Sunday, October 22, 2017

राजस्थान में प्रेस की आज़ादी को सीमित करने की तैयारी


शेष नारायण सिंह


राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार की तरफ से एक अध्यादेश जारी हुआ है , जो अगस्त १९८२ में बिहार के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री  डॉ जगन्नाथ मिश्र के उस काले कानून की याद दिला देता  है जो उन्होंने प्रेस की आज़ादी को रौंद देने के लिए कानून की किताबों में दर्ज करवाने की साज़िश की थी . डॉ जगन्नाथ मिश्र ने उस बिल में ऐसा इंतज़ाम किया था कि पत्रकारों को ऐसी सज़ा दी जाए जो एक हत्यारे को भी नहीं दी जा सकती थी. अपराध संहिता और दंड प्रक्रिया में संशोधन कर दिया गया था . पत्रकार के खिलाफ अगर एफ आई आर दर्ज हो जाए तो उसके तथाकथित अपराध को गैरज़मानती बना दिया गया था . पुलिस के पास यह अधिकार आ गया था कि वह किसी भी पत्रकार को पकड़कर मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करके उसको सख्त से सख्त सज़ा दिलवा सकती थी . उस बिल को काला बिल कहा गया , पूरे देश के पत्रकार सड़क पर आ गए और तत्कालीन प्रधानमंत्री और डॉ जगन्नाथ मिश्र की आका इंदिरा गांधी ने हस्तक्षेप किया और उस काले कानून को वापस लेना पड़ा . इंदिरा गांधी पांच साल पहले प्रेस की आज़ादी को  रौंदने का नतीजा भोग चुकी थीं. उनके बेटे और उनके  सलाहकारों ने सेंसरशिप लगा दी थी और १९७७ का चुनाव बुरी तरह से हार चुकी थीं. डॉ मिश्र ने अपने कुछ ख़ास चेला टाइप अफसरों की सलाह से यह कानून बनाया था लेकिन मीडिया और जनता की प्रतिरोध की आवाज़ इतनी तेज़ हो गयी कि इस काले कानून को वापस लेकर अपनी कुर्सी बचाना ही  उनको सही फैसला लगा . डॉ मिश्र ने भी हद कर दी थी. पत्रकार को अपराधी की श्रेणी में बैठाने  का पूरा बंदोबस्त कर दिया था. ताजीरात हिन्द की दफा २९२  और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन ४५५ को बदल दिया था  अपनी इस कारस्तानी को उन्होंने बिहार विधानसभा में पारित भी करवा लिया था .
बिहार के इस काले कानून को दफ़न हुए ३५ साल हो गए हैं . इस बीच कई  राज्य सरकारों ने इसी तरह का दुस्साहस  किया लेकिन शुरुआती कोशिशें ही नाकाम कर दी गयीं . बिहार वाले काले बिल की तरह का ही एक अध्यादेश इस बार राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे लेकार आयी हैं . यह देखना दिलचस्प होगा कि उनके इस अध्यादेश के सार्वजनिक बहस के दायरे में आ जाने के बाद केंद्र सरकार और उनकी  पार्टी क्या रुख अपनाती है .जहां तक वसुंधरा राजे की बात है उन्होंने तो यह पेशबंदी मुकम्मल तरीके से कर ली है कि अगले साल होने वाले चुनावों के मद्दे-नज़र उनकी सरकार की पिछले पांच साल की  गलतियाँ उनकी पार्टी के नेताओं और आम जनता तक मीडिया के ज़रिये न पंहुचें ...

राजस्थान सरकार के आर्डिनेंस में जो प्रावधान हैं वे निश्चित रूप से लोकशाही पर सीधा हमला हैं .राजस्थान सरकार का यह अध्यादेश मूल रूप से भ्रष्ट जजोंमैजिस्ट्रेटों और सरकारी अफसरों को बचाने के लिए लाया  गया  है लेकिन इसी में यह व्यवस्था भी है कि मीडिया उन  आरोपों के बारे में कोई रिपार्ट नहीं करेगा जब तक कि सम्बंधित अधिकारी के खिलाफ मुक़दमा चलाने की अनुमति सरकार की तरफ से नहीं मिल जायेगी. क्रिमिनल लाज ( राजस्थान अमेंडमेंट ) अध्यादेश २०१७ नाम के इस आर्डिनेंस को पिछले महीने  जारी किया गया था और अब सरकार इसको कानून का रूप देने के लिए बिल के साथ तैयार है .

 इस बिल को देखते ही लगता है कि जिस तरह से राजे महराजे अपने लोगों को  किसी भी अपराध से मुक्त करने के लिए सदा तैयार रहते थे ,उसी तरह राजस्थान की राजशाही परम्परा की वारिस मुख्यमंत्री ने अपने भ्रष्ट अधिकारियों के कारनामों पर पर्दा  डालने के लिए जल्दी में  यह सारा कार्यक्रम रचा  है . इस अध्यादेश में यह प्रावधान है कि सरकार की मंजूरी के बिना जज,मैजिस्ट्रेट,और अन्य सरकारी कर्मचारियों के उन कामों की जांच नहीं की जा सकती जो उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाते समय किया हो. सबको मालूम है कि सरकारी बाबू सारे भ्रष्टाचार ड्यूटी  के समय ही करते हैं. ऐसा लगता है कि उनके उन्हीं कारनामों की भ्रष्टाचार से सम्बंधित जांच में अडंगा डालने के लिए यह कानून लाया जा  रहा है .  इसके लपेटे में मीडिया को भी ले लिया गया है. कानून में व्यवस्था दी गयी है कि जब तक भ्रष्टाचार की जांच के लिए  सरकार की मंजूरी नहीं मिल जाती तब तक मीडिया भी आरोपों के बारे में रिपोर्ट नहीं कर सकता. इस मंजूरी में छः महीने लग सकते हैं .
अभी तक ऐसा होता रहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अगर कोई व्यक्ति शिकायत करता था और जांच एजेंसी जांच करने से इनकार कर देती थी  तो पीड़ित पक्ष मुक़दमा करके कोर्ट से जांच का आदेश करवा लेता था . जांच एजेंसी को एफ आई आर दर्ज करके जांच की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती थी . लेकिन अब राजस्थान में ऐसा नहीं हो सकेगा . प्रस्तावित कानून में इस पर भी रोक लगा दी गयी है . लिखा है ," कोई भी मैजिस्ट्रेट किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ किसी जांच का आदेश नहीं देगा जो वर्तमान या भूतकाल में जजमैजिस्ट्रेट या सरकारी कर्मचारी रह चुका हो ". हाँ अगर सरकार जांच एजेंसी की अनुमति मांगने वाली दरखास्त पर १८० दिन तक कोई कार्रवाई नहीं करती तो जांच एजेंसी को जांच करनी की स्वतंत्रता होगी . प्रस्तावित कानून में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में भी परिवर्तन किया  गया है . इसके कानून बन जाने के बाद भ्रष्ट  सरकारी कर्मचारी का नाम ,पता फोटोऔर उसके परिवार के बारे में कोई भी जानकारी न तो छापी जा सकती है और न ही किसी अन्य रूप में प्रकाशित की जा सकती है . अगर किसी ने इस नियम का उन्ल्लंघन किया उसको दो साल की सज़ा हो सकती है . .
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प्रस्तावित कानून में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन १५६ ( ३) और १९०(१) में भीबद्लाव  किया जाएगा जिसमें प्रावधान है कि कोई भी मैजिस्ट्रेट किसी भी अपराध का संज्ञान ले सकता है और जांच का आदेश दे सकता है .अब इसमें  संशोधन किया जा रहा है  अब इस सेक्शन के तहत कोई भी मैजिस्ट्रेट  किसी भी सरकारी कर्मचारीजज या मैजिस्ट्रेट के खिलाफ  किसी जांच का आदेश नहीं दे सकता जब तक की सरकार से जांच की अनुमति न ले ली गयी हो.. अगर कथित अपराध उसकी ड्यूटी के दौरान किया  गया है . यह नियम भूतपूर्व कर्मचारियों पर भी लागू होगा.
 सभी सरकारी कर्मचारियों को निर्देश जारी कर दिया गया है कि वे किसी भी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ प्रेस या सोशल मीडिया के ज़रिये कोई भी आरोप न लगाएं और  न ही कोई कमेन्ट करें .  सरकार के नियमों की किताब के हवाले से चेतावनी दी गयी है कि अगर किसी ने ऐसा नहीं किया तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जायेगी. वसुंधरा राजे की सरकार अपराध की जांच के नियमों  में इतना मूलभूत बदलाव करके राजस्थान में  भ्रष्टाचार को खुली छूट देने की  कोशिश  कर रही है . साथ ही प्रेस की आज़ादी पर भी ऐलानियाँ हमला कर रही है . राजस्थान की मुख्यमंत्री को पता होना चाहिए कि भारत में प्रेस की आज़ादी किसी नेता की तरफ से मिली हुयी खैरात नहीं है . यह भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद १९ (१)(ए) में गारंटी के रूप में मिला हुआ अधिकार है  और उसको बदलने की कोशिश जिसने भी किया उसने उसकी सज़ा भुगती है. इंदिरा  गांधी  को जो सज़ा मिली थी उसको पूरी दुनिया जानती है . प्रेस की आज़ादी कुचलने के कारण ही उनको १९७७ में चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था.
 संविधान के मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद १९(१) ( ए) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी देश के हर नागरिक को उपलब्ध है . संविधान इसकी गारंटी देता है . मीडिया की आज़ादी संविधान के इसी अनुच्छेद से मिलती है . लेकिन यह आज़ादी निरंकुश नहीं है . अनुच्छेद १९ (२) के तहत कुछ पाबंदियां भी हैं. संविधान के अनुसार ' सबको अभिव्यक्ति की आज़ादी है .इस अधिकार में यह भी शामिल है कि सभी व्यक्ति बिना किसी बाहरी दखलन्दाजी के स्वतंत्र राय रख सकते हैं ,किसी भी माध्यम से सूचना ग्रहण कर सकते हैं , किसी को भी सूचना दे सकते हैं "
सभी सरकारों ने प्रेस की इस स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की बार बार कोशिश की है लेकिन संविधान को पालन करवाने का ज़िम्मा सुप्रीम कोर्ट के पास है . सुप्रीम कोर्ट संविधान के उन प्रावधानों की सही व्याख्या भी करता है जिन पर कोई विवाद हो . सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में यह भी है कि अगर कोई संविधान की मनमानी व्याख्या करने की कोशिश करे तो उसको नियंत्रित करे. कई बार सरकारें यह कहती भी पाई गयी हैं कि संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता जैसी किसी भी बात की गारंटी नहीं दी गयी है. सरकारों के ऐसे आग्रह  सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा ही दुरुस्त किया है . संविधान के लागू होने के कुछ दिन बाद ही यह नौबत आ गयी थी . उस समय सुप्रीम कोर्ट ने  रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के मुक़दमे में आदेश दिया था कि " अभिव्यक्ति की आज़ादी सभी लोकतांत्रिक संगठनों की बुनियाद है " इन्डियन एक्सप्रेस बनाम यूनियन आफ इण्डिया के केस में कोर्ट ने कहा कि हालांकि  संविधान के अनुच्छेद १९ में  कहीं भी ' फ्रीडम आफ प्रेस ' शब्दों  का प्रयोग नहीं हुआ है लेकिन यह अनुच्छेद १९(१) ( ए) में समाहित है .इसी तरह से बेनेट कोलमैन एंड कंपनी बनाम यूनियन आफ इण्डिया के केस में सरकार के कहा था कि अखबार की पृष्ठ संख्या कम कर दी जाए . टाइम्स आफ इण्डिया ग्रुप की कंपनी बेनेट कोलमैन ने न्यूजप्रिंट कंट्रोल आर्डर को चुनौती देते हुए मुक़दमा कर दिया और कोर्ट ने आदेश दिया कि अख़बार की पेज संख्या कम करने संबंधी आदेश संविधान के अनुच्छेद १९(१)(ए ) का उन्ल्लंघन करता है .
इस बात की पूरी संभावना है कि जनमत के दबाव के चलते वसुंधरा राजे सरकार को अपने विवादित कानून को ख़त्म करना पड़ेगा लेकिन अगर वे जिद पर अड़ी रहीं तो सुप्रीम कोर्ट से तो प्रेस की आज़ादी की हिफाज़त की उम्मीद हमेशा ही बनी हुयी है 

Thursday, October 19, 2017

दीवाली , गरीबी , मेरा गाँव और बिरजू फुआ.




शेष नारायण सिंह


दीवाली के दिन जब मुझे अपने गाँव की याद आती है तो उसके साथ ही  बिरजू फुआ की याद आती है. दीवाली के दिन उनके घर खाना पंहुचाना मेरे बचपन का एक ज़रूरी काम हुआ करता था. बाद में मेरी छोटी बहन मुन्नी ने यह काम संभाल लिया. बिरजू फुआ के घर आस पड़ोस के कई घरों से खाना  जाता था. उनका पूरा नाम बृजराज कुंवर थासन पैंतीस के आस पास उनकी शादी उनके पिता जी ने बहुत ही शान शौकत से सरुआर में कर दिया था. सरुआर उस इलाके को कहते थे जो अयोध्या से सरयू नदी को पार करने के बाद पड़ता है. यह गोंडा जिले का लकड़मंडी के बाद का इलाका है. उसको सम्पन्नता का क्षेत्र माना जाता था. बिरजू फुआ के पिता जी गाँव के संपन्न ठाकुर साहेब थे वे उनकी इकलौती बेटी थीं, उन्होंने काफी मेहनत से  योग्य वर ढूंढ कर बेटी की शादी की थी. लेकिन ससुराल में उनकी बनी नहीं और वे नाराज़ होकर वापस अपने माता पिता के पास चली आयीं.  बाप ने बेटी को गले लगाया और वे यहीं रहने लगीं . लेकिन कुछ ही वर्षों के बाद उनके पिता जी की मृत्यु हो गयी . उसके बाद तो अकेली माँ को छोड़कर जाने के बारे में वे सोच भी नहीं सकती थीं. यहीं की हो कर रह गयीं. अगर पढी लिखी होतीं, अपने अधिकार के प्रति सजग होतीं तो बहुत फर्क  नहीं पड़ने वाला था लेकिन  अवध के ग्रामीण इलाकों में निरक्षर बेटी को उसके बाप के भाई भतीजे फालतू  की चीज़ समझते हैं. बेटी को ज़मीन में उसका हक देने को तैयार नहीं  होते .  उनके पिता जी की मृत्यु के बाद उनके खानदान वालों ने तिकड़म करके उनकी ज़मीन अपने नाम करवा लिया . थोड़ी बहुत ज़मीन उनकी विधवा यानी  बिरजू की माई  को मिली  .उसको भी  १९७४ में चकबंदी के दौरान हड़प लिया गया . अब संपत्ति के नाम पर उनके पास उनका पुराना घर बचा था जो गिरते पड़ते एक झोपडीनुमा हो गया था. मां बेटी अपनी झोपडी में रहती थीं.  जब तक ज़मीन थी तब तक किसी से हल बैल मांग कर कुछ पैदा हो जाता था लेकिन ज़मीन चली जाने के बाद उन्होंने  बकरियां पालीं, उनके यहाँ कई बकरियां होती थीं, उन दिनों बकरी पालने के लिए खेत होना ज़रूरी नहीं होता था. पेड़ की झलासी, जंगली पेड़ पौधों की पत्तियाँ आदि खाकर बकरियां पल जाती थीं. उन्हीं बकरियों का दूध  बेचकर उनका रोज़मर्रा का काम चलता था. बकरी के बच्चे बेचकर कपडे लत्ते ले लिए जाते थे.  
जब उनकी माई मर गयीं तो बिरजू फुआ पर वज्र टूट पड़ा. उसके साथ साथ ही बकरियां भी सब खत्म हो गयीं. हालांकि उस समय उनकी उम्र साठ साल से कम नहीं रही होगी लेकिन अपनी माई पर भावनात्मक रूप से पूरी तरह निर्भर थीं. माँ के जाने के बाद  उनको दिलासा देने वाली बड़ी बूढ़ी  महिलाओं ने समझाया कि परेशान मत होइए , गॉंव है, सब अपने ही तो हैं ,ज़िन्दगी की नाव पार  हो जायेगी .

उसके बाद से गाँव के परिवारों के सहारे ही उनकी ज़िंदगी कटने वाली थी.  हमारे गाँवों में साल भर किसी न किसी के यहाँ कोई न कोई प्रयोजन पड़ता ही रहता है. अपने सगे भतीजों के  यहाँ तो वे कभी नहीं गयीं लेकिन पड़ोस के कुछ परिवारों  ने उनको संभाल लिया . अपने घर में तो अन्न का कोई साधन नहीं था लेकिन उन्होंने मजदूरी नहीं की. ठाकुर की बेटी थीं ,मजदूरी कैसे करतीं. सामंती संस्कार कूट कूट कर भरे हुए थे  .लेकिन पड़ोस के  ठाकुरों के जिन घरों में उनसे इज़्ज़त से बात की जाती थी, उनके यहाँ  चली जाती थीं. जो भी काम हो रहा हो ,उसमें हाथ लगा देती थीं. घर की मालकिन समेत सभी फुआ, फुआ करते रहते थे. जो भी खाना घर में बना होता था , वे भी उसी में शामिल हो जाती थीं.  फिर अगले दिन किसी और के यहाँ . शादी ब्याह में मंगल गीत गाये जाते थे . ढोलक बिरजू फुआ के हाथ से ही  बजता था.   बाद की पीढ़ियों के कुछ लड़के लडकियां उनको झिड़क भी देते थे तो कुछ बोलती नहीं थीं. लेकिन उनके चेहरे पर दर्द का जो मजमून दर्ज होता था, वह  मैंने कई बार देखा है . उस इबारत का अर्थ मुझे अन्दर तक झकझोर देता था. लेकिन ऐसे बदतमीज बहुत कम थे जो उनकी गरीबी के कारण  उनको अपमानित करते थे . हर त्यौहार में उनके चाहने वाले परिवारों से चुपके से खाना उनकी झोपडी तक पंहुचता था. बचपन के सामंती संस्कार ऐसे थे कि परजा पवन का कोई आदमी या औरत अगर उनके घर त्यौहार के बाद आ जाए तो उसको भी कुछ खाने को देती थीं क्योंकि उनके यहाँ कई परिवारों से कुछ न कुछ आया  रहता था . उनके सबसे करीबी पड़ोसी और मेरे मित्र तेज  बहादुर सिंह उनको हमेशा " साहेब" कहकर ही संबोधित करते थे. अपने अंतिम दिनों में वे चल फिर सकने लायक भी नहीं रह गयी थीं लेकिन अपनी मृत्यु के बाद लावारिस नहीं रहीं . पड़ोस के परिवारों के लोगों ने वहीं पर उनका अंतिम संस्कार किया जहां जवार के राजा रंक फ़कीर सब जाते थे. ग्रामीण जीवन में अपनेपन के जो बुनियादी संस्कार भरे पड़े हैं, शायद महात्मा गांधी ने उनके महत्व को समझा था और इसीलिये आग्रह किया था कि आज़ादी के बाद देश के विकास का जो भी माडल अपनाया जाए उसमें गाँव की केंद्रीय भूमिका  होनी चाहिए, गाँव को ही विकास की इकाई माना जाना  चाहिए . लेकिन  जवाहरलाल नेहरू ने ब्लाक को विकास की इकई बनाया और ग्रामीण विकास की नौकरशाही का एक बहुत बड़ा नया ढांचा तैयार कर दिया .  सोचता हूँ कि अगर विकास का गांधीवादी मन्त्र माना गया होता तो आज हमारे गाँवों की वह दुर्दशा न  होती जो आज हो रही है.

Sunday, October 15, 2017

किसान को बेचारा मानकर शासक वर्ग विकास में बाधा डालते हैं .



शेष नारायण सिंह

करीब चालीस साल बाद कुवार के महीने में  गाँव गया. मेरे गाँव में पांडे बाबा वाला महीना बहुत ही खूबसूरत होता है. न गर्मी न ठंडी,   तरह तरह की फसलों की खुशबू हवा में तैरती रहती है. अन्य इलाकों  में जिस त्यौहार को  विजयादशमी या दशहरा कहा जाता है उसको मेरे क्षेत्र में पांडे बाबा ही कहा जाता था. पांडे बाबा हमारे यहाँ के लोकदेवता हैं . उनको धान चढ़ाया जाता था. उनका  इतिहास  मुझे नहीं पता है लेकिन माना जाता था कि पांडे बाबा की पूजा करने से बैलों का स्वास्थ्य बिलकुल सही रहता है . गोमती नदी के किनारे दक्षिण में धोपाप है और  नदी के उस पार पांडे बाबा का स्थान है . जहां उनका ठिकाना है उस गाँव का नाम बढ़ौना डीह है लेकिन अब उसको  पांडे बाबा के नाम से ही जाना जाता है . आज के चालीस साल पहले हर  घर से कोई पुरुष सदस्य पांडे बाबा के मेले में दशमी के दिन ज़रूर जाता था.. हर गाँव से हर घर से लोग जाते थे. बैलों की खैरियत तो सबको चाहिए होती थी. मैं पहली बार आज से पचास साल पहले आपने गाँव के कुछ वरिष्ठ लोगों के  साथ गया था,मेरे बाबू नहीं जा सके थे . उन  दिनों दशमी तक धान की फसल तैयार  हो चुकी होती थी ,अब नहीं होती . इस बार मैंने देखा कि धान के पौधों में अभी फूल ही लग रहे थे ,यानी अभी महीने भर की कसर है.
अब कोई पांडे बाबा नहीं जाता. क्योंकि अब किसी को बैलों के अच्छे स्वास्थ्य की ज़रूरत ही नहीं है. अब खेती में बैलों की कोई भूमिका नहीं है . पहले बैलों से हल चलते थे सिंचाई के लिए भी कुएं से पानी निकालने में बैलों की अहम भूमिका होती थीबैलगाड़ी या लढा से सामान  ढोया जाता था.  यानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बैलों की बहुत बड़ी भूमिका होती थी. अब नहीं होती. अब ट्रैक्टर से खेत जोते जाते हैं ट्यूबवेल से सिंचाई होती है ट्राली से माल ढोया जाता है .अब ग्रामीण  व्यवस्था में बैलों की कोई भूमिका नहीं होती. इसलिए अगर घर में पल रही गाय बछड़े को जन्म दे देती है तो लोग दुखी हो जाते हैं . अभी तक तो बछड़े को औने पौने दाम पर बेच दिया जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होता. गाय या बछड़े को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना अब असंभव है. स्वयम्भू गौरक्षक ऐसा होने नहीं देते . नतीजा यह हो रहा है कि एक ऐसे जानवर को बाँध कर खिलाना पड़ रहा है  जो गाय और भैंस का चारा खाता है और किसान की आर्थिक स्थिति को कमज़ोर करता  है. पिछले करीब चार  महीने से एक नयी परम्परा शुरू हो गयी है . अब लोग  अपने गाँव से थोड़ी दूर ले जाकर बछड़ों को रात बिरात छोड़ आते हैं. वे खुले घूमते हैं और जहां भी हरी फसल दिखती हसी,चरते खाते हैं .  कुछ साल पहले हमारे गाँवों में पता नहीं कहाँ से नील गाय बहुत बड़ी संख्या में आ गए थे. अब संकट का रूप धारण कर चुके हैं . बताते हैं कि नील गायों को डराने के  लिए १०-१५ साल पहले सरकारी तौर पर जंगली सूअर छोड़ दिए गए थे . सूअरों ने नील गाय को तो भगाया नहीं ,खुद  ही जम  गए . अब तक हरियाली वाली फसलें नील गाय खाते थे . आलूशकरकंद प्याज ,लहसुनगाजर ,मूलीआदि ज़मीन के नीचे होने वाली फसलों को सुअर नुक्सान पंहुचा रहे थे और अब इसी जमात में वे बछड़े भी शामिल हो गए हैं.जिनको किसानों ने ही  छुट्टा छोड़  दिया है . खेती की हालत बहुत ही ख़राब है .
कई लोगों को प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का वह भाषण बहुत अच्छी तरह से याद है जिसमें उन्होंने २०१४ के लोकसभा चुनाव के पहले कहा था कि किसान की आमदनी दुगुनी कर दी जायेगी . नीतियाँ ऐसी बनाई जायेंगी जिस से किसान को सम्पन्नता की राह पर डाल दिया जाएगा . उनकी बातों पर भरोसा करके किसानों ने उनको वोट दिया ,लोकसभा में तो जिताया ही,  विधान सभा में भी उनकी पार्टी को  वोट दिया और सरकार बनवा दी . लेकिन उत्तर प्रदेश में  उनकी सरकार बनते ही पशुओं की बिक्री एकदम बंद हो गयी . हर गाँव  में दो चार ऐसे नौजवान प्रकट हो गए जिनके जीवन का उद्देश्य ही गौवंश की रक्षा है. लोग परेशान हैं कि जाएँ तो जाएँ कहाँ .जानवरों को बेचकर किसान को अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी. आमदनी दुगुना करने के वायदे वाली सरकार के संरक्षण में काम कर रहे गौरक्षकों ने आमदनी का एक जरिया भी खत्म कर दिया और सरकार कोई भी कार्रवाई नहीं कर रही है .

आज ग्रामीण इलाकों में  जो लोग परिवार के मुखिया  हैं उनकी उम्र साठ साल के पार है. उन लोगों ने अपने बचपन में १९६४ की वह  भुखमरी भी देखी है जो लगातार सूखे की  वजह से आई थी. किसान लगभग पूरी तरह से बरसात के पानी पर ही निर्भर था.  उन यादों से भी लोग कांप जाते हैं . नरेंद्र मोदी के वायदों के बाद लोगों को उम्मीद थी कि गरीब का बेटा जब प्रधानमंत्री बनेगा तो शायद कुछ ऐसा कर दे जो तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कियाथा. हरित क्रान्ति की शुरुआत कर दी थी. हालांकि उसका श्रेय इंदिरा गांधी ने बटोरा.
दिल्ली आकर जब खेती किसानी के इंचार्ज कुछ महाप्रभुओं से बात की तो उन्होंने लाखों करोड़ों मीट्रिक टन और लाखों हेक्टेयर में  अच्छी फसलों के आंकड़े देकर मुझे संतुष्ट करने की कोशिश की . इन आंकड़ाबाज अफसरों नेताओं को यह बताने की जरूरत है कि आम आदमी की मुसीबतों को आंकड़ों में घेर कर उनके जले पर नमक छिड़कने की संस्कृति से बाज आएं। अकाल या सूखे की हालत में ही खेती का ख्याल न करेंइसे एक सतत प्रक्रिया के रूप में अपनाएं। इस देश का दुर्भाग्य है कि जब फसल खराब होने की वजह से शहरी मध्यवर्ग प्रभावित होने लगता हैतभी इस देश का नेता और पत्रकार जगता है। गांव का किसानजिसकी हर जरूरत खेती से पूरी होती हैवह इन लोगों की प्राथमिकता की सूची में कहीं नहीं आता।
कोई इनसे पूछे कि फसल चौपट हो जाने की वजह से उस गरीब किसान का क्या होगा जिसका सब कुछ तबाह हो चुका है। वह सरकारी मदद भी लेने में संकोच करेगा क्योंकि गांव का गरीब और किसान मांग कर नहीं खाता। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि गांव का गरीबसरकारी लापरवाही के चलते मानसून खराब होने पर भूखों मरता है। आजादी के बाद जो जर्जर कृषिव्यवस्था नए शासकों को मिली थीवह लगभग आदिम काल की थी। 
जवाहरलाल नेहरू ने कृषि को प्राथमिकता नहीं दी . उनको उम्मीद थी कि औद्योगिक विकास के साथ-साथ खेती का विकास भी चलता रहेगा। लेकिन 1962 में जब चीन का हमला हुआ तो उनको एक जबरदस्त झटका लगा। उस साल उत्तर भारत में मौसम अजीब हो गया था। रबी और खरीफ दोनों ही फसलें तबाह हो गईं थी। जवाहर लाल नेहरू को एहसास हो गया था कि कहीं बड़ी गलती हुई है। ताबड़तोड़ मुसीबतों से घिरे मुल्क पर 1965 में पाकिस्तानी जनरलअयूब ने भी हमला कर दिया। युद्ध का समय और खाने की कमी। बहरहाल प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवानजय किसान का नारा दिया और अनाज की बचत के लिए देश की जनता से आवाहन किया कि सभी लोग एक दिन का उपवास रखें। यानी मुसीबत से लडऩे के लिए हौसलों की ज़रूरत पर बल दिया। लेकिन भूख की लड़ाई हौसलों से नहीं लड़ी जाती। जो लोग 60 के दशक में समझने लायक थे उनसे कोई भी बता सकता है कि विदेशों से सहायता में मिले बादामी रंग के बाजरे को निगल पाना कितना मुश्किल होता है। लेकिन भूख सब कुछ करवाती है। अमरीका से पी एल 480 योजना के तहत मंगाये गए गेहूं की रोटियां किस रबड़ की तरह होती थीं .
केंद्र सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को क्या मालूम है कि गांव का गरीब किसान जब अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए क़र्ज़ लेता है  तो कितनी बार मरता हैअपमान के कितने कड़वे घूंट पीता है। इन्हें कुछ नहीं मालूम और न ही आज के तोता रटंत पत्रकारों को जरूरी लगता है कि गांव के किसानों की इस सच्चाई का आईना इन कोल्हू के बैल नेताओं और नौकरशाहों को दिखाएं। गांव के गरीब की इस निराशा और हताशा का ही जवाब था १९६६ में शुरू हुआ खेती को  आधुनिक बनाने का वह ऐतिहासिक कार्य. २०१४ के चुनाव के पहले जब नरेंद्र मोदी ने किसान की आमदनी डबल करने की बात की तो लोगों को लगा कि शायद वैसा ही कुछ हो जाए . लेकिन आज की ज़मीनी सच्चाई यह है कि किसान के लिए सरकारी नीतियों में ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा है.

किसानों की समस्या को समझने वालों ने इस देश में कभी भी सत्ता नहीं संभाली . जब से ईस्ट इण्डिया कंपनी ने भारत पर क़ब्ज़ा किया तब से ही खेती की अनदेखी होती रही है . सत्ताधीशों की सुविधा के अनुसार खेती करने के अवसर हमेशा से ही उपलब्ध कराये जाते रहे हैं . ऐसा नहीं है कि अपने देश में अधिक नक़दी देने वाली फसलों की कमी रही हो. लेकिन उनको भी शासक अपने हित साधन के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं नील, अफीम,रबड़,चाय,पिपरमिंट,गन्ना ,काफी, मसाले आदि ऐसी फसलें हैं जो किसान को सम्पन्न बना सकती थीं लेकिन सरकारों ने ऐसा होने नहीं दिया . नील और अफीम को तो शुद्ध रूप से सरकारी नियंत्रण में ही रखा गया और वहां जमकर शोषण हुआ.महात्मा गांधी का चंपारण आन्दोलन ही नील के किसानों की समस्याओं को दृष्टि में रखकर किया गया . इस तरह के बहुत सारे उदहारण देश भर में हुए हैं जहाँ किसानों की समस्याओं की बुनियाद पर आन्दोलन शुरू हुए लेकिन अंत उनका भी सत्ताधीशों की शक्ति को पुख्ता करने में ही हुआ .
आधुनिक युग में भी भारतीय किसान को अन्नदाता ही माना जा रहा है .किसी भी नेता का भाषण सुन लीजिये उसमें किसान को भगवान् बताने की कोशिश की जायेगी . लेकिन उसकी सम्पन्नता के बारे में कोई भी योजना कहीं नहीं नज़र आयेगी. किसान की दुर्दशा का बुनियादी कारण इसी सोच में है. उसकी पैदावार की कीमत सरकार तय करती है . और जब सरकार की तरफ से  न्यूनतम खरीद मूल्य तय करने की घोषणा की जाती है तो लगता है कि मंत्री जी बहुत बड़ी कृपा कर रहे हैं और किसान को कुछ खैरात में दे रहे हैं . इसके अलावा भी सरकारी नीतियों में भारी कमियाँ हैं . खाद के नाम पर  जो सब्सिडी आती थी वह  सीधे खाद का उत्पादन करने वाली कंपनी के खाते  में जमा हो जाता था और उस से उम्मीद की  जाती थी कि वह किसान को उसका लाभ देगा .लेकिन ऐसा होता नहीं था. वर्तमान सरकार में एक मंत्री जी हैं जो कभी  रासायनिक खाद विभाग के  मंत्री हुआ करते थे . उनके ऊपर आरोप लगा था कि  रासायनिक खाद पर सरकार ने जो भी सब्सिडी बढ़ाई थी उसका पचास प्रतिशत मंत्री ने  नक़द वापस ले  लिया था. जांच की मांग भी हुयी लेकिन मामला रफा दफा हो गया . ऐसे  बहुत सारे मामले हैं जहां सत्ताधीशों ने किसान के नाम पर हेराफेरी की है और किसान को घडियाली आंसू की बोतलें भेजते रहे हैं .
समस्या का हल किसान को अन्नदाता और देश की खाद्य आवश्यकताओं के पूर्तिकर्ता के खांचे से बाहर निकालकर नीतियाँ बनाने की सोच में है .उस पर दया करने की कोई ज़रूरत नहीं है . दुनिया के कई देशों में अन्न की कमी है . वहां विश्व खाद्य संगठन आदि की मदद से अन्न भेजा जाता है. इस काम में अमरीका और  विकसित देशों का पूरी तरह  से कब्ज़ा है . हमें मालूम  है कि दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य कंपनी कारगिल भारत में दूर दराज़ के गावों में जाकर सस्ते दाम पर गेहूं आदि खरीद रही है उस गेहूं को वह उन देशों में भेजती है जहाँ खाने की कमी होती है . कारगिल अमरीकी कंपनी है. सरकार को चाहिए कि किसानों की पैदावार को सीधे विश्व  भर में फैले उपभोक्ता तक पंहुचाने का उपाय करे. ऐसी नीतियाँ बनाई जाएँ जिससे किसान को बेचारा माने जाने वालों को समझ में आये कि किसान बेचारा नहीं होता, अगर जागरूकता हो तो वह अमरीकी किसानों की तरह बहुत सम्पन्नता का जीवन बिता सकता है लेकिन उसके लिए उसकी आत्मसम्मान की भावना को  सही मुकाम पर पंहुचाना होगा, उसको केवल मतदाता ही नहीं देश के विकास का हरावल दस्ता मानना होगा . 

Tuesday, October 3, 2017

न्याय और सुरक्षा मांगती बेटियों को लाठी से क्यों मारा ?


( 28 सितम्बर को लिखा गया लेख. अब वाइस चांसलर ,जी सी त्रिपाठी, "निजी कारण" से छुट्टी पर जाने को  मजबूर हो चुके हैं उर्फ़ औकात में आ गए हैं ) 
शेष नारायण सिंह   

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जो सन्देश आया है वह बहुत ही डरावना है . वहां की घटनाओं  से पुरुष आधिपत्य की  मानसिकता के जो संकेत आये हैं उनकी परतों की व्याख्या करने से जो तस्वीर उभरती है वह बहुत ही खतरनाक है . काशी का सन्देश यह है कि अगर आपने देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में  अपनी  बेटी को पढने के लिए भेजा है तो आपको हमेशा चिंतित रहना चाहिए . यह भी संदेश आया है कि अपनी कमियाँ छुपाने के लिए बीएचयू का कुलपति किसी अन्य बहुत ही आदरणीय विश्वविद्यालय को अपमानित करने की कोशिश  कर सकता है . जब कुल्पति , जी सी त्रिपाठी ने  कहा कि जेएनयू कल्चर की एक मजिस्ट्रेट ने उनको बदनाम करने की कोशिश की तो वे अपनी हीनभावना पर परदा डालने की कोशिश कर रहे थे. उनको मालूम है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढने लडकियों के माता पिता बेटी को वहां दाखिल  करवा कर जब लौटते हैं तो वह जानते हैं कि वे अपनी बेटी को देश की एक बेहतरीन शिक्षा  संस्था में  दाखिल करवा कर आये हैं . जेएनयू  का कैम्पस माँ की गोद की तरह सुरक्षित माना जाता है .  इसलिए बीएचयू के कुलपति जी ने यह  देश को यह सन्देश भी साफ़ साफ़ दे दिया कि वे अपने दिमाग की  गंदगी को ढकने के लिये किसी के पर दरवाज़े कीचड फेंकने में संकोच नहीं करेंगे .

आखिर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना क्या थी . हुआ यह था कि  छात्रावासों में रहने वाली लडकियां विश्वविद्यालय के कुलपति से मांग कर रही थींकि कैम्पस के पुरुष छात्रों और बाहरी तत्वों से लगातार होने वाली छेडछाड की घटनाओं से उनको बचाएं.  मौजूदा संकट की शुरुआत एक घटना से हुयी . किसी मोटरसाइकिल सवार लफंगे ने एक लडकी के साथ अभद्र आचरण किया . वह  लडकी अपनी शिकायत लेकर विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर के पास गयी  . चीफ प्राक्टर और छात्रा के बीच बातचीत का जो विवरण सामने आया है वह हैरतंगेज़ है, सभ्य समाज को परेशान कर देने वाला है . छात्रा ने मीडिया को बताया है कि उस  दुष्टात्मा ने शिकायत सुनने के बाद उस लडकी  से कहा कि अब आप अपने हास्टल जायेंगी कि  रेप होने तक यहीं इंतजार करेंगीं. शूकर पुरुष मानसिकता के हिसाब से भी, यह कार्य निन्दनीय है . इसके बाद वह लडकी वापस आयी ,अपनी सहेलियों से ज़िक्र किया और कोई रास्ता न  देख कर अपने को अनाकर्षक बनाने के काम में जुट गयी . लडकी ने अपना सर मुंडवा लिया . मीडिया को उसने बताया कि उसने ऐसा  इसलिए किया जिससे कि वह बदसूरत लग सके जिससे लफंगों का ध्यान उसकी तरफ न  पड़े. बाद में लड़कियों ने चीफ प्राक्टर के नाम एक अर्जी लिखी और उनके पास कई लडकियां गईं . इस बार भी अपनी दम्भी मानसिकता  का परिचय देते हुए उन अधिकारी ने लड़कियों को अपमानित किया और भगा दिया . यहाँ यह समझ लेना ज़रूरी है कि  प्राक्टर कोई सुरक्षा बलों से अवकाशप्राप्त अधिकारी नहीं होता ,वह वास्तव में एक सीनियर शिक्षक होता है जो सुरक्षातंत्र के लोगों से संपर्क में रहता है और अपने बच्चों के कल्याण के लिए लगातार प्रयास करता रहता  है. यह लडकी जिसको उसने रेप की  धमकी दी थी वह भी उसकी बच्ची ही मानी जाती है. लड़कियों ने जो चिट्ठी लिखी वह बहुत ही साधारण मांग वाली थी. लड़कियों की चिट्ठी में केवल यह गुहार लगाई गयी  थी कि उनको  कैम्पस में आने वाले पुरुषों की छेड़छाड़ से  बचाएं . कोई भी सभ्य पुरुष इसके लिए उन लड़कियों को आश्वस्त कर देता लेकिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर साहब ने उनकी चिट्ठी को नज़रंदाज़ कर दिया .  लडकियां काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय से मिलने  गयीं लेकिन उन्होने मिलने से इनकार कर दिया. लडकियां धरने पर बैठ गईं फिर भी वीसी साहब मिलने से इनकार करते रहे. उसके बाद जो हुआ उसको पूरी दुनिया जानती है. इस सारे प्रकरण में मुख्य धारा के मीडिया के एक वर्ग की प्रवृत्ति बहुत ही अजीब रही . काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में है . वहां  कई राष्ट्रीय अखबारों के संस्करण निकलते हैं अधिकतर ने सही रिपोर्टिंग नहीं की. वैकल्पिक  मीडिया के ज़रिये ख़बरें बाहर आईं और तब  बीएचयू के अधिकारियों को लगा कि मीडिया को मैनेज करने के बावजूद भी अत्याचार की  खबर को दबाया नहीं जा सका .
एक सच्चाई और भी है. . काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में लडकियों को वह सम्मान कभी नहीं मिला को देश के अन्य विश्वविद्यालयों में लड़कियों को मिलता  है लेकिन एक बात देखी गयी थी कि अपनी  उग्र  पुरुषसत्तावादी मानसिकता के बावजूद  बीएचयू में पुरुष छात्र लड़कियों की रक्षा में खड़े होते रहे हैं . पुराने छात्र नेता ,चंचल ने यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़कियों की मर्यादा और खुदमुख्तारी को मुद्दा बनाकर लड़ा था और जीते थे. इस बार ऐसा नहीं  हुआ . बहुत बाद में आम छात्र नेताओं ने मामले  में दखल देना शुरू किया .जब पता लग गया कि केंद्र सरकार की सत्ताधारी पार्टी के सहयोगी कुलपति को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है तब कुलपति की पार्टी से सम्बद्ध छात्र उसके बचाव में आ गए और अन्य छात्र उसके विरोध में मोर्चा सम्भालने में जुट गए. उसके बाद जो हुआ उसको अब सारी दुनिया जानती है. हालांकि मुख्यधारा के अखबार  बहुत बाद तक अपनी मुसीबतों के लिए लड़ रही छात्राओं को उपद्रवी ही बताते रहे लेकिन उनकी बात को कोई भी मान नहीं  रहा था. बीएचयू के महिला महाविद्यालय में पुलिस के हमले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार भी हरकत में आयी और वाराणसी के कमिश्नर को जांच करने को कहा . कमिश्नर नितिन गोकर्ण ने जांच के बाद चीफ सेक्रेटरी को रिपोर्ट दे दी है  जिसमें उन्होंने बवाल के लिए बीएचयू प्रशासन को दोषी ठहराया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीएचयू प्रशासन ने छेड़छाड़ के मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाईन ही समय पर उचित कार्रवाई की। प्राथमिक जांच रिपोर्ट में गंभीर आरोप बीएचयू प्रशासन पर लगे . रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ित छात्राओं की शिकायत  कुलपति त्रिपाठी ने नहीं सुनी. प्राक्टर पहले ही छात्राओं को  टरका चुका था. उसके बाद छेड़खानी से तंग आ चुकी छत्राओं ने धरने का रास्ता अपनाने का फैसला किया . इस जांच के  सामने आने के बाद बीएचयू प्रशासन सक्रिय हुआ. लेकिन उसके पहले तक जो हो चुका था वह किसी भी विश्वविद्यालय के लिए कलंक की बात है . पुलिस की पाशविकता की जो  तस्वीर सामने आयी है वह बहुत ही हृदय विदारक है . अपनी  पुरुषसत्तावादी मानसिकता के लिए कुख्यात उत्तर प्रदेश पुलिस ने बीएचयू  कैम्पस  में बहुत ही गैरजिम्मेदार काम किया. एक तो महिला महाविद्यालय में देर रात को हमला करने जा रही फ़ोर्स में महिला सिपाहियों को शामिल नहीं किया . पुरुष सिपाहियों की फ़ोर्स ने लगभग आधी रात को  लड़कियों के छात्रालय पर हमला किया और महिला प्रोफेसरों को भी नहीं छोड़ा . बीएचयू की एक सहायक प्रोफ़ेसर ने बताया कि ," जब पुलिस लाठियां चला  रही थी तो एक छात्रा ज़मीन पर गिर गयी. मैं उस लडकी को बचाने गयी तो मैं भी पुलिस के हमले का शिकार हो गयी . मैंने उनसे  विनती की कि मैं विश्वविद्यालय की  टीचर हूँ लेकिन वे लोग  लाठियां चलाते ही रहे . उस समय रात के साढे ग्यारह बजे थे " पूरे मामले में  बीएचयू के कुलपति का रुख सबसे गैज़िम्मेदार था . घटना के बाद वे दिल्ली आये और एक  टेलिविज़न ने उनका इंटरव्यू किया . उस मीडिया संपर्क के बाद उनका जो स्वरुप देखा उससे साफ़ समझ में आ गया कि कैम्पस में उन्होंने जो कुछ किया वह तो बहुत कम था . वे अगर अपनी पर उतर आते तो वे और भी  बहुत कुछ कर सकते थे . टेलिविज़न चैनल में कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी  को देखकर लगा ही नहीं कि यह व्यक्ति उसी विश्वविद्यलय का कुलपति है जहाँ कभी कुलपति के रूप में बहुत बड़े विद्वान विराजते थे .पंडित मदन मोहन मालवीय स्वयं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति  रहे. उनके पहले सर सुन्दर लाल और सर पी एस शिवस्वामी अय्यर जैसे महान लोग भी बीएचयू के कुलपति रह चुके थे . मालवीय जी के अट्ठारह साल के कार्यकाल के बाद डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी कुलपति रहे .अमरनाथ झाआचार्य नरेंद्र देव और त्रिगुण सेन जैसी महान लोग काशी हिन्दू  विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रह चुके हैं . जब टेलिविज़न पर मौजूदा कुलपति प्रोफ़ेसर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी का दर्शन हुआ तो समझ में आया कि इतनी ऊंची परम्परा वाले विश्वविद्यालय का क्या हाल हो चुका है . कुलपति ने अपनी ही लड़कियों को पिटवाने के लिए कैम्पस में पुलिस बुला लिया जबकि  भारत छोडो आन्दोलन के दौरान इसी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एस राधाकृष्णन ने बीएचयू के  कैम्पस में अंग्रेजों की पुलिस को दाखिल होने की अनुमति नहीं दी थी. 
बीएचयू की परम्पराओं का पतन १९६७ में शुरू हुआ जब इंदिरा गांधी की सरकार थी . केंद्रीय विश्वविद्यालय था . इंदिरा गांधी में सस्थाओं के प्रति सम्मान की वह  भावना नहीं थी जो पंडित जवाहरलाल नेहरू में थी. नतीजा यह हुआ कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपति भी सिफारशी होने लगे . उसी क्रम में उन्होंने ए सी जोशी को कुलपति बनाया और फिर जो ढलान शुरू हुआ वह आजतक जारी है . ए सी जोशी के कार्यकाल में ही बीएचयू का  कुलपति अफसर माना जाने लगा ,वरना उसके पहले वह परिवार का सही अर्थों में मुखिया होता था. जोशी जी के  कार्यकाल  में ही बीएचयू कैम्पस में पुलिस ने छात्रावासों के अन्दर घुसकर लड़कों की खूब पिटाई की थी. उसी के बाद  छात्र आन्दोलन से निपटने के लिए विश्वविद्यालय को अनिश्चित काल के लिए बंद करने की परम्परा शुरू हुई. और वहां से चलकर आज की हालात तक बात पंहुची है .
    बताते हैं कि इसी नवम्बर में  मौजूदा कुलपति जी सी त्रिपाठी का कार्यकाल पूरा हो रहा है . वे एक टर्म और चाहते हैं . दिल्ली दरबार में फेरी भी लगा रहे हैं . आर एस एस का समर्थन उनको पहले से ही है .लेकिन लगता  है कि इस काण्ड के बाद उनकी पकड़ आर एस एस पर कमज़ोर  पड़ेगी. एक जानकार ने बताया कि जब वे अपनी मंशा लेकर शिक्षा मंत्री प्रकाश जावडेकर के सामने पेश हुए थे तो उन्होंने साफ बता दिया था कि आप अपना कार्यकाल सम्मान पूर्वक बिताकर चले जाइए अब वहां किसी विद्वान व्यक्ति को कुलपति बनाया जाएगा . हालांकि अब यह लगने लगा है कि कुलपति जी सी  त्रिपाठी को अपना कार्यकाल पूरा करना भी भारी पड़ेगा

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना के बाद  हवा में बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं . एक सवाल यह है कि अगर उच्च शिक्षा के केन्द्रों में महिलाओं की इज्ज़त की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती तो हम बेटी बचाओ , बेटी पढाओ का नारा क्यों लगाते हैं . . बीएचयू के आन्दोलन में लड़कियों का नारा था, " न्याय, सुरक्षा आज़ादी, मांगे आधी आबादी ." इसमें ऐसी कौन सी बात थी जिससे देश की शान्ति को ख़तरा था. या जैसा कि बाद में टेलिविज़न पर कुलपति त्रिपाठी ने कहा  कि प्रधानमंत्री की सभा में अडंगा लगाने के लिए यह आन्दोलन किया गया था. सच्ची बात यह है कि अगर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने सही समय पर इस समस्या का हल निकाल दिया होता तो उनके फैसले से प्रधानमंत्री की वाहवाही ही होती . उन्होंने यह भी  कहा कि कैम्पस में पेट्रोल बम चल रहे थे .  उनकी इस बात को न तो उत्तर प्रदेश  सरकार ने गंभीरता से लिया और न ही केंद्र  सरकार ने .
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का सबक यह है कि केंद्र सरकार को चाहिए कि चेलों को पदासीन करने के काम से बाज आये और विश्वविद्यालयों को विद्वत्ता और  शोध का केंद्र बनाने का प्रयास करे

Saturday, September 30, 2017

बूथ पर तैनात सरकारी कर्मचारी भी चुनाव जितवा सकते हैं



शेष नारायण सिंह


नई दिल्ली, २९ सितम्बर .भारत में चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले कारणों में एक नया आयाम जुड़ गया है . एक शोधपत्र में यह नतीजा निकला है कि बूथों पर चुनाव संपन्न करने वाले पोलिंग अधिकारी और पीठासीन अधिकारी भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करते हैं. ज़मीनी आंकड़ों को इकठ्ठा करके  गंभीर मंथन के बाद यह बात सामने आयी है कि  मतदान करवाने  वाले अधिकारी कई बार चुनावे नतीजों को इस हद तक प्रभावित करते हैं कि नतीजे पलट भी सकते हैं . कुछ मामलों में तो बूथ अधिकारी की पक्षधरता मत प्रतिशत में सात प्रतिशत तक का बदलाव का कारण बनी है .

ब्राउन विश्वविद्यालय के डॉ युसफ नेगर्स ने अपनी नई खोज में यह  सिद्ध करने का प्रयास किया है कि हरेक बूथ पर काम करने वाले सरकारी अधिकारी भी चुनाव को प्रभावित करते सकते हैं. “ Enfranchising your own ? Experimental Evidence on Bureaucrat Diversity and Election Bias in India “  नाम का उनका शोधपत्र उपलब्ध है . युसूफ नेगर्स आजकल ब्राउन विश्वविद्यालय में हैं . उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय  से पाब्लिक पालिसी में पी एच डी किया है.लन्दन स्कूल आफ इकनामिक्स के छात्र रहे डॉ नेगर्स को राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अधिकारी विद्वान् माना जाता है . उनके यह नतीजे आने वाले समय में भारत में चुनाव करवाने वाली संस्थाओं का ध्यान निश्चित रूप से आकर्षित करने वाले हैं .
शोध का नतीजा  है कि अपनी बिरादरी या  धर्म के   लोगों के पक्ष में बूथ स्तर के अधिकारी मतदान के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं.इससे चुनाव की  निष्पक्षता प्रभावित  होती है. इस बात को इस पर्चे में सिद्ध कर दिया गया है.  अगर पोलिंग पार्टी में एक जाति विशेष के ही अधिकारी हैं तो उस जाति के उम्मीदवार या पार्टी को ज्यादा वोट मिलने की संभावना बढ़ जाती है .अगर चुनाव धार्मिक ध्रुवीकरण के माहौल में संपन्न हो  रहा है तो जो पार्टी अधिसंख्य आबादी वालों की प्रतिनिधि के रूप में प्रचारित हुयी रहती  है , उसका फायदा होता है . ऐसे माहौल में आम तौर पर अल्पसंख्यक मतदाताओं की पहचान  आदि में काफी सख्ती बरती जाती है . कई बार उनको लौटा भी दिया जाता है लेकिन अगर पोलिंग पार्टी में कोई भी अधिकारी या कर्मचारी अल्पसंख्यक समुदाय का होता है तो यह धांधली  नहीं हो पाती . कुल मिलाकर इस तरह के आचरण से चुनावी नतीजे प्रभावित होते हैं . भारत में चुनाव प्रक्रिया, उसके नतीजों आदि के राजनीति शास्त्र पर दुनिया भर में बहुत शोध हुए  हैं लेकिन इस विषय पर यह पहला काम है . पर्चे में इस बात को भी  रेखांकित किया गया है कि भारत में चुनाव अधिकारियों की निष्पक्षता पर अब ऐलानियाँ सवाल उठाये जा रहे हैं . पूरी दुनिया के देशों के चुनावी आचरण पर सर्वे करने वाली  संस्था, वर्ल्ड वैल्यूज़ सर्वे के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार सर्वे किये गए कुल देशों के तीन चौथाई देशों में  करीब २५ प्रतिशत लोग मानते हैं कि  चुनाव अधिकारी आम  तौर पर बेईमानी करते हैं . और यह भी कि आधी दुनिया में बूथ पर होने वाली हिंसा राजनीतिक चिंता का विषय है. विकासशील देशों में यह वारदातें ज्यादा होती हैं . लेकिन यह बीमारी अमरीका  जैसे विकसित देशों में भी है . २०१४ के एक सर्वे के अनुसार अमरीका में भी भरोसेमंद , प्रशिक्षित और  निष्पक्ष चुनाव कार्मचारियों की भारी कमी है .शोधपत्र में भारतीय चुनाव प्रक्रिया को तकनीकी रूप से उच्च  श्रेणी की बताया गया है .लेकिन फिर भी अधिकारियों के पूर्वाग्रह जनता के मत को प्रभावित कर सकते हैं और करते हैं  .इस गड़बड़ी को दूर करने का तरीका यह हो सकता है कि हर बूथ पर जाने वाली पोलिंग पार्टी में एक ही जाति या  धर्म के लोगों को न रख कर बूथों पर ऐसे कर्मचारी तैनात किये जाएँ जिनकी जाति और धर्म में वैभिन्य हो.

Friday, September 29, 2017

भूखे बेघर दुधमुंहे बच्चे आतंकवादी नहीं होते , सरकार


शेष नारायण सिंह

म्यांमार में अपना घरबार छोड़कर भाग रहे रोहिंग्या मुसलमानों की दर्दभरी कहानी पूरी  दुनिया में चर्चा  का विषय है .  अरकान में बसे इन लोगों की नागरिकता छीन ली गयी है . यह देशविहीन लोग हैं . अमनेस्टी इंटरनैशनल की रिपोर्ट है कि भागते हुए   रोहिंग्या मुसलमानों के  घरों में  अभी भी ( २४ सितम्बर,१७  )आग लगी  हुई है . जो बुझ गयी है उनमें से धुंआ निकल रहा है . आसमान से ली गई तस्वीरों में यह तबाही का मंज़र साफ़   देखा जा सकता  है . अमनेस्टी इंटरनैशनल की निदेशक तिराना हसन का कहना है कि जो सबूत मिले हैं वे म्यांमार  की शासक आंग सां सू ची की झूठ को बेनकाब कर  देते हैं . ऐसा लगता है कि म्यांमार के अधिकारी  यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जो लोग भाग कर देश छोड़कर जाने को मजबूर किये जा रहे  हैं अगर वे कभी अंतर्राष्ट्रीय दबाव  के चलते वापस भी आयें तो उनको अपने घर की जगह पर  कुछ न मिले .. उनको उनके घरों की राख हे  नज़र आये .
म्यांमार में तबाह हो रहे लोग पड़ोस के देशों में शरण लेने को मजबूर हैं . दिनरात चल कर बंगलादेश , भारत , मलयेशिया आदि देशों में पंहुच रहे लोगों को पता ही नहीं है कि कहाँ जा रहे हैं . उनके साथ बीमार लोग हैं , भूख से तड़प रहे बच्चे हैं , चल फिर सकने  से  मजबूर बूढ़े हैं , गर्भवती महिलायें हैं और दुधमुंहे   नवजात शिशु हैं . बड़ी संख्या में  भारत में भी म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थी पंहुच रहे  हैं. मौत से भाग कर नदी, नाले, पहाड़ , जंगल के  रास्ते अनिश्चय की दिशा में  भाग रहे लोगों को कहीं जाने का ठिकाना  नहीं है .
बड़ी संख्या में लोग भारत भी आ रहे  हैं.  हमारी सरकार ने साफ़ कर दिया है कि इन लोगों को अपने देश में ठिकाना  नहीं दिया जाएगा.  भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आधिकारिक बयान दे दिया है और कहा  है कि म्यांमार के अराकान  प्रांत से आ रहे लोग शरणार्थी  नहीं  हैं , वे गैरकानूनी तरीके से आ रहे लोग हैं .  उनको देश की सीमा के  अन्दर नहीं आने दिया जाएगा . म्यांमार से लगे राज्यों की सीमा चौकसी बढ़ा दी गयी  है .भारत सरकार के रुख से एकदम साफ़  है कि रोहिंग्या शरणार्थी भारत में नहीं आ सकते  और जो पहले से आ चुके हैं ,उनको देश से निकाल दिया जाएगा . जो  हालात अराकान में है उसमें वे अपने घर तो नहीं जा सकते , समझ में नहीं आता कि उनको भेजा कहाँ जाएगा .
अपनी जान की हिफाज़त की मांग करते हुए कुछ  रोहिंग्या शरणार्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई  है.  अपने हलफनामे में  दो रोहिंग्या लोगों ने कहा है कि अगर  उनके बीच से कोई बदमाशी कर रहा हो तो उसको तो देश से निकाल  दिया जाए या सज़ा दी जाए लेकिन  जो लोग मौत से भाग कर यहाँ शरण लेकर अपनी जान बचा रहे हैं उनको वापस न भेजा  जाए क्योंकि  वहां तो निश्चित मौत उन लोगों का इंतज़ार कर रही है.  जिन दो लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी है वे करीब पांच-छः साल से भारत में शरण लिए हुए  हैं.  उन्होंने  बाहलफ बयान दिया है कि उन दोनों के खिलाफ कोई भी मामला कहीं भी दर्ज नहीं है , यहाँ तक  उनकी जानकारी में किसी भी  रोहिंग्या के खिलाफ कोई मामला नहीं है. उनकी वजह से  राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई ख़तरा नहीं है . फरियादियों ने कहा है कि पता लगा है कि सरकार ऐसे चालीस हज़ार रोहिंग्या शरणार्थियों का पता लगाएगी और उनको  देश से निकाल देगी . उन्होंने प्रार्थना की है कि हालांकि भारत ने शरणार्थियों के अंतर राष्ट्रीय कन्वेंशन पर दस्तखत नहीं किया है लेकिन मुसीबतज़दा लोगों की  हमेशा  ही मदद करता रहा है . प्रार्थना की गयी है कि वे भारत में रहने या स्वतंत्र रूप से कहीं  भी आने जाने के अधिकार की मांग नहीं कर रहे हैं .  उनको अपनी हिफाज़त में केवल  तब तक रहने दिया जाय जब तक कि उनके देश में  उनकी जान  पर मौत का साया मंडरा रहा है . उन्होंने कहा कि भारत में  उनको किसी तरह का  अधिकार नहीं चाहिए .  रोहिंग्या फरियादियों ने अपील की है कि जिस तरह  से भारत में तिब्बत और श्रीलंका से आये शरणार्थियों की जान की हिफाज़त की व्यवस्था है , वही उनको भी उपलब्ध करा दी जाए.  दया की अपील को संविधान की सीमा में रखने की बात भी की गयी है .    याचिका में कहा गया है कि रोहिंग्या अपना वतन  छोड़कर भाग रहे हैं क्योंकि म्यांमार में उनको सिलसिलेवार तरीके से परेशान किया जा रहा है . उनकी मुसीबत का कारण उनका धर्म और उनकी  जातीय पहचान है . इसलिए अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत वे शरणार्थी हैं और  वे अपने देश वापस नहीं जा सकते क्योंकि वहां उनको फिर वही यातना सहनी पडेगी.  सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है और अब अगली सुनवाई ३ अक्टूबर   को होगी.
 केंद्र सरकार के सख्त   रुख के कारण रोहिंग्या लोगों का अब भारत में रह पाना मुश्किल है, सुप्रीम कोर्ट से उनको कुछ उम्मीद है. लेकिन देश में उनको लेकर  बड़े पैमाने पर सियासत शुरू हो गयी है . किसी कोने में  पड़े हुए कुछ मौलाना मैदान में आ गए हैं जो अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में लग गए हैं . एक मौलाना ने कोलकता की एक मीटिंग में कह  दिया  कर्बला में हम बहत्तर थे लेकिन हमने लाखों का जनाज़ा निकाल दिया . अब कोई इस मौलाना से कहे कि भाई जिस अराकान में इन मुसलमानों   के ऊपर हर तरह की मुसीबत टूट पडी है आप  वहां क्यों नहीं जाते , वहां जाइए और वहां का जो भी यजीद हो उसको खत्म कर के इन गरीब लोगों की जान  बचाइये ., तो बगलें झाँकने लगेंगे . लेकिन यहाँ भारत में जहां हर  तरह से  तबाह रोहिंग्या ने शरण ले  रखी है उनके खिलाफ माहौल बनाकर आपको क्या  मिलेगा . लेकिन वे अपनी हरकत से  बाज़ नहीं  आयेंगें . इन्हीं गैरजिम्मेदार मौलाना साहिबान के मेहरबानी से  देश में चारों तरह सक्रिय हिंदुत्व  के अलमबरदारों को हर मुसलमान के खिलाफ लाठी भांजने का  बहाना मिल जाता  है.   रोहिंग्या के भारत में  रहने के मुद्दे पर टेलिविज़न पर हो रही एक बहस में मैने मन बनाया था कि रोहिंग्या मुसलमानों की मुसीबतों को सही संदर्भ में देश के सामने रखने की कोशिश की जायेगी लेकिन गैरजिम्मेदार के किस्म के लोगों के बयानात शुरू हो गए और सारी बहस रास्ते से भटक गयी . भारत की मौजूदा  सत्ताधारी  पार्टी की तो हमेशा   ही  कोशिश रहती है कि जहाँ भी संभव हो और जहां तक बस चले माले को हिन्दू-मुस्लिम कर देना उनके वोटों के लिहाज़ से सही रहेगा ,इसलिए उनके प्रवक्ता इस तरह की बात हर हाल में करना चाहते  हैं. जाने अनजाने पढ़े लिखे  मुसलमान भी उसी पिच पर बात करने लगते हैं . समझ में नहीं आता  कि एक मुसीबतज़दा समुदाय के प्रति समाज का एक बड़ा हिस्सा इतना निर्दयी क्यों  हो रहा है . रोहिंग्या दुनिया के सबसे ज्यादा खस्ताहाल  लोग हैं .
म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान   सदियों से बर्मा के अरकान प्रदेश में रह रहे हैं लेकिन १९८२ में बर्मा की फौजी हुकूमत ने उनकी नागरिकता छीन ली और ऐलान कर दिया कि वे  बर्मा के नागरिक नहीं हैं .  बर्मा में करीब १३५ जातीय समूहों को सरकारी मान्यता मिली हुयी  है लेकिन रोहिंग्या को उस  श्रेणी में नहीं रखा गया है . इसके पहले जब बर्मा में  लोकतंत्र शासन था तो उनकी इतनी दुर्दशा नहीं थी . बर्मा में करीब सवा सौ साल  ( १८२४ - १९४८ ) अंग्रेज़ी राज रहा था , उस दौर में  वहां बड़ी संख्या में भारत से मजदूर गए थे .  अंग्रेजों ने बर्मा को भारत के  एक राज्य के रूप में रखा था इसलिए इन लोगों को उस समय विदेशी नहीं माना गया  था, उनका आना  जाना  अपने  ही देश में  आने जाने जैसा था .  लेकिन इन लोगों के वहां जाकर काम करने और बसने को वहां के स्थानीय लोगों ने स्वीकार नहीं किया था .आज म्यांमार के शासक उसी  मुकामी सोच के तहत  इन लोगों को अपने देश का नागरिक नहीं मानते .म्यांमार की हुकूमत  इन लोगों  को अभी भी  रोहिंग्या नहीं मानती , वे इनको बंगाली घुसपैठिया  ही बताते हैं .
१९४८ में म्यांमार ( बर्मा ) की आज़ादी के बाद रोहिंग्या को कुछ दिन सम्मान मिला .  इस समुदाय के कुछ लोग संसद  के सदस्य  भी हुए , सरकार में भी शामिल हुए लेकिन १९६२ में  फौजी हुकूमत की स्थापना के बाद सब कुछ बदल गया .  कई पीढ़ियों से यहाँ रह रहे लोगों को भी विदेशी घोषित कर दिया गया . नतीजा यह हुआ कि उनको नौकरी आदि मिलना बंद हो गया . रोहिंग्या म्यांमार के चुनावों में वोट नहीं दे सकते .
मौजूदा मुसीबत की शुरुआत अक्टूबर २०१६ में शुरू  हुयी जब रोहिंग्या मुसलमानों की  नुमाइंदगी  का दावा करने वाले  और अपने को अरकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी का सदस्य बताने वाले कुछ लोगों ने अगस्त के महीने में म्यांमार की बार्डर पुलिस के ९ कर्माचारियों को मार डाला . उसके बाद म्यांमार की सेना की टुकड़ियां अरकान के गाँवों में घुसने लगीं और लोगों को प्रताड़ित करने लगीं . सैनिकों ने लोगों को क़त्ल किया, रेप किया और घर जलाए . हालांकि यह सब काम म्यांमार की सेना २०१३ से ही शुरू कर चुकी थी लेकिन अक्टूबर २०१६ में उनको  बड़ा बहाना मिल गया . यह भी सच है कि रोहिंग्या समुदाय में कुछ लोगों ने हथियार उठा लिया है लेकिन सेना उनको तो पकड़ नहीं पाई  , अलबत्ता गांवों में रह रहे निहत्थे मुसलमान मर्दों को  मार डालने का सिलसिला लगातार चलता  रहा.रोहिंग्या की मुसीबत में जो इंसान  सबसे घटिया नज़र आ रहा है उसका नाम  है म्यांमार की स्टेट चांसलर आंग  सां सू ची. वे  रोहिंग्या की समस्याओं पर कोई बात करने को तैयार नहीं हैं . वे इन लोगों को आतंकवादी कहती  हैं .यह  बेशर्मी की हद है  कि दुनिया भर में  पनाह मांग रहे गरीब, भूखे ,  बूढ़े बच्चे , औरतें उनकी नज़र में आतंकवादी हैं . उनको याद रखना चाहिए कि एक समय था जब जब आंग सां सू ची भी अपने वतन के  बाहर ठोकर खा रही थीं और भारत समेत पूरी दुनिया उनकी और उनके लोगों की भलाई की बात करती थी . तब म्यांमार की फौजी हुकूमत उनको आतंकवादियों का नेता कहती थी .  अगर उस वक़्त  दुनिया ने  उनको भी वैसे ही ठुकराया होता जैसे वे अनाथ रोहिंग्या  म्यांमार के निवासियों को ठुकरा रही हैं तो वे आज कहाँ होतीं.  इस सारी  मुसीबत में बंगलादेश की  प्रधानमंत्री शेख  हसीना एक  महान नेता के रूप में पहचानी जा रही हैं और शरणार्थियों को  संभाल रही हैं. भारत के प्रधानमंत्री के पास भी  मौक़ा है कि वे दुनिया के बड़े  नेता के रूप में अपने को स्थापित कर लें लेकिन अभी तक भारत सरकार का रुख मानवता के बहुत बड़े पक्षधर के रूप में नहीं आया है .आगे शायद हालात कुछ  बदलें.

Wednesday, September 27, 2017

डॉ एस के सरीन मेरे लिए किसी फ़रिश्ते से कम नहीं .



शेष नारायण सिंह



२७ सितम्बर २०१६  के दिन मेरे  डाक्टर  ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया था . मेरे लिए डॉ सरीन फ़रिश्ता  हैं . २८ दिन से मेरा बुखार उतरा नहीं था. मैं ११ सितम्बर को वसंत कुञ्ज,नई दिल्ली के आई एल बी एस ( ILBS) अस्पताल में दाखिल हुआ था . जब मैं उस अस्पताल  में गया था तो मेरी हालत बहुत ही खराब  थी . बाकी तो सब ठीक हो गया लेकिन बुखार नहीं उतर रहा  था. कैंसर , टीबी, आदि भयानक बीमारियों के टेस्ट हो गए थे , सब कुछ  रूल आउट हो गया था लेकिन बुखार? डॉ एस के सरीन  इलाज में नई नई खोज के लिए दुनिया  भर में विख्यात हैं  .गैस्ट्रो इंटाइटिस का सबसे सही इलाज उनके नाम पर रजिस्टर्ड है.  दुनिया के कई  अस्पतालों में ' सरीन प्रोटोकल ' से ही इस बीमारी का इलाज किया जाता  है .   मेरे सैकड़ों टेस्ट हो चुके थे लेकिन बुखार का कारण पता नहीं लग रहा था. डॉ सरीन ने इम्पिरिकल आधार पर नई दवा तजवीजी और इलाज शुरू कर दिया  . तीन दिन के अन्दर बुखार खत्म . इसलिए २७  सितम्बर २०१६ को मैं अपने पुनर्जीवन की शुरुआत मानता हूँ . पांच अक्टूबर २०१६ के दिन जब मुझे अस्पताल से  छुट्टी मिली तो मेरे  डाक्टर ने कहा था कि " अब आप जाइए फिजियोथिरैपी होगी और आप चलना फिरना शुरू कर देंगें . बस एक बात का ध्यान रखना --- "अगर बुखार हो या उल्टी आये तो बिना किसी से  पूछे सीधे अस्पताल आ जाइएगा, मुझे या किसी और से संपर्क करने की कोशिश भी मत करना . सिस्टम अपना काम करेगा . मुझे  तुरंत पता लग जाएगा ."  ऐसी नौबत नहीं आयी , फ़रिश्ते का हाथ जो मेरे ऊपर था . आज एक साल बाद जब मेरे दोस्त कहते हैं कि अब आप पहले से भी ज्यादा स्वस्थ लग रहे हैं तो डॉ एस के सरीन एक सम्मान में सर झुक जाता  है.  डॉ सरीन मेडिकल एथिक्स बड़े साधक हैं .अपने देश में अगर इसी तरह के मेडिकल एथिक्स के बहुत सारे साधक हर अस्पताल में हों तो अपने देश की  स्वास्थ्य व्यवस्था में क्रान्ति आ सकती  है. सितम्बर २०१६ के बाद की अपनी ज़िंदगी को मैं डॉ सरीन की तपस्या का प्रसाद मानता हूँ और इसको सबके कल्याण के लिए समर्पित कर चुका हूँ .