Tuesday, October 3, 2017

न्याय और सुरक्षा मांगती बेटियों को लाठी से क्यों मारा ?


( 28 सितम्बर को लिखा गया लेख. अब वाइस चांसलर ,जी सी त्रिपाठी, "निजी कारण" से छुट्टी पर जाने को  मजबूर हो चुके हैं उर्फ़ औकात में आ गए हैं ) 
शेष नारायण सिंह   

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जो सन्देश आया है वह बहुत ही डरावना है . वहां की घटनाओं  से पुरुष आधिपत्य की  मानसिकता के जो संकेत आये हैं उनकी परतों की व्याख्या करने से जो तस्वीर उभरती है वह बहुत ही खतरनाक है . काशी का सन्देश यह है कि अगर आपने देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में  अपनी  बेटी को पढने के लिए भेजा है तो आपको हमेशा चिंतित रहना चाहिए . यह भी संदेश आया है कि अपनी कमियाँ छुपाने के लिए बीएचयू का कुलपति किसी अन्य बहुत ही आदरणीय विश्वविद्यालय को अपमानित करने की कोशिश  कर सकता है . जब कुल्पति , जी सी त्रिपाठी ने  कहा कि जेएनयू कल्चर की एक मजिस्ट्रेट ने उनको बदनाम करने की कोशिश की तो वे अपनी हीनभावना पर परदा डालने की कोशिश कर रहे थे. उनको मालूम है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढने लडकियों के माता पिता बेटी को वहां दाखिल  करवा कर जब लौटते हैं तो वह जानते हैं कि वे अपनी बेटी को देश की एक बेहतरीन शिक्षा  संस्था में  दाखिल करवा कर आये हैं . जेएनयू  का कैम्पस माँ की गोद की तरह सुरक्षित माना जाता है .  इसलिए बीएचयू के कुलपति जी ने यह  देश को यह सन्देश भी साफ़ साफ़ दे दिया कि वे अपने दिमाग की  गंदगी को ढकने के लिये किसी के पर दरवाज़े कीचड फेंकने में संकोच नहीं करेंगे .

आखिर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना क्या थी . हुआ यह था कि  छात्रावासों में रहने वाली लडकियां विश्वविद्यालय के कुलपति से मांग कर रही थींकि कैम्पस के पुरुष छात्रों और बाहरी तत्वों से लगातार होने वाली छेडछाड की घटनाओं से उनको बचाएं.  मौजूदा संकट की शुरुआत एक घटना से हुयी . किसी मोटरसाइकिल सवार लफंगे ने एक लडकी के साथ अभद्र आचरण किया . वह  लडकी अपनी शिकायत लेकर विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर के पास गयी  . चीफ प्राक्टर और छात्रा के बीच बातचीत का जो विवरण सामने आया है वह हैरतंगेज़ है, सभ्य समाज को परेशान कर देने वाला है . छात्रा ने मीडिया को बताया है कि उस  दुष्टात्मा ने शिकायत सुनने के बाद उस लडकी  से कहा कि अब आप अपने हास्टल जायेंगी कि  रेप होने तक यहीं इंतजार करेंगीं. शूकर पुरुष मानसिकता के हिसाब से भी, यह कार्य निन्दनीय है . इसके बाद वह लडकी वापस आयी ,अपनी सहेलियों से ज़िक्र किया और कोई रास्ता न  देख कर अपने को अनाकर्षक बनाने के काम में जुट गयी . लडकी ने अपना सर मुंडवा लिया . मीडिया को उसने बताया कि उसने ऐसा  इसलिए किया जिससे कि वह बदसूरत लग सके जिससे लफंगों का ध्यान उसकी तरफ न  पड़े. बाद में लड़कियों ने चीफ प्राक्टर के नाम एक अर्जी लिखी और उनके पास कई लडकियां गईं . इस बार भी अपनी दम्भी मानसिकता  का परिचय देते हुए उन अधिकारी ने लड़कियों को अपमानित किया और भगा दिया . यहाँ यह समझ लेना ज़रूरी है कि  प्राक्टर कोई सुरक्षा बलों से अवकाशप्राप्त अधिकारी नहीं होता ,वह वास्तव में एक सीनियर शिक्षक होता है जो सुरक्षातंत्र के लोगों से संपर्क में रहता है और अपने बच्चों के कल्याण के लिए लगातार प्रयास करता रहता  है. यह लडकी जिसको उसने रेप की  धमकी दी थी वह भी उसकी बच्ची ही मानी जाती है. लड़कियों ने जो चिट्ठी लिखी वह बहुत ही साधारण मांग वाली थी. लड़कियों की चिट्ठी में केवल यह गुहार लगाई गयी  थी कि उनको  कैम्पस में आने वाले पुरुषों की छेड़छाड़ से  बचाएं . कोई भी सभ्य पुरुष इसके लिए उन लड़कियों को आश्वस्त कर देता लेकिन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के चीफ प्राक्टर साहब ने उनकी चिट्ठी को नज़रंदाज़ कर दिया .  लडकियां काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय से मिलने  गयीं लेकिन उन्होने मिलने से इनकार कर दिया. लडकियां धरने पर बैठ गईं फिर भी वीसी साहब मिलने से इनकार करते रहे. उसके बाद जो हुआ उसको पूरी दुनिया जानती है. इस सारे प्रकरण में मुख्य धारा के मीडिया के एक वर्ग की प्रवृत्ति बहुत ही अजीब रही . काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में है . वहां  कई राष्ट्रीय अखबारों के संस्करण निकलते हैं अधिकतर ने सही रिपोर्टिंग नहीं की. वैकल्पिक  मीडिया के ज़रिये ख़बरें बाहर आईं और तब  बीएचयू के अधिकारियों को लगा कि मीडिया को मैनेज करने के बावजूद भी अत्याचार की  खबर को दबाया नहीं जा सका .
एक सच्चाई और भी है. . काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में लडकियों को वह सम्मान कभी नहीं मिला को देश के अन्य विश्वविद्यालयों में लड़कियों को मिलता  है लेकिन एक बात देखी गयी थी कि अपनी  उग्र  पुरुषसत्तावादी मानसिकता के बावजूद  बीएचयू में पुरुष छात्र लड़कियों की रक्षा में खड़े होते रहे हैं . पुराने छात्र नेता ,चंचल ने यूनियन के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़कियों की मर्यादा और खुदमुख्तारी को मुद्दा बनाकर लड़ा था और जीते थे. इस बार ऐसा नहीं  हुआ . बहुत बाद में आम छात्र नेताओं ने मामले  में दखल देना शुरू किया .जब पता लग गया कि केंद्र सरकार की सत्ताधारी पार्टी के सहयोगी कुलपति को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है तब कुलपति की पार्टी से सम्बद्ध छात्र उसके बचाव में आ गए और अन्य छात्र उसके विरोध में मोर्चा सम्भालने में जुट गए. उसके बाद जो हुआ उसको अब सारी दुनिया जानती है. हालांकि मुख्यधारा के अखबार  बहुत बाद तक अपनी मुसीबतों के लिए लड़ रही छात्राओं को उपद्रवी ही बताते रहे लेकिन उनकी बात को कोई भी मान नहीं  रहा था. बीएचयू के महिला महाविद्यालय में पुलिस के हमले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार भी हरकत में आयी और वाराणसी के कमिश्नर को जांच करने को कहा . कमिश्नर नितिन गोकर्ण ने जांच के बाद चीफ सेक्रेटरी को रिपोर्ट दे दी है  जिसमें उन्होंने बवाल के लिए बीएचयू प्रशासन को दोषी ठहराया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बीएचयू प्रशासन ने छेड़छाड़ के मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाईन ही समय पर उचित कार्रवाई की। प्राथमिक जांच रिपोर्ट में गंभीर आरोप बीएचयू प्रशासन पर लगे . रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ित छात्राओं की शिकायत  कुलपति त्रिपाठी ने नहीं सुनी. प्राक्टर पहले ही छात्राओं को  टरका चुका था. उसके बाद छेड़खानी से तंग आ चुकी छत्राओं ने धरने का रास्ता अपनाने का फैसला किया . इस जांच के  सामने आने के बाद बीएचयू प्रशासन सक्रिय हुआ. लेकिन उसके पहले तक जो हो चुका था वह किसी भी विश्वविद्यालय के लिए कलंक की बात है . पुलिस की पाशविकता की जो  तस्वीर सामने आयी है वह बहुत ही हृदय विदारक है . अपनी  पुरुषसत्तावादी मानसिकता के लिए कुख्यात उत्तर प्रदेश पुलिस ने बीएचयू  कैम्पस  में बहुत ही गैरजिम्मेदार काम किया. एक तो महिला महाविद्यालय में देर रात को हमला करने जा रही फ़ोर्स में महिला सिपाहियों को शामिल नहीं किया . पुरुष सिपाहियों की फ़ोर्स ने लगभग आधी रात को  लड़कियों के छात्रालय पर हमला किया और महिला प्रोफेसरों को भी नहीं छोड़ा . बीएचयू की एक सहायक प्रोफ़ेसर ने बताया कि ," जब पुलिस लाठियां चला  रही थी तो एक छात्रा ज़मीन पर गिर गयी. मैं उस लडकी को बचाने गयी तो मैं भी पुलिस के हमले का शिकार हो गयी . मैंने उनसे  विनती की कि मैं विश्वविद्यालय की  टीचर हूँ लेकिन वे लोग  लाठियां चलाते ही रहे . उस समय रात के साढे ग्यारह बजे थे " पूरे मामले में  बीएचयू के कुलपति का रुख सबसे गैज़िम्मेदार था . घटना के बाद वे दिल्ली आये और एक  टेलिविज़न ने उनका इंटरव्यू किया . उस मीडिया संपर्क के बाद उनका जो स्वरुप देखा उससे साफ़ समझ में आ गया कि कैम्पस में उन्होंने जो कुछ किया वह तो बहुत कम था . वे अगर अपनी पर उतर आते तो वे और भी  बहुत कुछ कर सकते थे . टेलिविज़न चैनल में कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी  को देखकर लगा ही नहीं कि यह व्यक्ति उसी विश्वविद्यलय का कुलपति है जहाँ कभी कुलपति के रूप में बहुत बड़े विद्वान विराजते थे .पंडित मदन मोहन मालवीय स्वयं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति  रहे. उनके पहले सर सुन्दर लाल और सर पी एस शिवस्वामी अय्यर जैसे महान लोग भी बीएचयू के कुलपति रह चुके थे . मालवीय जी के अट्ठारह साल के कार्यकाल के बाद डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी कुलपति रहे .अमरनाथ झाआचार्य नरेंद्र देव और त्रिगुण सेन जैसी महान लोग काशी हिन्दू  विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रह चुके हैं . जब टेलिविज़न पर मौजूदा कुलपति प्रोफ़ेसर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी का दर्शन हुआ तो समझ में आया कि इतनी ऊंची परम्परा वाले विश्वविद्यालय का क्या हाल हो चुका है . कुलपति ने अपनी ही लड़कियों को पिटवाने के लिए कैम्पस में पुलिस बुला लिया जबकि  भारत छोडो आन्दोलन के दौरान इसी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एस राधाकृष्णन ने बीएचयू के  कैम्पस में अंग्रेजों की पुलिस को दाखिल होने की अनुमति नहीं दी थी. 
बीएचयू की परम्पराओं का पतन १९६७ में शुरू हुआ जब इंदिरा गांधी की सरकार थी . केंद्रीय विश्वविद्यालय था . इंदिरा गांधी में सस्थाओं के प्रति सम्मान की वह  भावना नहीं थी जो पंडित जवाहरलाल नेहरू में थी. नतीजा यह हुआ कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपति भी सिफारशी होने लगे . उसी क्रम में उन्होंने ए सी जोशी को कुलपति बनाया और फिर जो ढलान शुरू हुआ वह आजतक जारी है . ए सी जोशी के कार्यकाल में ही बीएचयू का  कुलपति अफसर माना जाने लगा ,वरना उसके पहले वह परिवार का सही अर्थों में मुखिया होता था. जोशी जी के  कार्यकाल  में ही बीएचयू कैम्पस में पुलिस ने छात्रावासों के अन्दर घुसकर लड़कों की खूब पिटाई की थी. उसी के बाद  छात्र आन्दोलन से निपटने के लिए विश्वविद्यालय को अनिश्चित काल के लिए बंद करने की परम्परा शुरू हुई. और वहां से चलकर आज की हालात तक बात पंहुची है .
    बताते हैं कि इसी नवम्बर में  मौजूदा कुलपति जी सी त्रिपाठी का कार्यकाल पूरा हो रहा है . वे एक टर्म और चाहते हैं . दिल्ली दरबार में फेरी भी लगा रहे हैं . आर एस एस का समर्थन उनको पहले से ही है .लेकिन लगता  है कि इस काण्ड के बाद उनकी पकड़ आर एस एस पर कमज़ोर  पड़ेगी. एक जानकार ने बताया कि जब वे अपनी मंशा लेकर शिक्षा मंत्री प्रकाश जावडेकर के सामने पेश हुए थे तो उन्होंने साफ बता दिया था कि आप अपना कार्यकाल सम्मान पूर्वक बिताकर चले जाइए अब वहां किसी विद्वान व्यक्ति को कुलपति बनाया जाएगा . हालांकि अब यह लगने लगा है कि कुलपति जी सी  त्रिपाठी को अपना कार्यकाल पूरा करना भी भारी पड़ेगा

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की घटना के बाद  हवा में बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं . एक सवाल यह है कि अगर उच्च शिक्षा के केन्द्रों में महिलाओं की इज्ज़त की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती तो हम बेटी बचाओ , बेटी पढाओ का नारा क्यों लगाते हैं . . बीएचयू के आन्दोलन में लड़कियों का नारा था, " न्याय, सुरक्षा आज़ादी, मांगे आधी आबादी ." इसमें ऐसी कौन सी बात थी जिससे देश की शान्ति को ख़तरा था. या जैसा कि बाद में टेलिविज़न पर कुलपति त्रिपाठी ने कहा  कि प्रधानमंत्री की सभा में अडंगा लगाने के लिए यह आन्दोलन किया गया था. सच्ची बात यह है कि अगर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने सही समय पर इस समस्या का हल निकाल दिया होता तो उनके फैसले से प्रधानमंत्री की वाहवाही ही होती . उन्होंने यह भी  कहा कि कैम्पस में पेट्रोल बम चल रहे थे .  उनकी इस बात को न तो उत्तर प्रदेश  सरकार ने गंभीरता से लिया और न ही केंद्र  सरकार ने .
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का सबक यह है कि केंद्र सरकार को चाहिए कि चेलों को पदासीन करने के काम से बाज आये और विश्वविद्यालयों को विद्वत्ता और  शोध का केंद्र बनाने का प्रयास करे

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