो कोई भी  मोदी के विकल्प के रूप में सामने आ जाएगा . आखिर २०१३ तक इसी पार्टी के लाल कृष्ण आडवानी, अरुण जेटली  , सुषमा स्वराज , वेंकैया नायडू, नितिन गडकरी आदि वर्तमान प्रधानमंत्री के अति  आदरणीय  नेता रह चुके हैं . पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री  योगी आदित्य नाथ का नाम भी दिल्ली के सत्ता का गलियारों में खुसुर पुसुर स्टाइल में चल चुका है लेकिन सच्चाई यह  है कि आज बीजेपी की  राजनीति को मोदी के विकल्प की  ज़रुरत नहीं है. जब ज़रूरी होगा समय अपना विकल्प तलाश  लेगा अभी  तो विपक्ष को  इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उस जनता की आवाज़ को दमदार तरीके से उठायें जो किसी भी सरकार तक अपनी बात नहीं पंहुचा सकती , विकल्प की बात करना एक तरह से अवाम के मुख्य मुद्दों  से भटकाव है और वह राजनीतिक विकास के हित में नहीं है 


Thursday, May 18, 2017

मोदी सरकार पर नज़र रखने में कांग्रेस अब तक असफल रही है



शेष नारायण सिंह

इसी मई में नरेंद्र  मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए. सरकार और उसके समर्थकों का दावा है कि बी जे पी सरकार ने पिछले तीन वर्षों में हर क्षेत्र में सफलता की बुलंदियां हासिल की हैं ,विदेश नीति से लेकर महंगाई ,बेरोजगारी ,कानून व्यवस्था सभी क्षेत्रों में सफलता के रिकार्ड बनाए गए हैं ,ऐसा बीजेपी वालों का दावा है . यह अलग बात है कि इन सभी क्षेत्रों में  सरकार की सफलता संदिग्ध हैं . महंगाई कहीं कम  नहीं हुयी है , चुनाव अभियान के दौरान बीजेपी ने जिन करोड़ों नौकरियों का वादा किया था  ,वह कहीं भी नज़र नहीं आ रही हैं . ख़ासतौर से ग्रामीण इलाकों में चारों तरफ बेरोजगार नौजवानों के हुजूम देखे जा सकते हैं . किसानों की हालत जो पिछले ४० वर्षों से खराब होना शुरू हुई थी वह बद से बदतर होती जा रही है.  उत्तर प्रदेश और बिहार के अवधी ,भोजपुरी इलाकों से नौजवान बड़ी संख्या में देश के औद्योगिक नगरों की तरफ पलायन करते थे और छोटी मोटी नौकरियाँ हासिल करते थे, वह पूरी तरह ठप्प है . लेकिन बीजेपी के  प्रवक्ता आपको ऐसे ऐसे आंकड़े दिखा देगें कि लगेगा कि आपकी ज़मीन से इकट्ठा की गयी जानकारी गलत है , वास्तव में देश तरक्की कर  रहा है , चारों तरफ खुशहाली है , नौजवान बहुत खुश हैं और अच्छे दिन आ चुके हैं .
 मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने की खुशी में टेलिविज़न चैनलों पर बहसों का मौसम शुरू हो  गया है . बीजेपी के कुशाग्रबुद्धि प्रवक्ता वहां मौजूद रहते हैं और पूरी दुनिया को बताते रहते हैं कि पिछले तीन वर्षों में  सब कुछ बदल गया है  . ऐसे ही एक डिबेट में शामिल होने का मौक़ा मिला . बीजेपी  के प्रवक्ता ने अच्छी तरह अपनी बात रखी जो उनको रखना चाहिए . यह उनका फ़र्ज़ है .

इसी डिबेट में कांग्रेस प्रवक्ता भी थे. तेज़ तर्रार नौजवान नेता. राहुल गांधी की राजनीति के अलमबरदार . लेकिन उनके पास बीजेपी के प्रवक्ता का विरोध करने के लिए कोई तैयारी नहीं थी. लगातार नरेंद्र मोदी पर हमले करते रहे . अपने हस्तक्षेप के दौरान कई बार उन्होंने नरेंद्र मोदी या प्रधान मंत्री शब्द का बार बार उलेख किया और बहस में बीजेपी  सरकार की खामियों को गिनाने के लिए केवल नरेंद्र मोदी  का सहारा लेने की कोशिश करते रहे.जब  डिबेट में मौजूद पत्रकारों ने उनको याद दिलाया कि अगर आपकी बात को सच मान भी लिया जाए  कि पिछले तीन वर्षों में सरकार ने जनहित का कोई काम नहीं किया है  और हर मोर्चे पर फेल रही है तो आप लोगों  ने सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का कर्त्तव्य क्यों नहीं  निभाया, कांग्रेस ने सरकार की असफलताओं को उजागर करने के लिए कोई जन आन्दोलन क्यों नहीं शुरू किया . क्यों आप लोग टेलिविज़न  कैमरों और  अपनी पार्टी के दफ्तरों के  अलावा कहीं नज़र नहीं आये. तो उनके पास बगलें झांकने के अलावा कोई जवाब नहीं था. बड़ी खींचतान  के पाद उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि पिछले दिनों जन्तर मन्तर पर तमिलनाडु  से  आये   किसानों का जो विरोध देखा गया था , वह कांग्रेस द्वारा आयोजित था. ज़ाहिर है और किसी आन्दोलन का ज़िक्र नहीं किया जा सकता  था क्योंकि कहीं कुछ था ही नहीं . ऐसी हालत में एक ऐसे  आन्दोलन को अपना बनाकर पेश  करने की कोशिश  की गयी  जिसमें कांग्रेस की भूमिका केवल  यह थी  कि उनके आला नेता , राहुल गांधी किसानों के उन आन्दोलन से सहानुभूति जताने जंतर मंतर गए थे , कुछ देर बैठे थे और उस मुद्दे  पर उनकी पार्टी  ने बयान आदि देने की रस्म अदायगी की थी.

सवाल यह उठता है कि क्या मुख्य विपक्षी दल का कर्त्तव्य यहीं ख़त्म हो जाता है . क्या लोकतंत्र में यह ज़रूरी  नहीं कि  सरकार अपनी राजनीतिक समझ  के हिसाब से जनहित और राष्ट्रहित  के कार्यक्रम लागू करती रहे और अगर उसकी सफलता संदिग्ध हो तो जनता के बीच जाकर या किसी भी तरीके से विपक्षी पार्टियां  सरकार की कमियों को बहस के दायरे में लायें . या विपक्ष की  यही भूमिका  है कि वह इस बात का इंतज़ार करे कि २०१९ तक जनता बीजेपी से निराश हो जायेगी और फिर से  कांग्रेस सहित विपक्षी दलों को सत्ता थमा देगी.  फिलहाल यही माहौल है . कहीं कुछ भी विरोध देखा नहीं जा रहा  है.

कांग्रेस का ड्राइंग रूम की पार्टी बन जाना इस देश की भावी राजनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है .  कांग्रेस के राहुल गांधी टीम के मौजूदा नेता  यह दावा करते हैं कि उनकी पार्टी   महात्मा गांधी, सरदार पटेल ,जवाहर लाल नेहरू की पार्टी है . बात बिलकुल सही है क्यों जवाहर लाल नेहरू के वंशज उनकी पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं . लेकिन क्या इन लुटियन की दिल्ली में रमण करने वाले नए कांग्रेसी नेताओं को मालूम नहीं है कि कांग्रेस के नेताओं ने आन्दोलन को देश की राजनीति का स्थाई भाव बना दिया था. १९२० से लेकर १९४६ तक कांग्रेस ब्रिटिश साम्राज्य की कमियों को हर मोर्चे पर बेपरदा किया था जहां भी संभव था. १९४७ के पहले कांग्रेस के तीन बड़े  आन्दोलन राजनीतिक आचरण के विश्व इतिहास में  जिस सम्मान से उद्धृत किये जाते हैं उसपर कोई भी देश या समाज गर्व कर सकता है . १९२० का महात्मा गांधी का आन्दोलन इतना ज़बरदस्त  था कि  भारत की जनता की एकजुटता को खंडित करने के लिए उस वक़्त के हुक्मरानों को सारे घोड़े खोलने पड़े थे. १९२० के आन्दोलन के बाद ही ऐसा माहौल बना था कि अंग्रेजों ने  अपने वफादार  भारतीयों को आगे करके  कई ऐसे संगठन बनवाये जिनके कारण भारतीय अवाम की एकता को तोड़ने में उनको सफलता मिली. कांग्रेस के १९३० के आन्दोलन का ही नतीजा था कि महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को मजबूर कर दिया कि वह  भारतीयों के साथ मिलकर देश पर शासन करें . १९३५ का गवर्नमेंट आफ इण्डिया एक्ट  कांग्रेस की अगुवाई में  चले आन्दोलन का ही नतीजा था .यह भी सच है कि अँगरेज़ शासकों ने भारत की राजनीतिक एकता को खत्म करने के बहुत सारे प्रयास किये लेकिन कहीं कोई सफलता नहीं मिली. शायद  राजनीतिक आन्दोलन के इसी जज्बे का नतीजा था कि१९४२ में जब महात्मा गांधी के साथ खड़े देश ने नारा दिया कि अंग्रेजो ' भारत छोडो ' तो ब्रिटिश हुकूमत ने इन शोषित पीड़ित लोगों की  आवाज़ को हुक्म माना और उनको साफ़ लग गया कि भारत की एकजुट राजनीतिक ताक़त के सामने टिक पाना नामुमकिन था. राजनीति की इस परम्परा का वारिस होने का दावा करने वाली कांग्रेस के मौजूदा नेताओं का वातानुकूलित माहौल से बाहर न निकलने का आग्रह समझ परे है .
मौजूदा  कांग्रेस नेताओं से गांधी-नेहरू परम्परा की उम्मीद भी नहीं है लेकिन राहुल गांधी की दादी और चाचा की राजनीति की उम्मीद तो  की ही जा सकती है . जब १९७७ में भारी जनाक्रोश के बाद इंदिरा गांधी की सरकार बेदखल कर दी गयी थी तो सत्ता को अपनी  हैसियत से  जोड़ चुके संजय गांधी के सामने मुश्किलें बहुत थीं . इमरजेंसी के उनके कारनामों की जांच के लिए शाह आयोग बना दिया गया था, जनता का भारी विरोध था, गली गली में कांग्रेस और इंदिरा -संजय  की टोली की निंदा हो रही थी.   इमरजेंसी में कांग्रेस के बड़े नेता रहे लोग जनता पार्टी की शरण में जा चुके थे . कांग्रेस के लिए चारों तरह अन्धेरा  ही अँधेरा था लेकिन कांग्रेस ने सड़क पर आने का फैसला किया . एक दिन दिल्ली की सडकों पर चलने वालों देखा कि काले पेंट से दिल्ली की दीवारें पेंट कर दी गयी थीं और लिखा था कि ' शाह आयोग नाटक है '. शाह आयोग को इमरजेंसी की ज्यादातियों की जांच  करने के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने स्थापित किया था. उसी के विरोध से  तिरस्कृत कांग्रेस ने विरोध की बुनियाद डाल दी. यह सच है कि उन दिनों  सभ्य समाज में कांग्रेस के प्रति बहुत ही तिरस्कार का भाव था लेकिन संजय गांधी और इंदिरा गांधी ने हिम्मत नहीं हारी . बहुत सारे ऐसे नौजवानों  को संजय गांधी ने इकठ्ठा किया जिनको भला आदमी नहीं माना जा सकता था लेकिन उनके सहारे ही आन्दोलन खड़ा कर दिया और जनता पार्टी की सरकार के विरोधाभासों को बहस के दायरे में ला दिया . इंदिरा गांधी और संजय गांधी जेल भी गए और जब जेल से बाहर आये तो उनके साथ और बड़ी संख्या में लोग जुड़ते गए. नतीजा यह हुआ कि १९८० में कांग्रेस की धमाकेदार वापसी हुई . आज के कांग्रेस के अला नेता किसी आन्दोलन के बाद जेल जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं . हाँ याह संभव है कि उनको नैशनल हेराल्ड के केस में आपराधिक मामले में जेल जाना पड़ जाए.
कांग्रेस ने १९९९ से २००४  तक  सोनिया गांधी के नेतृव में भी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को लगातार घेरने की राजनीति की और सारे तामझाम , सारे मीडिया मैनेजमेंट, सारे शाइनिंग इण्डिया के बावजूद जनता ने कांग्रेस को फिर से सत्ता सौंप दी. सत्ता खंडित थी लेकिन बदलाव हुआ और बदलाव राजनीतिक आन्दोलन के रास्ते हुआ. यह ज़रूरी नहीं कि आन्दोलन के बाद सत्ता मिल ही जाए. सोशलिस्ट पार्टी के बड़े नेताओं , आचार्य नरेंद्र देव और डॉ राम मनोहर लोहिया ने विपक्ष में रहते हुए जीवन भर उस वक़्त की कांग्रेस सरकारों की खामियों को  सड़क पर उतर कर जनता  के सामने उजागर करते रहे  . उन महान नेताओं को सत्ता कभी नहीं मिली लेकिन लोकतंत्र में जनता को यह अहसास हमेशा बना रहा कि उस दौर की सत्ताधारी पार्टी जो भी जनविरोधी काम कर रही है उसकी जानकारी नेताओं को है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं . आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी भी जब विपक्ष में होती थी तो आम जनता को प्रभावित करने आले मुद्दों पर आन्दोलन का  रास्ता अपनाती  रही  है . दिल्ली में रहने वालों को मालूम है कि जब तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे हर हफ्ते बीजेपी की अलग अलग इकाइयों  का जंतर मंतर पर कोई न कोई आन्दोलन चलता ही रहता था.

आज के विपक्षी नेताओं की   स्थिति बिलकुल अलग है . वे टेलिविज़न की बाईट देते हैं , प्रेस  कान्फरेंस करते हैं , लाखों  की कारों  में बैठकर संसद आते हैं , गपशप  करते हैं , कभी कभार कुछ बोल देते हैं और उम्मीद करते हैं कि देश भर में  रहने वाली जनता उनके वचनों को तलाश करके निकाले और उनके अनुसार पूरी तरह से नाकाम हो चुकी मोदी सरकार के खिलाफ २०१९ में मतदान करे  और हरे भरे दिल्ली शहर से बाहर गए बिना इन  विपक्षी नेताओं को सत्ता सौंप दे .लेकिन राजनीति में ऐसा  नहीं होता . यहाँ न कोई बिल्ली होती है और न कोई छींका टूटता है इसलिए सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को अपना कर्त्तव्य सही  तरह से निभाने के लिए जनता के बीच जाना  होगा . उनको यह  हमेशा ध्यान रखना होगा कि लोकतंत्र में सरकारी पक्ष की भूमिका पर निगरानी  रखने और जनता को चौकन्ना रखने के लिए विपक्ष होता  है . आज की स्थिति यह है कि  विपक्ष अपना काम सही  तरीके से  नहीं कर रहा है .

साभार : देशबन्धु ( 19-05-2017}

Tuesday, March 1, 2016

उर्दू को विदेशी भाषा बताना अज्ञानता है



शेष नारायण सिंह­­­



पिछले दिनों एक खबर आई थी कि दिल्ली की मेट्रो ट्रेन में एक आदमी उर्दू किताब पढ़ रहा था। जिसे देखकर पास ही खड़े कुछ लोगों ने उससे बात करनी शुरू कर दी। इन लोगों की आँखों में उस व्यक्ति के लिए नफरत साफ दिखाई दे रही थी। इतना ही नहींये लोग उसे देखकर कह रहे थे कि उर्दू पढनेवाले सभी पाकिस्तानी है। इन लोगों को पकिस्तान भेज देना चाहिए।’   ज़माना बदल गया है . इतनी बड़ी बात पर कहीं कोई हंगामा नहीं हुआ . उर्दू अखबारों के अलावा कहीं ज़िक्र तक नहीं हुआ . लेकिन आज से करीब तीस साल पहले था तक होता था . १९७८ में देश के गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कहीं कह दिया था कि उर्दू तो विदेशी भाषा है . उस वक़्त के अखबारों में इस बात की खूब चर्चा हुयी थी और कई सम्पादकीय लेखकों ने चौधरी साहेब को आगाह किया था कि उर्दू विदेशी तो कतई नहीं है , वह उनके अपने जन्मस्थान के आसपास के इलाकों  में ही पैदा हुयी और इसी खड़ी बोली के इलाके में परवान चढ़ी. उन दिनों राजनीति में  सरे फेहरिस्त ऐसे लोग होते थे जिनमें से ज़्यादातर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो चुके थे . उन्होंने अपनी आँखों से देखा था कि उर्दू बोलने और लिखने वालों की भारत की जंगे- आज़ादी में कितनी बड़ी भूमिका हुआ करती थी . चौधरी चरण सिंह भी भले आदमी थे और उन्होंने अपनी  गलती को स्वीकार कर लिया और बात आई गयी हो गयी.

दिल्ली मेट्रो की घटना को अगर पैमाना माना जाए तो यह मानना पडेगा कि हालात बिगड़ चुके हैं , बहुत बिगड़ चुके हैं . दिल्ली के आसपास जन्मी  और पलीबढी उर्दू ज़बान को अब गैर ज़िम्मेदार लोगों की नज़र में खतरनाक  भाषा माना जाने लगा है . किसी भी  भाषा और उसमें लिखा साहित्य अगर खतरनाक माना जाने लगे तो यह समाज में मनमानी की ताकतों के बढ़ने का संकेत माना जाता है . इंदिरा गांधी ने जब इमरजेंसी लगाई थी तो किसी को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस वाले उसके घर से या झोले से मार्क्सवादी साहित्य की बरामदगी दिखा देते थे . बस उसको खूंखार आतंकवादी मान लिया जाता था. १९८६ में जब से बाबरी मस्जिद के खिलाफ आन्दोलन शुरू हुआ तब से उर्दू को भी खतरनाक  घोषित करने की साज़िश पर काम चल रहा है . हालांकि सरकारी तौर  पर तो ऐसा  नहीं हुआ है लेकिन सड़कों पर जो लोग किसी को भी अपमानित करने के लिए घूम रहे हैं , उन ठगों के लिए उर्दू पाकिस्तानी हो चुकी है जबकि सच्चाई यह है कि उर्दू भारतीय भाषा है और पाकिस्तान ने उसको अपनी सरकारी भाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया है .  भारतीय के रूप में हमें इस पर गर्व होना चाहिए कि हमारी भाषा किसी और देश की राजभाषा है . तकलीफ तब होती है जब ऐसे कुछ नेता मिलते हैं जो हिंदुत्व की राजनीति के अलंबरदारों की बात को काटना तो चाहते हैं लेकिन उनको मालूम ही नहीं है कि देश के इतिहास में उर्दू का योगदान कितना है . वह उर्दू जो आज़ादी की ख्वाहिश के इज़हार का ज़रिया बनी आज एक धर्म विशेष के लोगों की जबान बताई जा रही है। इसी जबान में कई बार हमारा मुश्तरका तबाही के बाद गम और गुस्से का इज़हार भी किया गया था। इस लेख उन उर्दू प्रेमियों को संबोधित है जो इस ज़बान के खिलाफ हो रहे हमलों से तकलीफ महसूस  करते हैं .

आज जिस जबान को उर्दू कहते हैं वह विकास के कई पड़ावों से होकर गुजरी है। इसके विकास में दोस्ती का पैगाम लेकर आये सूफी फकीरों की खानकाहों का भी बहुत ज़्यादा  योगदान है .सूफियों के दरवाज़ों पर अमीर गरीब सभी आते थे .सब अपनी अपनी जबान में कुछ कहते। इस बातचीत से जो जबान पैदा हो रही थी वही जम्हूरी जबान आने वाली सदियों में इस देश की सबसे महत्वपूर्ण जबान बनने वाली थी। इस तरह की संस्कृति का सबसे बड़ा केंद्र महरौली में कुतुब साहब की खानकाह थी। उनके चिश्तिया सिलसिले के सबसे बड़े बुजुर्ग ख़्वाजा गऱीब नवाज के दरबार में अमीर गरीब हिन्दूमुसलमान सभी आते थे और आशीर्वाद की जो भाषा लेकर जाते थेआने वाले वक्त में उसी का नाम उर्दू होने वाला था। सूफी संतों की खानकाहों पर एक नई ज़बान परवान चढ़ रही थी। मुकामी बोलियों में फारसी और अरबी के शब्द मिल रहे थे और हिंदुस्तान को एक सूत्र में पिरोने वाली ज़बान की बुनियाद पड़ रही थी।इस ज़बान को अब हिंदवी कहा जाने लगा था। बाबा फरीद गंजे शकर ने इसी ज़बान में अपनी बात कही। बाबा फरीद के कलाम को गुरूग्रंथ साहिब में भी शामिल किया गया। दिल्ली और पंजाब में विकसित हो रही इस भाषा को दक्षिण में पहुंचाने का काम ख्वाजा गेसूदराज ने किया। जब वे गुलबर्गा गए और वहीं उनका आस्ताना बना। इस बीच दिल्ली में हिंदवी के सबसे बड़े शायर हज़रत अमीर खुसरो अपने पीर हजरत निजामुद्दीन औलिया के चरणों में बैठकर हिंदवी जबान को छापा तिलक से विभूषित कर रहे थे।


हज़रत अमीर खुसरो की शायरी हमारी  बेहतरीन अदब और विरासत का हिस्सा है . उनसे महबूब-ए-इलाही, हज़रत निजामुद्दीन औलिया  ने ही फरमाया था कि हिंदवी में शायरी करो और इस महान जीनियस ने हिंदवी में वह सब लिखा जो जिंदगी को छूता है। हजरत निजामुद्दीन औलिया के आशीर्वाद से दिल्ली की यह जबान आम आदमी की जबान बनती जा रही थी।

जब तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद शिफ्ट करने का फैसला लिया तो दिल्ली की जनता पर तो पहाड़ टूट पड़ा लेकिन जो लोग वहां गए वे अपने साथ संगीतसाहित्यवास्तु और भाषा की जो परंपरा लेकर गए वह आज भी उस इलाके की थाती है। इस तरह दक्षिण में  भी उर्दू भाषा पूरी शान की भाषा बनी .  1526 में जहीरुद्दीन बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराकर भारत में मुग़ल साम्राज्य की बुनियाद डाली। 17 मुगल बादशाह हुए जिनमें मुहम्मद जलालुद्दीन अकबर सबसे ज्यादा प्रभावशाली हुए। उनके दौर में एक मुकम्मल तहज़ीब विकसित हुई। अकबर ने इंसानी मुहब्बत और रवादारी को हुकूमत का बुनियादी सिद्घांत बनाया। दो तहजीबें इसी दौर में मिलना शुरू हुईं। और हिंदुस्तान की मुश्तरका तहजीब की बुनियाद पड़ी। अकबर की राजधानी आगरा में थी जो ब्रज भाषा का केंद्र था और अकबर के दरबार में उस दौर के सबसे बड़े विद्वान हुआ करते थे।वहां अबुलफजल भी थेतो फैजी भी थेअब्दुर्रहीम खानखाना थे तो बीरबल भी थे। इस दौर में ब्रजभाषा और अवधी भाषाओं का खूब विकास हुआ। यह दौर वह है जब सूफी संतों और भक्ति आंदोलन के संतों ने आम बोलचाल की भाषा में अपनी बात कही। सारी भाषाओं का आपस में मेलजोल बढ़ रहा था और उर्दू जबान की बुनियाद मजबूत हो रही थी। बाबर के समकालीन थे सिखों के गुरू नानक देव। उन्होंने नामदेवबाबा फरीद और कबीर के कलाम को सम्मान दिया और अपने पवित्र ग्रंथ में शामिल किया। इसी दौर में मलिक मुहम्मद जायसी ने पदमावत की रचना की जो अवधी भाषा का महाकाव्य है लेकिन इसका रस्मुल खत फारसी ही है .


उर्दू भारत की आज़ादी की लडाई के भी भाषा  है .कांग्रेस के अधिवेशन में 1916 में लखनऊ में होम रूल का जो प्रस्ताव पास हुआ वह उर्दू में है। 1919 में जब जलियां वाला बाग में अंग्रेजों ने निहत्थे भारतीयों को गोलियों से भून दिया तो उस गम और गुस्से का इज़हार पं. बृज नारायण चकबस्त और अकबर इलाहाबादी ने उर्दू में ही किया था। इस मौके पर लिखा गया मौलाना अबुल कलाम आजाद का लेख आने वाली कई पीढिय़ां याद रखेंगी। हसरत मोहानी ने 1921 के आंदोलन में इकलाब जिंदाबाद का नारा दिया था जो आज न्याय की लड़ाई का निशान बन गया है।आज़ादी के बाद सीमा के दोनों पार जो क़त्लो ग़ारद हुआ था उसको भी उर्दू जबान ने संभालने की पूरी को कोशिश की। हमारी मुश्तरका तबाही के खिलाफ अवाम को फिर से लामबंद करने में उर्दू का बहुत योगदान है। आज यह सियासत के घेर में है  लेकिन उम्मीद बनाए रखने की ज़रूरत है क्योंकि इतनी संपन्न भाषा को राजनीति का कोई भी कारिन्दा दफ़न नहीं का सकता ,चाहे जितना ताक़तवर हो जाए . उर्दू भारत की भाषा है और इसको विदेशी कहना अपनी जहालत का परिचय देना ही है 

Tuesday, December 8, 2015

रमाशंकर यादव ' विद्रोही ' मर गए, हारे नहीं




शेष नारायण सिंह

रमा शंकर यादव ' विद्रोही ' नहीं रहे . बड़े कवि थे रमाशंकर . मुझसे उनकी मुलाक़ात १९७४ में हुयी थी. कादीपुर के संत तुलसीदास डिग्री ( अब पोस्ट ग्रेजुएट ) कालेज में वे बी ए  के  छात्र थे . मैं वहीं प्राचीन इतिहास पढाता था.   जिले के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता , शीतला प्रसाद गुप्त ने मुझे उनके बारे में बताया था.  बताया था कि कस्बे  में  बाएं बाजू की पार्टियों का कोई छात्र संगठन नहीं  था इसलिए किसान सभा के काम में रमा शंकर उनको सहयोग करते थे.  साथ यह भी बताया था कि नौजवान लड़का क्रांतिकारी तो है लेकिन  विचारधारा के स्तर पर सीखने की प्रक्रिया अभी चल  रही है .  उन दिनों कादीपुर का यह कालेज गोरखपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था.  ऐसा लगता था कि इतिहास का पाठ्यक्रम सीधे मैकाले के दफ्तर से डिजाइन होकर आया था. मेरे क्लास में नियम था कि किसी को मेरे लेक्चर के नोट लेने की अनुमति नहीं थी. सबको लेक्चर सुनना पड़ता था और साथ साथ बहस का माहौल बनाने की कोशिश की जाती थी. उन इलाके में उन दिनों  बी ए के किसी छात्र से इतिहास की समझ की बहुत उम्मीद नहीं की जाती थी .  सबसे आसान विषय मानकर लोग इतिहास पढ़ते थे . बी ए के बाद किसी नौकरी की उम्मीद में इकठ्ठा हुए उस क्लास में रमा शंकर यादव अक्सर बुनियादी सवाल उठाते थे . साम्राज्यवादी शोषण के हथियार के रूप में राज्य और सरकार ,  शोषक और शासक वर्ग की पार्टियों का वर्ग चरित्र , उस वक़्त की  सत्ताधारी पार्टी, कांग्रेस और अमरीकी पार्टियों में शोषित पीड़ित जनता  के खिलाफ एका आदि ऐसे मुद्दे वे क्लास में उठाते थे ,जो बहुत सारे अन्य छात्रों की समझ से बहुत दूर के होते थे. रमा  शंकर उन दिनों भी कवितायें लिखते थे लेकिन शायद उपनाम विद्रोही नहीं धारण किया था.  इमरजेंसी लगने पर मेरी नौकरी छूट गई और मैं दिल्ली में रोज़गार की तलाश में ठोकर खाने लगा. फिर उनसे बहुत दिनों तक मुलाक़ात नहीं हुयी .
बी ए के बाद रमाशंकर जिला मुख्यालय , सुलतानपुर चले गए जहां  उनके असली दोस्त असरार खान ने उनको अपने साथ ले लिया . असरार ने छात्र राजनीति में एक मुकाम बना लिया था और उन्होंने ही रमाशंकर को वहां खूब सक्रिय किया . बहुत काम किया इन लोगों ने . बाद में जब असरार  जे एन यू आये  तो रमाशंकर को भी साथ लाये . अपने साथ रखते थे , क्रांतिकारी तेवर दोनों के थे लेकिन बीच में कहीं रमाशंकर ऐसे लोगों की संगत में पड़ गए जिसके बाद वे अन्दर से बार बार टूटे लेकिन हारे नहीं . जितनी बार धोखा खाया  उतने  ही मज़बूत होकर बाहर आये . दिल्ली में कई बार उनसे मुलाक़ात होती थी . आखिरी बार तब मिला जब अपनी बेटी से मिलने मैं और मेरी पत्नी जे एन यू कैम्पस गए. मेरी पत्नी उनको बहुत मानती थीं  . तब तक  विद्रोही  वहां के स्थाई निवासी बन चुके थे ,छात्रों में लोकप्रिय , और फक्कड़ तबियत .  मैंने कहा कि कोई स्थाई व्यवस्था करो , तो जवाब सपाट था . मिडिल क्लास की उन चिंताओं से मुक्त हूँ जिसके लिए आपने अनंत समझौते किये हैं . जे एन यू कैम्पस में यह व्यवस्था स्थाई ही है . भूख से तिलमिलाना तो बहुत पहले छोड़ दिया था , बाकी इस विश्वविद्यालय में कपडे    लत्ते से इज्ज़त मिलने का रिवाज़ तो कभी नहीं था
आज रमाशंकर के जाने से मुझे बहुत तकलीफ हो रही है .   साम्राज्यों के खिलाफ उनकी कवितायें बहुत  सशक्त होती थीं. मुझे यह वाली बहुत प्रभावशाली लगी थी , अन्दर तक कुछ कह गयी थी . बड़ी कविता है यह. इसको सुनाकर मुझसे कहा था १९७४-७५ में आप जो बकवास क्लास में ...... करते थे ,वह सब दिमाग में भरी रहती है , वह  यूनान ,मिस्र ,रोमा  के  मिटने का जो रुदन आप करते थे उसी का गुस्सा है मेरे दिमाग में. लेकिन यार टीचर तुम बढ़िया थे सेस नरायन .


और ये इंसान की बिखरी हुई हड्डियाँ
रोमन के गुलामों की भी हो सकती हैं और
बंगाल के जुलाहों की भी या फ़िर
वियतनामी, फ़िलिस्तीनी, बच्चों की
साम्राज्य आख़िर साम्राज्य होता है

चाहे रोमन साम्राज्य हो, ब्रिटिश साम्राज्य हो
या अत्याधुनिक अमरीकी साम्राज्य
जिसका यही काम होता है कि
पहाड़ों पर पठारों पर नदी किनारे
सागर तीरे इंसानों की हड्डियाँ बिखेरना.

किसी भी साम्राज्य के प्रति उनका जो गुस्सा था वह मुझे धारदार लगता था. कविता मैं नहीं समझता लेकिन कविता पढ़ते हुए मैं रमाशंकर यादव  विद्रोही के चेहरे को समझता ज़रूर था . यह दूसरी कविता सुनाते हुए , जे  एन यू की चट्टानों पर वे बहुत गुस्से में थे.

नदी किनारे, सागर तीरे,
पर्वत-पर्वत घाटी-घाटी,
बना बावला सूंघ रहा हूं,
मैं अपने पुरखों की माटी।
सिंधु, जहां सैंधव टापों के,
गहरे बहुत निशान बने थे,
हाय खुरों से कौन कटा था,
बाबा मेरे किसान बने थे।
ग्रीक बसाया, मिस्र बसाया,
दिया मर्तबा इटली को,
मगध बसा था लौह के ऊपर,
मरे पुरनिया खानों में।
कहां हड़प्पा, कहां सवाना,
कहां वोल्गा, मिसीसिपी,
मरी टेम्स में डूब औरतें,
भूखी, प्यासी, लदी-फदी।
वहां कापुआ के महलों के,
नीचे खून गुलामों के,
बहती है एक धार लहू की,
अरबी तेल खदानों में।
कज्जाकों की बहुत लड़कियां,
भाग गयी मंगोलों पर,
डूबा चाइना यांगटिसी में,
लटका हुआ दिवालों से।
पत्थर ढोता रहा पीठ पर,
तिब्बत दलाई लामा का,
वियतनाम में रेड इंडियन,
बम बंधवाएं पेटों पे।
विश्वपयुद्ध आस्ट्रिया का कुत्ता,
जाकर मरा सर्बिया में,
याद है बसना उन सर्बों का
डेन्यूब नदी के तीरे पर,
रही रौंदती रोमन फौजें
सदियों जिनके सीनों को।
डूबी आबादी शहंशाह के एक
ताज के मोती में,
किस्से कहती रही पुरखिनें,
अनुपम राजकुमारी की।
धंसी लश्क रें, गाएं, भैंसें,
भेड़ बकरियां दलदल में,
कौन लिखेगा इब्नबतूता
या फिरदौसी गजलों में।
खून न सूखा कशाघात का,
घाव न पूजा कोरों का,
अरे वाह रे ब्यूसीफेलस,
चेतक बेदुल घोड़ो का।
जुल्म न होता, जलन न होती,
जोत न जगती, क्रांति न होती,
बिना क्रांति के खुले खजाना,
कहीं कभी भी शांति न होती।

Saturday, November 28, 2015

ज्योतिबा फुले की किताब ,' गुलामगीरी ' शोषित पीड़ित आबादी का हथियार



शेष नारायण सिंह 


दरअसल हिंद स्वराज एक ऐसी किताब है, जिसने भारत के सामाजिक राजनीतिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया। बीसवीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों का सबसे ज़्यादा योगदान है, हिंद स्वराज का नाम उसमें सर्वोपरि है। इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैं, भीमराव अंबेडकर की जाति का विनाश मार्क्‍स और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो, ज्योतिराव फुले की गुलामगिरी और वीडी सावरकर की हिंदुत्व। अंबेडकर, मार्क्‍स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है। क्योंकि मार्क्‍स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी का, सावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है लेकिन 19 वीं सदी के क्रांतिकारी चितंक और वर्णव्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले ज्योतिराव फुले के बारे में जानकारी की कमी है। ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म पुणे में हुआ था और उनके पिता पेशवा के राज्य में बहुत सम्माननीय व्यक्ति थे। लेकिन ज्योतिराव फुले अलग किस्म के इंसान थे। उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जो काम किया उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। उनका जन्म 1827 में पुणे में हुआ था, माता पिता संपन्न थे लेकिन महात्मा फुले हमेशा ही गरीबों के पक्षधर बने रहे। उनकी महानता के कुछ खास कार्यों का ज़‍िक्र करना ज़रूरी है।
1848 में शूद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना कर दी थी। आजकल जिन्हें दलित कहा जाता है, महात्मा फुले के लेखन में उन्हें शूद्रातिशूद्र कहा गया है। 1848 में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोलना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है। क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उन्होंने 1848 में ही मार्क्‍स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का प्रकाशन किया था। 1848 में यह स्कूल खोलकर महात्मा फुले ने उस वक्त के समाज के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया था। उनके अपने पिता गोविंदराव जी भी उस वक्त के सामंती समाज के बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। दलित लड़कियों के स्कूल के मुद्दे पर बहुत झगड़ा हुआ लेकिन ज्योतिराव फुले ने किसी की न सुनी। नतीजतन उन्हें 1849 में घर से निकाल दिया गया। सामाजिक बहिष्कार का जवाब महात्मा फुले ने 1851 में दो और स्कूल खोलकर दिया। जब 1868 में उनके पिताजी की मृत्यु हो गयी तो उन्होंने अपने परिवार के पीने के पानी वाले तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया। 1873 में महात्मा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की और इसी साल उनकी पुस्तक गुलामगिरी का प्रकाशन हुआ। दोनों ही घटनाओं ने पश्चिमी और दक्षिण भारत के भावी इतिहास और चिंतन को बहुत प्रभावित किया।
महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है। वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं। उनका विश्वास था कि अपने एकाधिकार को स्थापित किये रहने के उद्देश्य से ही ब्राह्मणों ने श्रुति और स्मृति का आविष्कार किया था। इन्हीं ग्रंथों के जरिये ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को दैवी रूप देने की कोशिश की। महात्मा फुले ने इस विचारधारा को पूरी तरह ख़ारिज़ कर दिया। फुले को विश्वास था कि ब्राह्मणवाद एक ऐसी धार्मिक व्यवस्था थी जो ब्राह्मणों की प्रभुता की उच्चता को बौद्घिक और तार्किक आधार देने के लिए बनायी गयी थी। उनका हमला ब्राह्मण वर्चस्ववादी दर्शन पर होता था। उनका कहना था कि ब्राह्मणवाद के इतिहास पर गौर करें तो समझ में आ जाएगा कि यह शोषण करने के उद्देश्य से हजारों वर्षों में विकसित की गयी व्यवस्था है। इसमें कुछ भी पवित्र या दैवी नहीं है। न्याय शास्त्र में सत की जानकारी के लिए जिन 16 तरकीबों का वर्णन किया गया है, वितंडा उसमें से एक है। महात्मा फुले ने इसी वितंडा का सहारा लेकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को समाप्त करने की लड़ाई लड़ी। उन्होंने अवतार कल्पना का भी विरोध किया। उन्होंने विष्णु के विभिन्न अवतारों का बहुत ही ज़ोरदार विरोध किया। कई बार उनका विरोध ऐतिहासिक या तार्किक कसौटी पर खरा नहीं उतरता लेकिन उनकी कोशिश थी कि ब्राह्मणवाद ने जो कुछ भी पवित्र या दैवी कह कर प्रचारित कर रखा है उसका विनाश किया जाना चाहिए। उनकी धारणा थी कि उसके बाद ही न्याय पर आधारित व्यवस्था कायम की जा सकेगी। ब्राह्मणवादी धर्म के ईश्वर और आर्यों की उत्पत्ति के बारे में उनके विचार को समझने के लिए ज़रूरी है कि यह ध्यान में रखा जाए कि महात्मा फुले इतिहास नहीं लिख रहे थे। वे सामाजिक न्याय और समरसता के युद्घ की भावी सेनाओं के लिए बीजक लिख रहे थे।
महात्मा फुले ने कर्म विपाक के सिद्धांत को भी ख़ारिज़ कर दिया था, जिसमें जन्म जन्मांतर के पाप पुण्य का हिसाब रखा जाता है। उनका कहना था कि यह सोच जातिव्यवस्था को बढ़ावा देती है इसलिए इसे फौरन ख़ारिज़ किया जाना चाहिए। फुले के लेखन में कहीं भी पुनर्जन्म की बात का खंडन या मंडन नहीं किया गया है। यह अजीब लगता है क्योंकि पुनर्जन्म का आधार तो कर्म विपाक ही है।
महात्मा फुले ने जाति को उत्पादन के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने और ब्राह्मणों के आधिपत्य को स्थापित करने की एक विधा के रूप में देखा। उनके हिसाब से जाति भारतीय समाज की बुनियाद का काम भी करती थी और उसके ऊपर बने ढांचे का भी। उन्होंने शूद्रातिशूद्र राजा, बालिराज और विष्णु के वामनावतार के संघर्ष का बार-बार ज़‍िक्र किया है। ऐसा लगता है कि उनके अंदर यह क्षमता थी कि वह सारे इतिहास की व्याख्या बालि राज-वामन संघर्ष के संदर्भ में कर सकते थे।
स्थापित व्यवस्था के खिलाफ महात्मा फुले के हमले बहुत ही ज़बरदस्त थे। वे एक मिशन को ध्यान में रखकर काम कर रहे थे। उन्होंने इस बात के भी सूत्र दिये, जिसके आधार पर शूद्रातिशूद्रों का अपना धर्म चल सके। वे एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। ब्राह्मणवाद के चातुर्वर्ण्‍य व्यवस्था को उन्होंने ख़ारिज़ किया, ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का, जिसके आधार पर वर्णव्यवस्था की स्थापना हुई थी, को फर्ज़ी बताया और द्वैवर्णिक व्यवस्था की बात की।
महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है। गरीबों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया। उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की। जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था। इस दौर के समाज सुधारकों में किसानों के बारे में विस्तार से सोच-विचार करने का रिवाज़ नहीं था लेकिन महात्मा फुले ने इस सबको अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया।
स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे। मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं। लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा। उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया।
फुले ने विवाह प्रथा में बड़े सुधार की बात की। प्रचलित विवाह प्रथा के कर्मकांड में स्त्री को पुरुष के अधीन माना जाता था लेकिन महात्मा फुले का दर्शन हर स्तर पर गैरबराबरी का विरोध करता था। इसीलिए उन्होंने पंडिता रमाबाई के समर्थन में लोगों को लामबंद किया, जब उन्होंने धर्म परिवर्तन किया और ईसाई बन गयीं। वे धर्म परिवर्तन के समर्थक नहीं थे लेकिन महिला द्वारा अपने फ़ैसले खुद लेने के सैद्घांतिक पक्ष का उन्होंने समर्थन किया।
महात्मा फुले की किताब गुलामगिरी बहुत कम पृष्ठों की एक किताब है, लेकिन इसमें बताये गये विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बहुत सारे आंदोलन चले। उत्तर प्रदेश में चल रही दलित अस्मिता की लड़ाई के बहुत सारे सूत्र गुलामगिरी में ढूंढ़े जा सकते है। आधुनिक भारत महात्मा फुले जैसी क्रांतिकारी विचारक का आभारी है।

Thursday, November 5, 2015

सरदार पटेल ने महात्मा गांधी के आजादी ले सपने को सही रूप दिया था



शेष नारायण सिंह 

आज गोधरा को एक अलग सन्दर्भ में याद किया जाता है लेकिन पंचमहल जिले के इस कस्बे में भारत की आज़ादी के इतिहास की सबसे दिलचस्प कहानी भी शुरू हुयी थी जब १९१७ में यहाँ गुजरात सभा  का राजनीतिक सम्मलेन हुआ था. सरदार तो उनको बाद में कहा  गया लेकिन १९१७ में वे बैरिस्टर वल्लभभाई पटेल थे जो अपने बड़े भाई विट्ठलभाई को वचन दे चुके थे कि वे राजनीति से दूर रहेगें. लेकिन अहमदाबाद में म्युनिसिपल चुनावों की राजनीति में दोस्तों के कहने से थोडा रूचि ले रहे थे .राजनीति से इस क़दर दूर थे कि जब महात्मा गांधी अहमदाबाद के गुजरात क्लब गए तो वल्लभभाई पटेल उनसे मिलने तक नहीं गए. लेकिन १९१७ में सरदार पटेल बिलकुल राजनीति में क़दम रखने के लिए तैयार थे . अहमदाबाद नगरपालिका की राजनीति के अलावा वे महात्मा गांधी की राजनीति से इतना प्रभावित हो चुके थे कि अपनी वकालत के साथ साथ भाषण वगैरह भी देने लगे थे .वे सितंबर १९१७ में महात्मा गांधी के स्वराज अभियान के लिए जनमत तैयार कर रहे थे . यह लग बात हिया कि तब तक वे महात्मा गांधी से मिले नहीं थी. उनकी मुलाक़ात अक्टूबर १९१७ में हुयी जब महात्मा गांधी गुजरात सभा के राजनीतिक सम्मलेन के लिए गोधरा पधारे .यहीं पर सरदार पटेल को गुजरात सभा का सचिव बनाया गया .बाद में इसी गुजरात सभा को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गुजरात इकाई यानी गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नाम दे दिया गया. इसी गोधरा में महात्मा गांधी ने देश की आज़ादी की लड़ाई की कई नई शुरुआतें कीं . इसके पहले  भारत में जितने भी राजनीतिक सम्मलेन होते थे ब्रिटेन के सम्राट के प्रति वफादारी का प्रस्ताव पास किया जाता था . महात्मा गांधी ने उस प्रस्ताव को फाड़कर फेंक दिया  और कहा कि इसकी ज़रूरत नहीं है . इसी गोधरा सम्मलेन में महात्मा गांधी ने कहा कि स्वराज तब तक नहीं आएगा जब तक कि किसानों को साथ नहीं लिया जाएगा इसलिए ज़रूरी है कि सभी लोग भारतीय भाषाओं में भाषण करें . लोकमान्य बाल  गंगाधर तिलक तो मराठी में बोले लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता मुहम्मद अली जिन्ना अंग्रेज़ी के अलावा किसी भाषा में बोलने को तैयार नहीं थी. महात्मा गांधी ने उनको  उनकी मातृभाषा  गुजराती में भाषण देने के लिए मजबूर कर दिया . जिन्ना की महात्मा गांधी से बहुत सारी नाराजगियों में एक नाराज़गी यह भी है क्योंकि बिलकुल अंग्रेज़ी परस्त बन चुके जिन्ना गुजराती में ठीक से  बोल नहीं पाते  थे. यह बात १९४४ में महात्मा गांधी ने अपने साथ बैठे लोगों को  बताई थी.  भारत की आज़ादी की लडाई में गोधरा का एक और महत्व है . वल्लभभाई पटेल के अलावा यहीं एक और राजनीतिक स्तम्भ को महात्मा गांधी ने अपने साथ ले लिया . १९१७ में ही एक  बेहतरीन वकील और लेखक महादेव देसाई को भी महात्मा गांधी ने अपने साथ ले लिया . सरदार पटेल और महादेवभाई देसाई की दोस्ती का भारत की आज़ादी में बहुत योगदान है .यह दोस्ती इसी गोधरा में गुजरात सभा के राजनीतिक सम्मेलन में शुरू हुयी थी और महादेव भाई देसाई के अंतिम समय १९४२ तक चली. महादेवभाई  महात्मा गांधी के साथ पूना के आगा खान पैलेस में गिरफ्तार किये गए थे और वहीं महात्मा जी की मौजूद्गी में उनकी मृत्यु हुयी थी . अहमदनगर जेल में बंद सरदार पटेल को जब यह खबर मिली तो  उन्हें बहुत तकलीफ हुयी थी.
गोधरा से महात्मा गांधी का साथ सरदारश्री को मिला और उसके बाद  वे रुके नहीं . जब गुजरात सभा को गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी बना दिया गया तो वल्लभभाई उसके पहले अध्यक्ष हुए .सारे देश में उनकी राजनीतिक पहचान महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन से बनी . इस आन्दोलन के शुरू होते ही वल्लभभाई ने गुजरात के लगभग सभी गाँवों की यात्रा की कांग्रेस के करीब ३ लाख सदस्य भर्ती किया और करीब १५ लाख रूपया इकट्ठा किया . सन १९२० के १५ लाख रूपये का मतलब आज की भाषा में बहुत ज़्यादा होता है. और यह सारा धन गुजरात के किसानों से इकठ्ठा किया गया था.  सरदारश्री के जीवन का वह दौर शुरू हो चुका था जिसके बाद उन्होंने गांधी जी की किसी बात का विरोध नहीं किया . कई मुद्दों पर असहमति ज़रूर दिखाई लेकिन जब फैसला हो गया तो वे महात्मा जी के फैसले के साथ रहे. असहयोग आन्दोलन के दौर में जब  गोरखपुर के चौरी चौरा में  किसानों ने पुलिस थाने में आग लगा दी तो महात्मा गांधी ने आन्दोलन वापस ले लिया. उनको  आशंका थी कि उसके बाद अंग्रेज़ी राज का दमनचक्र उसी तरह से चल पडेगा जैसे १८५७ के समय में हुआ था . कांग्रेस के बाकी बड़े नेता आन्दोलन  वापस लेने का विरोध करते रहे लेकिन वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी का पूरा समर्थन किया. राजनीतिक कार्य के साथ उन्होने अपने एजेंडे में शराब, छुआछूत और जाती प्रथा के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया . गुजरात के तत्कालीन विकास में सरदार पटेल के इस कार्यक्रम का बड़ा योगदान माना जाता है .
१९२८ में गुजरात के कई जिलों में भयानक अकाल पड़ा लेकिन अंग्रेज़ी सरकार किसी तरह की रियायत देने को तैयार नहीं थी.  बारडोली में यह अकाल सबसे अधिक खौफनाक था .महात्मा गांधी का अहिंसा पर आधारित राजनीति का सिद्धांत असहयोग आन्दोलन के दौरान जांचा परखा जा चुका था. सरदार पटेल ने अहिंसा पर आधारित असहयोग आन्दोलन चलाकर अकालग्रस्त बारडोली में  एक स्थानीय असहयोग आन्दोलन शुरू किया . किसानों ने खेत का लगान देने से मना कर दिया . मूल असहयोग बारडोली में हुआ लेकिन गुजरात के कई इलाकों में सहानुभूति में आन्दोलन तैयार हो गया . सरकार भी जनता को कुचल देने पर आमादा थी . गिरफ्तारियां हुईं, ज़ब्ती हुयी लेकिन वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में आन्दोलन जोर पकड़ता गया . एक मुकाम ऐसा आया जब सरकार को मजबूर कर दिया गया कि वह आन्दोलन को समझौते के आधार पर ख़त्म करे. किसाओं की ज़मीन आदि सब वापस मिल गयी . इसी आन्दोलन में उनके साथियों ने वल्लभ भाई पटेल को  सरदार कहना शुरू कर दिया था . इसी आन्दोलन ने  भारत को  आज़ादी की लडाई का सरदार जिसने जिसने महात्मा गांधी को हमेशा समर्थन किया और जवाहरलाल नेहरू को वह सब करने का मौक़ा दिया जिससे वे महान बने. यहाँ यह ध्यान रखना पडेगा कि सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरु में बहुत अच्छी दोस्ती थी और जवाहरलाल अपने बड़े भाई सरदार पटेल की हर बात मानते थे . केवल एक बार नहीं माना जब नेहरू ने माउंटबेटन के चक्कर में आकर कश्मीर मसला संयुक्त राष्ट्र संघ के हवाले कर दिया . दुनिया जानती है कि नेहरू की वह गलती देश आज तक भोग रहा है .
महात्मा गांधी के सही मायनों में वारिस सरदार पटेल ही थे . १९२० से ३० जनवरी १९४८ तक सरदार पटेल ने महात्मा  गांधी की हर बात को स्वीकार किया था . यहाँ तक कि जब १९४६ में मौलाना आज़ाद के बाद कांग्रेस अध्यक्ष चुनने की बात आयी तो सब की इच्छा थी कि सरदार पटेल ही अध्यक्ष बनें क्योंकि १९४६ का अध्यक्ष ही आज़ाद भारत की सरकार का प्रधान मंत्री होता. कांग्रेस कार्यकारिणी में २६ सदस्य थे जिनमें २३ सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाना चाहते थे . केवल जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद और रफ़ी अहमद किदवई उनके खिलाफ थे . चुनाव होना था .  सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू के बीच चुनाव होना था . बैठक शुरू हो गयी थी . लेकिन उसी बीच सरदार पटेल की बेटी  मणिबेन ने महात्मा गांधी की एक चिट्ठी लाकर सरदार को दे दी. सरदार ने  चिट्ठी पर एक नज़र डाली और उसको कुरते की जेब डाल लिया. उसके बाद उन्होने जवाहरलाल नेहरू का नाम प्रस्तावित कर दिया,  अपना नाम वापस ले लिया . जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष और बाद में वाइसराय के काउन्सिल के उपाध्यक्ष बने . समाजवादी  चिन्तक मधु लिमये अक्सर कहा करते थे कि अगर सरदार पटेल का पूर्ण सहयोग जवाहरलाल को न मिला होता तो  भारत वह न होता जो बन पाया . आज़ादी के बाद सरदार पटेल केवल सवा दो साल जीवित रहे लेकिन जो काम उन्होंने उस कालखंड में कर दिया वह बहुत सारे लोग कई  जिंदगियों में न कर पाते. देशी रियासतों को भारत में मिलाने का काम सरदार पटेल ही के बस की बात  थी , जिसको उन्होंने बखूबी पूरा किया . हैदराबाद के निजाम को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को कई बार नज़रंदाज़ भी किया लेकिन निजाम को बदमाशी नहीं करने दिया . कश्मीर के मामले में भी सरदार पटेल ने वहां के राजा को साफ़ बता दिया कि जब तक भारत में विलय के दस्तावेज़ पर दस्तखत नहीं करोगे कबायली और पाकिस्तानी फौज के हमले से नहीं बचाएगें . वही हुआ. 
 आज़ादी के बाद से ही नेताओं और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सरदार पटेल मुस्लिम विरोधी और आर एस एस का हमदर्द बताता रहा है . उन लोगों की जानकारी के लिए यह बताना ज़रूरी है कि आर एस एस पर प्रतिबन्ध तो कई बार लगा लेकिन भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल ने आर एस एस का संविधान लिखने के लिए उनके नेताओं को मजबूर किया था और उनके  सरसंघचालक को गिरफ्तार किया था . इतिहास सरदार पटेल को मुस्लिम दोस्त के रूप में भी याद रखेगा .जब भी सरदार का आकलन होगा उनको मुसलमानों सहित सभी भारतीयों  के  शुभचिंतक के रूप में याद किया जाएगा . सरदार पटेल महात्मा गांधी की धर्मनिरपेक्षता की समझ के असली वारिस थे .महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में  देश की आजादी के सवाल को हिंदू-मुस्लिम एकता से जोड़ा है। उन्होंने लिखा है - ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं और उन्हें एक -दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।"
महात्मा गांधी ने अपनी बात कह दी और इसी सोच की बुनियाद पर उन्होंने 1920 के आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता की जो मिसाल प्रस्तुत की, उससे अंग्रेजी शासकों को भारत के आम आदमी की ताक़त का अंदाज़ लग गया । आज़ादी की पूरी लड़ाई में महात्मा गांधी ने धर्मनिरपेक्षता की इसी धारा को आगे बढ़ाया। लेकिन अंग्रेज़ी सरकार हिंदू मुस्लिम एकता को किसी कीमत पर कायम नहीं होने देना चाहती थी। उसने कांग्रेस से नाराज़ जिन्ना जैसे  लोगों की मदद से आजादी की लड़ाई में अड़ंगे डालने की कोशिश की और सफल भी हुए। बाद में कांग्रेसियों के ही एक वर्ग ने सरदार को हिंदू संप्रदायवादी साबित करने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली. भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 16दिसंबर 1948 को घोषित किया कि सरकार भारत को ''सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने के लिए कृत संकल्प है।" (हिंदुस्तान टाइम्स - 17-12-1948)।
सरदार पटेल को इतिहास मुसलमानों के एक रक्षक के रूप में भी याद रखेगा। सितंबर 1947 में सरदार को पता लगा कि अमृतसर से गुजरने वाले मुसलमानों के काफिले पर वहां के सिख हमला करने वाले हैं।सरदार अमृतसर गए और वहां करीब दो लाख लोगों की भीड़ जमा हो गई जिनके रिश्तेदारों को पश्चिमी पंजाब में मार डाला गया था। उनके साथ पूरा सरकारी अमला था और सरदार पटेल की बहन भी थीं। भीड़ बदले के लिए तड़प रही थी और कांग्रेस से नाराज थी। सरदार ने इस भीड़ को संबोधित किया और कहा, "इस शहर से गुजर रहे मुस्लिम शरणार्थियों की सुरक्षा का जिम्मा लीजिए ............ मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षा दीजिए और अपने लोगों की डयूटी लगाइए कि वे उन्हें सीमा तक पहुंचा कर आएं।" सरदार पटेल की इस अपील के बाद पंजाब में हिंसा नहीं हुई। कहीं किसी शरणार्थी पर हमला नहीं हुआ.

आज उन्हीं सरदार पटेल का जन्म दिन है . सरदार आज होते तो १४० साल के होते.

Thursday, October 1, 2015

महात्मा गांधी की राजनीति और हिन्द स्वराज

शेष नारायण सिंह

 हिंद स्वराज एक ऐसी किताब हैजिसने भारत के सामाजिक राजनीतिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया। बीसवीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों का सबसे ज़्यादा योगदान हैहिंद स्वराज का नाम उसमें सर्वोपरि है। इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैंभीमराव अंबेडकर की जाति का विनाश, मार्क्‍स और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टोज्योतिराव फुले की गुलामगिरी और वीडी सावरकर की हिंदुत्व। अंबेडकरमार्क्‍स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है। क्योंकि मार्क्‍स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी कासावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है . ज्योतिबा फुले की किताब ' गुलामगीरी' ने बहुत सारे दार्शनिकों और चिंतकों को प्रभावित किया है .


चालीस साल की उम्र में मोहनदास करमचंद गांधी ने 'हिंद स्वराजकी रचना की। 1909 में लिखे गए इस बीजक में भारत के भविष्य को संवारने के सारे मंत्र निहित हैं। अपनी रचना के सौ साल बाद भी यह उतना ही उपयोगी है जितना कि आजादी की लड़ाई के दौरान था। इसी किताब में महात्मा गांधी ने अपनी बाकी जिंदगी की योजना को सूत्र रूप में लिख दिया था। उनका उद्देश्य सिर्फ देश की सेवा करने का और सत्य की खोज करने का था। उन्होंने भूमिका में ही लिख दिया था कि अगर उनके विचार गलत साबित होंतो उन्हें पकड़ कर रखना जरूरी नहीं है। लेकिन अगर वे सच साबित हों तो दूसरे लोग भी उनके मुताबिक आचरण करें। उनकी भावना थी कि ऐसा करना देश के भले के लिए होगा।
अपने प्रकाशन के समय से ही हिंद स्वराज की देश निर्माण और सामाजिक उत्थान के कार्यकर्ताओं के लिए एक बीजक की तरह इस्तेमाल हो रही है। इसमें बताए गए सिद्धांतों को विकसित करके ही 1920 और 1930 के स्वतंत्रता के आंदोलनों का संचालन किया गया। 1921 में यह सिद्घांत सफल नहीं हुए थे लेकिन 1930 में पूरी तरह सफल रहे। हिंद स्वराज के आलोचक भी बहुत सारे थे। उनमें सबसे आदरणीय नाम गोपाल कृष्ण गोखले का है। गोखले जी 1912 में जब दक्षिण अफ्रीका गए तो उन्होंने मूल गुजराती किताब का अंग्रेजी अनुवाद देखा था। उन्हें उसका मजमून इतना अनगढ़ लगा कि उन्होंने भविष्यवाणी की कि गांधी जी एक साल भारत में रहने के बाद खुद ही उस पुस्तक का नाश कर देंगे। महादेव भाई देसाई ने लिखा है कि गोखले जी की वह भविष्यवाणी सही नहीं निकली। 1921 में किताब फिर छपी और महात्मा गांधी ने पुस्तक के बारे में लिखा कि "वह द्वेष धर्म की जगह प्रेम धर्म सिखाती हैहिंसा की जगह आत्म बलिदान को रखती हैपशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है। उसमें से मैंने सिर्फ एक शब्द रद्द किया है। उसे छोड़कर कुछ भी फेरबदल नहीं किया है। यह किताब 1909 में लिखी गई थी। इसमें जो मैंने मान्यता प्रकट की हैवह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है।"
महादेव भाई देसाई ने किताब की 1938 की भूमिका में लिखा है कि '1938 में भी गांधी जी को कुछ जगहों पर भाषा बदलने के सिवा और कुछ फेरबदल करने जैसा नहीं लगा। हिंद स्वराज एक ऐसे ईमानदार व्यक्ति की शुरुआती रचना है जिसे आगे चलकर भारत की आजादी को सुनिश्चित करना था और सत्य और अहिंसा जैसे दो औजार मानवता को देना था जो भविष्य की सभ्यताओं को संभाल सकेंगे। किताब की 1921 की प्रस्तावना में महात्मा गांधी ने साफ लिख दिया था कि 'ऐसा न मान लें कि इस किताब में जिस स्वराज की तस्वीर मैंने खड़ी की हैवैसा स्वराज्य कायम करने के लिए मेरी कोशिशें चल रही हैंमैं जानता हूं कि अभी हिंदुस्तान उसके लिए तैयार नहीं है।..... लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आज की मेरी सामूहिक प्रवृत्ति का ध्येय तो हिंदुस्तान की प्रजा की इच्छा के मुताबिक पालियामेंटरी ढंग का स्वराज्य पाना है।"
इसका मतलब यह हुआ कि 1921 तक महात्मा गांधी इस बात के लिए मन बना चुके थे कि भारत को संसदीय ढंग का स्वराज्य हासिल करना है। यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि आजकल देश में एक नई तरह की तानाशाही सोच के कुछ राजनेता यह साबित करने के चक्कर में हैं कि महात्मा गांधी तो संसदीय जनतंत्र की अवधारणा के खिलाफ थे। इसमें दो राय नहीं कि 1909 वाली किताब में महात्मा गांधी ने ब्रिटेन की पार्लियामेंट की बांझ और बेसवा कहा था (हिंद स्वराज पृष्ठ 13)। लेकिन यह संदर्भ ब्रिटेन की पार्लियामेंट के उस वक्त के नकारापन के हवाले से कहा गया था। बाद के पृष्ठों में पार्लियामेंट के असली कर्तव्य के बारे में बात करके महात्मा जी ने बात को सही परिप्रेक्ष्य में रख दिया था और 1921 में तो साफ कह दिया था कि उनका प्रयास संसदीय लोकतंत्र की तर्ज पर आजादी हासिल करने का है। यहां महात्मा गांधी के 30 अप्रैल 1933 के हरिजन बंधु के अंक में लिखे गए लेख का उल्लेख करना जरूरी है। लिखा है, ''सत्य की अपनी खोज में मैंने बहुत से विचारों को छोड़ा है और अनेक नई बातें सीखा भी हूं। उमर में भले ही मैं बूढ़ा हो गया हूंलेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरा आतंरिक विकास होना बंद हो गया है।.... इसलिए जब किसी पाठक को मेरे दो लेखों में विरोध जैसा लगेतब अगर उसे मेरी समझदारी में विश्वास हो तो वह एक ही विषय पर लिखे हुए दो लेखों में से मेरे बाद के लेख को प्रमाणभूत माने।" इसका मतलब यह हुआ कि महात्मा जी ने अपने विचार में किसी सांचाबद्घ सोच को स्थान देने की सारी संभावनाओं को शुरू में ही समाप्त कर दिया था।
उन्होंने सुनिश्चित कर लिया था कि उनका दर्शन एक सतत विकासमान विचार है और उसे हमेशा मानवता के हित में संदर्भ के साथ विकसित किया जाता रहेगा।
महात्मा गांधी के पूरे दर्शन में दो बातें महत्वपूर्ण हैं। सत्य के प्रति आग्रह और अहिंसा में पूर्ण विश्वास। चौरी चौरा की हिंसक घटनाओं के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया था। इस फैसले का विरोध हर स्तर पर हुआ लेकिन गांधी जी किसी भी कीमत पर अपने आंदोलन को हिंसक नहीं होने देना चाहते थें। उनका कहना था कि अनुचित साधन का इस्तेमाल करके जो कुछ भी हासिल होगावह सही नहीं है। महात्मा गांधी के दर्शन में साधन की पवित्रता को बहुत महत्व दिया गया है और यहां हिंद स्वराज का स्थाई भाव है। लिखते हैं कि अगर कोई यह कहता है कि साध्य और साधन के बीच में कोई संबंध नहीं है तो यह बहुत बड़ी भूल है। यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ। हिंद स्वराज में लिखा है कि साधन बीज है और साध्य पेड़ है इसलिए जितना संबंध बीज और पेड़ के बीच में हैउतना ही साधन और साध्य के बीच में है। हिंद स्वराज में गांधी जी ने साधन की पवित्रता को बहुत ही विस्तार से समझाया है। उनका हर काम जीवन भर इसी बुनियादी सोच पर चलता रहा है और बिना खडूगबिना ढाल भारत की आजादी को सुनिश्चित करने में सफल रहे।
हिंद स्वराज में महात्मा गांधी ने भारत की भावी राजनीति की बुनियाद के रूप में हिंदू और मुसलमान की एकता को स्थापित कर दिया था। उन्होंने साफ कह दिया कि, ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिएतो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें तो उसे भी सपना ही समझिए।.... मुझे झगड़ा न करना होतो मुसलमान क्या करेगाऔर मुसलमान को झगड़ा न करना होतो मैं क्या कर सकता हूंहवा में हाथ उठाने वाले का हाथ उखड़ जाता है। सब अपने धर्म का स्वरूप समझकर उससे चिपके रहें और शास्त्रियों व मुल्लाओं को बीच में न आने देंतो झगड़े का मुंह हमेशा के लिए काला रहेगा।' (हिंद स्वराजपृष्ठ 31 और 35) यानी अगर स्वार्थी तत्वों की बात न मानकर इस देश के हिंदू मुसलमान अपने धर्म की मूल भावनाओं को समझें और पालन करें तो आज भी देश में अमन चैन कायम रह सकता है और प्रगति का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
इस तरह हम देखते है कि आज से सौ से अधिक वर्ष पहले राजनीतिक और सामाजिक आचरण का जो बीजक महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज के रूप में लिखा थावह आने वाली सभ्यताओं को अमन चैन की जिंदगी जीने की प्रेरणा देता रहेगा।